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जर्जर बंगाल कांग्रेस में नई उम्मीद

Sat, 01 Feb 2014 01:14 AM IST
कृपाशंकर चौबे
कृपाशंकर चौबे Updated Sat, 01 Feb 2014 01:14 AM IST
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new hope in west bengal congress

कोलकाता के ब्रिगेड ग्राउंड की भारी भीड़ के बीच 'दिल्ली चलो' का ऐलान कर ममता बनर्जी ने अपने इरादे साफ कर दिए हैं। तृणमूल न कांग्रेस का समर्थन करेगी, न भाजपा का। इसमें दो राय नहीं कि कई विवादों के बावजूद पश्चिम बंगाल में तृणमूल की जमीन जरा भी नहीं खिसकी है। लेकिन पुराने कांग्रेसी सोमेन मित्र की घर वापसी के बाद कांग्रेस के बारे में राय बदलनी पड़ सकती है।

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कुछ दिनों पहले समारोहपूर्वक सोमेन मित्र की पांच साल बाद घर वापसी पर कार्यकर्ताओं में जो पागल आवेग दिखा, उससे साफ है कि उनसे पार्टी के साधारण कार्यकर्ताओं को बहुत उम्मीदें हैं। आलाकमान ने इस अवसर को इतना महत्व दिया कि समारोह में भाग लेने के लिए अपने दो केंद्रीय प्रतिनिधियों-सीपी जोशी तथा अंबिका सोनी को कोलकाता भेजा। दरअसल प्रणब मुखर्जी के राष्ट्रपति बनने और प्रियरंजन दासमुंशी के लंबे समय से अस्पताल में भर्ती रहने से बंगाल कांग्रेस नेतृत्व के गंभीर संकट से जूझ रही थी।
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तृणमूल ने इस घटनाक्रम को भले ही बहुत महत्व नहीं दिया हो, लेकिन भीतर-भीतर वह घबराई हुई है। यही कारण है कि उसने इसके समानांतर कांग्रेस छोड़कर तृणमूल में शामिल होनेवाली मैत्रेयी साहा के लिए समारोह आयोजित किया। तृणमूल को अच्छी तरह पता है कि अब भी सोमेन के समर्थक बंगाल के हर जिले और अंचल में हैं। तृणमूल की बेचैनी का एक प्रमाण उसकी ब्रिगेड रैली के प्रचार से भी मिला। पूरे कोलकाता में जहां-जहां कांग्रेस ने सोमेन मित्र के बैनर लगाए, वहां-वहां तृणमूल ने ममता बनर्जी की तस्वीर वाले बैनर लगाए।
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बंगाल कांग्रेस पर एक समय सोमेन मित्र की जैसी मजबूत पकड़ थी, वैसी प्रणब मुखर्जी, प्रियरंजन दासमुंशी और एबीए गनी खां चौधरी की भी नहीं थी। इस सांगठनिक पकड़ के कारण ही प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष के चुनाव में सोमेन मित्र से ममता बनर्जी हार गई थीं। सोमेन मित्र की इस कद्दावर छवि के कारण ही ममता को अलग पार्टी बनानी पड़ी। बाद में ममता ने ही सोमेन के घर जाकर उन्हें तृणमूल में शामिल होने का न्योता दिया था। तब कांग्रेस छोड़ने से सोमेन का कद घटा ही था। वह तृणमूल सांसद तो बन गए, किंतु ममता ने उन्हें अपेक्षित महत्व नहीं दिया। ऐसे में, उनका तृणमूल छोड़ना तय ही था।

कांग्रेस में शामिल होने के बाद सोमेन ने अब पूरे दमखम से पार्टी को चंगा करने के लिए जो मुद्दे उठाए हैं, उनमें प्रमुख हैं-सारधा चिटफंड घोटाले में तृणमूल नेताओं की भागीदारी और स्त्रियों की खतरे में पड़ी सुरक्षा। मध्यमग्राम, कामदुनी और पार्क स्ट्रीट बलात्कार कांड को उन्होंने शिद्दत से उठाया है। अस्पतालों में शिशुओं की मौत, आमरी अस्पताल हादसा तथा जहरीली शराब कांड जैसे दूसरे मामले भी हैं। छोटे मुद्दे को बड़े रूप में और बड़े मुद्दे को छोटे रूप में पेश करने की चूक अब बंगाल कांग्रेस से नहीं होगी। प्रदीप भट्टाचार्य अथवा मानस भुइंया के प्रदेश अध्यक्ष रहते कांग्रेस में जो गुटबाजी दिखती थी, उम्मीद करनी चाहिए कि वह अब कम होगी। दीपा दासमुंशी और अधीर रंजन चौधरी भी उनके नेतृत्व में काम करने की प्रतिबद्धता जता रहे हैं।

लेकिन सोमेन मित्र के सामने एक जर्जर हो चुकी पार्टी को खड़ा करने की विकट चुनौती भी है। उनके सामने सबसे बड़ी मुश्किल बंगाल कांग्रेस में भगदड़ को रोकने की है। सोमेन की दूसरी बड़ी चुनौती लोकसभा चुनाव में पार्टी का प्रदर्शन ठीक करने की होगी। वह पार्टी को बड़ी सफलता शायद न दिला पाएं, पर तृणमूल कांग्रेस का नुकसान जरूर करेंगे।


मसलन, उत्तर कोलकाता संसदीय सीट से यदि वह सुदीप बंद्योपाध्याय के खिलाफ चुनाव लड़ते हैं, तो तृणमूल की मुश्किल बढ़ेगी और वैसी स्थिति में माकपा उम्मीदवार के बाजी मार ले जाने की संभावना बढ़ेगी। समझा जाता है कि सोमेन की अगुवाई में बंगाल कांग्रेस की रणनीति तृणमूल को अधिक से अधिक संसदीय सीटों पर नुकसान पहुंचाने की है। विगत में संसदीय उपचुनाव और विधानसभा उपचुनाव से लेकर पालिका और त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव में अलग-अलग चुनाव लड़ने के बावजूद तृणमूल को कोई नुकसान नहीं हुआ था। लेकिन आगे तृणमूल को चुनौती मिलनी तय है।

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