नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020: भाषायी विवाद का होगा आर्थिक असर...घट जाएगा निवेश
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विस्तार
नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 में राज्यों को अधिक स्वायत्तता देते हुए अधिकार दिया गया है कि वे अपने राजकीय विद्यालयों में इच्छानुसार कोई दो भारतीयों भाषाओं को पढ़ा सकते हैं। यह निर्णय उन सभी प्रदेशों में, जहां मुख्य कार्यकारी भाषा हिंदी नहीं है, और विशेष रूप से दक्षिण के राज्यों की भाषायी अस्मिता की भावना की रक्षा और राजनीति प्रेरित भाषा आधारित चिंताओं से निपटने की दिशा में सराहनीय कदम था, जिसे सभी विपक्षी दलों की सहमति से अंगीकार किया गया था। हालांकि, वर्तमान में तमिलनाडु और कर्नाटक दोनों ही राज्यों में राजनीति से प्रेरित होकर भाषा के आधार पर भेदभाव पैदा करने का प्रयास किया जा रहा है। यह समझना आवश्यक है कि इस प्रकार के कुत्सित प्रयासों से कई नकारात्मक प्रभाव पड़ते हैं, जो शायद छोटी अवधि में महसूस न हों, पर लंबे समय में जरूर असर डालते हैं। अंततः राज्य और इसके विकास पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है। ऐसे निर्णय निवेशकों की सोच को प्रभावित कर सकते हैं।
सामान्यता भाषायी भेदभाव से प्रेरित राजनीति के सामाजिक दुष्प्रभावों पर तो चर्चा होती है, लेकिन इससे होने वाले आर्थिक नुकसानों पर भी चर्चा की जरुरत है। हाल ही में तमिलनाडु सरकार ने अपने सालाना बजट में रुपये के घोषित प्रतीक को छोड़कर तमिल भाषा में किसी और ही प्रतीक का उपयोग किया। हास्यास्पद यह है कि रुपये का चिह्न तमिलनाडु के ही एक युवा की ओर से बनाया गया, जिसे यूपीए सरकार ने स्वीकार किया और तमिलनाडु राज्य का सत्तारूढ़ दल डीएमके सरकार सहयोगी दल था।
इस संदर्भ में दूसरा महत्वपूर्ण बिंदु भारतीय बाजारों के एकीकरण का है। जिस प्रकार जीएसटी ने संपूर्ण भारत को एकल बाजार बना दिया, जो छोटी कंपनियों के लिए अत्यधिक सहायक सिद्ध हुआ है। इसी दिशा में यदि विभिन्न राज्यों के बीच एक अकेली भाषा प्रयोग हो, तो यह छोटे व्यापारियों और उद्यमियों के लिए सहायक होगा। यदि तीन भाषा फॉर्मूला में सभी राज्यों के विद्यार्थी हिंदी लिखने-पढ़ने और बोलने में एक न्यूनतम स्तर को प्राप्त करते हैं, तो उनके लिए यह एक बड़ा बाजार खोल देगा, जहां वे आर्थिक गतिविधयों में आसानी से जुड़ पाएंगे और भाषा के आधार पर होने वाले झगडे़ भी कम हो जायेंगे।
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अब सवाल उठता है कि हिंदी ही क्यों? हिंदी अनेक राज्यों में जनसामान्य की भाषा है। यदि कोई भी व्यक्ति एक भी भारतीय भाषा को अपनी भाषा समझता है, उसके लिए दूसरी भारतीय भाषा सीखना आसान होगा, क्योंकि लगभग सभी भारतीय भाषाओं में कई ऐसे शब्द है, जो हिंदी या संस्कृत की भाषाओ में भी प्रचलित है। राजनीतिक पार्टियों और व्यक्तियों की ओर से दिया जाने वाले यह तर्क कि हिंदी सीखने या अपनाने से उनकी भाषा समय के साथ नष्ट हो जाएगी, उनके सामने अरुणाचल प्रदेश का उदाहरण दिया जाना चाहिए।
अरुणाचल में सभी जनजातीय समूहों की अपनी भाषा है और विशिष्ट पहचान भी। सभी जनजातीय भाषा ही बोलते हैं, लेकिन अन्य समूहों से बातचीत के लिए हिंदी का प्रयोग करते है। इस वजह से उनके लिए अन्य राज्यों के लोगों के साथ बातचीत करने में आसानी होती है। यह कुशलता पर्यटक प्रबंधन में भी काम आती है। यकीनन, राजनीतिक फायदे के लिए यह विभाजनकारी नीति हानिकारक होगी और बाहरी निवेश में कमी आएगी। ऐसा कर हम अपने राज्य के व्यापारियों को एक बड़े बाजार से वंचित करने की दिशा में ले जा रहे हैं।
10 फीसदी आबादी ही समझती है अंग्रेजी भाषा
अब प्रश्न यह उठता है कि वह कौन-सी भाषा हो सकती है, जिसे जो सभी अपना ले। मेरा मानना है कि हिंदी भाषा को इस प्रयोग हेतु अपनाना चाहिए। कई लोग अंग्रेजी भाषा के पक्षधर है, लेकिन तथ्य यह भी है कि मात्र 10% जनसंख्या ही अंग्रेजी भाषा समझती है और उसमे से भी 0.02% ही इसे पहली भाषा के तौर पर और मात्र 6.57% द्वितीय भाषा के रूप में उपयोग करते हैं। अंग्रेजी की एक प्रकार से अभी भी अभिजात्य या धनाढ्य वर्ग की भाषा बनी हुई है जिसके कारण से जनसंख्या का बड़ा तबका अभी भी आर्थिक विकास का लाभार्थी नहीं बन पा रहा है।