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विकास के कुछ नए मंत्र

Mon, 30 Dec 2019 06:43 PM IST
Raman Singh शंकर अय्यर
शंकर अय्यर Published by: Raman Singh Updated Mon, 30 Dec 2019 06:43 PM IST
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New Mantra for development
सड़क - फोटो : a

वर्ष 2019 में भारत पुराने विचारों और युवा राष्ट्र की आकांक्षाओं के बीच फंसा हुआ है। जॉन मेनार्ड कीन्स ने कहा है कि नए विचारों को विकसित करने में उतनी परेशानी नहीं है, जितनी पुराने विचारों से छुटकारा पाने में। अब जबकि भारत एक नए दशक में प्रवेश करने वाला है, यहां लीक से हटकर कुछ विचार पेश किए जा रहे हैं, जो बेशक व्यवस्थित क्रम में नहीं हैं, लेकिन ज्यादा स्मार्ट गवर्नेंस के लिए पुरानी सोच खत्म करने में सक्षम हो सकते हैं।


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मौद्रीकरण के लिए सार्वजनिक संपत्ति की सूची और मूल्य- अर्थव्यवस्था को गर्त से बाहर निकालने के लिए हर सुझाव और समाधान एक मानक प्रश्न से जूझता है कि पैसा कहां है? यह गंभीर स्थिति उभरती देनदारियों के भुगतान के लिए संसाधनों की क्षमता जानने के लिए परिसंपत्तियों के आकलन का आह्वान करती है। सरकार जमीन और सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों पर कब्जा जमाए बैठी है, जिसे महत्वपूर्ण सेवाएं प्रदान करने के लिए उपयोग किया जा सकता है। वर्षों से सरकारें संपत्ति के मौद्रीकरण का मंत्र जप रही हैं। तथ्य यह है कि क्षमता का अनुमान लगाने के लिए कोई तैयार नहीं है। इसे जानने की दिशा में पहला कदम संपत्तियों की पहचान करना है। यही समय है, जब सरकार संपत्तियों के मौद्रीकरण के लिए उनके परिमाण और मूल्य संसद के समक्ष प्रस्तुत कर सकती है। संभावित धन का अनुमान बहस, चर्चा एवं सहयोगी भावनाएं पैदा करने में सक्षम बनाएगा।

वित्त आयोग और मानव विकास- हरेक वित्त आयोग ने इस बात पर जोर दिया कि राज्यों को अपने संसाधनों का इस्तेमाल शिक्षा, स्वास्थ्य एवं मानव विकास के लिए धन की उपलब्धता बढ़ाने पर करना चाहिए। राज्य सरकारों ने अपने स्तर पर मानदंडों को पलटने/ विकृत करने के लिए जुमलों और आंकड़ों का उपयोग करने की कला में महारत हासिल कर ली है, ताकि चुनाव में लाभ दिलाने वाली योजनाओं के लिए संसाधनों को मोड़ा जा सके। सबसे गरीब राज्यों में मानव विकास की स्थिति सबसे खराब है-उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड शिक्षा और स्वास्थ्य के मामले में नीति आयोग के पैमाने पर सबसे निचले पायदान पर हैं। वादों और प्रदर्शन के बीच अंतर धन की अपर्याप्तता के साथ-साथ नीतियों को लागू करने में राज्य की अपर्याप्त क्षमता और अयोग्यता के कारण भी है। भारत की असमंजसपूर्ण अर्ध-संघीय संरचना में स्वायत्तता के मुहावरे का अक्सर जिक्र किया जाता है, लेकिन दुख की बात है कि जवाबदेही का नहीं! मानव विकास की निधियों के विचलन का त्याग कर उन्हें विशिष्ट एस्क्रो खाते (परस्पर भरोसे पर आधारित संयुक्त खाता) में क्यों नहीं रखा जाता-जहां से राज्य मानव विकास के उद्देश्यों और परिणामों को प्रस्तुत करके धन निकाल सकते हैं।

एयर इंडिया को टाटा को सौंपना- महाराजा (एयर इंडिया) की व्यवस्थागत यंत्रणा की कहानी एक बेहतर समापन की मांग करती है। निश्चित रूप से सरकार को एयर इंडिया से बाहर निकल जाना चाहिए। जैसा कि 1950 के दशक में जस्टिस राजाध्यक्ष समिति ने चेतावनी दी थी कि गैर-लचीले और सुस्त 'सरकारी विभाग विशेष रूप से वायु परिवहन उद्योग की जरूरतों के लिए अनुपयुक्त हैं।' दो दशकों से सरकारों ने राष्ट्रीय एयरलाइन के स्वाभाविक मूल्य के बारे में बहुत सी बातें की हैं। कई उड्डयन मंत्रियों ने इसके विनिवेश की भविष्यवाणियां की हैं और वे भविष्यवाणियां विफल रही हैं। अब हर कुछ हफ्ते में इसकी वित्तीय अनिश्चितता को असामयिक मृत्यु के रूप में पेश किया जाता है। सरकार के लिए सबसे अच्छा विकल्प है कि एयरलाइन को निर्धारित शर्तों पर टाटा को सौंप दे। एयरलाइन के अस्तित्व और जेआरडी टाटा के ऐतिहासिक विरासत के संचालने के लिए टाटा में इसकी वापसी मोक्ष का कार्य होगा।

जल एटीएम लगाना- नलों के जरिये पेयजल पहुंचाना दशकों का सपना है। स्वतंत्रता के बाद से भारत ने लोगों तक पानी पहुंचाने के लिए इंजीनियरिंग समाधानों में निवेश किया है, जबकि जरूरत इस बात की है कि इंजीनियर अभिनव समाधान खोजे। केवल 18 फीसदी ग्रामीण घरों में नलों के जरिये पानी पहुंचता है। दस राज्यों में पांच फीसदी से भी कम ग्रामीण घरों में नलों से पानी पहुंचता है। 1.33 फीसदी के साथ उत्तर प्रदेश और 1.88 फीसदी के साथ बिहार इस मामले में सबसे निचले पायदान पर हैं। पिछले हफ्ते सरकार ने 15 करोड़ ग्रामीण घरों में नलों के जरिये पानी पहुंचाने के लिए अटल जल योजना की घोषणा की और भूजल प्रबंधन के लिए एक नई संरचना शुरू की। पंचायतों को भूजल का उपयोग करके जल एटीएम स्थापित करने और सुरक्षित पेयजल उपलब्ध करवाने के लिए धन आवंटित कर सशक्त क्यों नहीं बनाया जाता? भूजल पर निर्भरता से यह सुनिश्चित होगा कि भूजल की रक्षा में गांवों की हिस्सेदारी होगी और वे पानी संरक्षण के प्रति प्रेरित होंगे। शुरू में सरकार 150 आकांक्षी गांवों में इस परियोजना को शुरू कर सकती है और फिर आर्सेनिक व फ्लोराइड युक्त पानी से जूझ रहे 55,000 ग्रामीण बस्तियों तक इसका विस्तार कर सकती है।

सड़क और हाई-वे पर सौर ऊर्जा- भारत में बुनियादी ढांचे के विस्तार के लिए फंडिंग एक बड़ी चुनौती है। बजट में आय और व्यय के बीच अघोषित अंतर तीन लाख करोड़ रुपये से पांच लाख करोड़ रुपये के बीच होने का अनुमान है। अपारदर्शिता और आपत्तियों ने धारणाओं को बिगाड़ दिया है। सड़क एवं नवीनीकृत ऊर्जा क्षेत्र के निवेशकों के बीच भय व्याप्त है। असाधारण स्थितियां कल्पनाशील नजरिये की मांग करती हैं। सौर ऊर्जा संयंत्र स्थापित करने में जमीन सबसे बड़ी बाधा है। ग्रामीण सड़कें और हाई-वे लेन को विभाजित करने वाली जगहों का पूरी तरह से इस्तेमाल नहीं होता है। अमेरिका और कोरिया जैसे देश सड़कों और सड़कों के ऊपर हवाई स्थान, दोनों का सौर ऊर्जा संयंत्र के लिए इस्तेमाल करते हैं। यह परखने और अनुकरण करने लायक विचार है। राज्य, ग्रामीण विकास मंत्रालय, सड़क परिवहन मंत्रालय और राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण के साथ ऊर्जा मंत्रालय निवेशकों के लिए सर्वोत्तम संभावनाओं वाले स्थलों का चयन कर सकते हैं।

बेशक यह निर्विवाद है कि विचार क्रियान्वयन से संबंधित चुनौतियों से जुड़े होते हैं, लेकिन जैसा कि कहा जाता है, मधुमक्खी नहीं, तो शहद नहीं और फिर धन नहीं!

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