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यूरोप से रिश्तों में नई ऊर्जा

Fri, 17 Jul 2020 01:55 AM IST
ranjit kumar रणजीत कुमार
Updated Fri, 17 Jul 2020 01:55 AM IST
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New energy in relationships with Europe
प्रतीकात्मक तस्वीर

सत्ताईस देशों का यूरोपीय संघ अपने भारी आर्थिक वजन के अनुरूप  विश्व रंगमंच पर समुचित राजनीतिक भूमिका नहीं निभा रहा था। लेकिन अब ब्रिटेन के निकल जाने के बाद संघ ने विश्व के राजनयिक क्षेत्रों में अपनी हलचल कुछ बढ़ाई है और इसका इरादा भविष्य में और सक्रिय भूमिका निभाने का है।


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इस परिप्रेक्ष्य में यूरोपीय संघ के साथ तीन साल बाद विगत 15 जुलाई को 15वीं शिखर बैठक भारत की जरूरत थी। चूंकि यूरोपीय संघ में तीन देश ब्रिटेन, फ्रांस और जर्मनी सबसे प्रभावशाली रहे हैं, इसलिए वैश्विक मामलों के बारे में तीनों में आम राय और एकजुटता जरूरी थी। पर ब्रिटेन द्वारा अलग राग अलापने की वजह से साझा नीति नहीं बन पा रही थी।

बुधवार को संपन्न शिखर बैठक में भारत और यूरोपीय संघ ने परमाणु ऊर्जा के शांतिपूर्ण इस्तेमाल में सहयोग के लिए समझौते से लेकर दूरगामी महत्व के सामरिक साझेदारी का 2025 तक का  रोडमैप बताने वाला एक दस्तावेज जारी किया, जिसमें रक्षा और सैन्य सहयोग का दायरा बढ़ाना, समुद्री सुरक्षा सहयोग के लिए वार्ता प्रक्रिया स्थापित करना, सुरक्षा मसलों पर नियमित संवाद स्थापित करना, भारतीय और यूरोपीय नौसेना के बीच आपसी सहयोग बेहतर करने के लिए  सहयोग और आदान-प्रदान आदि शामिल हैं।

इसके अलावा दोनों ने 2013 से रुकी पड़ी मुक्त व्यापार संधि वार्ता फिर शुरू करने को हरी झंडी दी है। दोनों पक्षों ने चीन का नाम लिए बिना यह भी कहा है कि वे हिंद महासागर और प्रशांत महासागर में शांति व स्थिरता बनाए रखने और इन समुद्री इलाकों की सुरक्षा और समुद्री कानून का पालन सुनिश्चित करने के लिए मिलकर काम करेंगे।

महामारी के मौजूदा दौर में जब चीन से कई देश दूरी बनाने लगे हैं और वैश्विक सामरिक समीकरण में फेरबदल के संकेत मिलने लगे हैं, तब भारत द्वारा शक्तिशाली यूरोपीय संघ के साथ सामरिक रिश्ता और गहरा करने की अहमियत पहले से भी अधिक महसूस की जा रही है।

गौरतलब है कि दोनों पक्षों के बीच 2000 में सामरिक साझेदारी का रिश्ता स्थापित हुआ, फिर नियमित तौर पर सालाना शिखर बैठकें होती रहीं। पर हाल में उदासीनता के कारण शिखर बैठकें नहीं हुईं। फिर भी 20 साल में दोनों के बीच 15 शिखर बैठकें हो चुकी हैं।

एक सौ अरब यूरो के द्विपक्षीय व्यापार के साथ यूरोपीय संघ भारत का सबसे बड़ा आर्थिक साझेदार बन चुका है और अंतरिक्ष से लेकर विज्ञान-तकनीक के कई क्षेत्रों में दोनों के बीच गहरा सहयोग रहा है। यह द्विपक्षीय व्यापार कुछ हद तक भारत के पक्ष में है।

अलबत्ता वैश्विक मामलों में यूरोपीय संघ कभी प्रभावशाली आवाज नहीं बन सका, इसलिए भारतीय सामरिक हलकों में यूरोपीय संघ के साथ रिश्तों को उतनी अहमियत नहीं दी गई। यूरोपीय संघ भी भारत के प्रति अब तक इसलिए उदासीन रहा कि भारत ने मुक्त व्यापार संधि और निवेश संरक्षण संधि को हरी झंडी नहीं दी।

पर चीन के खिलाफ यूरोप में जिस तरह भावनाएं प्रबल होने लगी हैं, वैसे में, भारत के लिए यह सुनहरा मौका है कि यूरोपीय कंपनियों को भारत में निवेश के लिए आकर्षित करने की दिशा में कदम उठाया जाए।

आज के दौर में हमारी अहमियत इस आधार पर तय होती है कि हम कितने मूल्यवान हैं और दूसरे देशों के लिए कितने आकर्षक बाजार बनते हैं, निवेश के लिए कितना अनुकूल माहौल प्रदान करते हैं और दूसरे देशों के आर्थिक विकास में कितना योगदान कर सकते हैं।

आज जब कई ताकतवर देश और बहुराष्ट्रीय कंपनियां अपने कल-पुर्जों की आपूर्ति और उत्पादन आधार के तौर पर चीन के विकल्प की तलाश कर  रही है, तब हमें यह विकल्प बनने के लिए देश में लालफीताशाही और भ्रष्टाचार मुक्त आर्थिक और सामाजिक सौहार्द का माहौल प्रदान करना होगा।

यूरोपीय संघ के साथ सामरिक साझेदारी के रिश्तों से आपसी समझ बन चुकी है, पर भारत की अंदरूनी घरेलू नीतियों को लेकर जिस तरह यूरोपीय संसद में भारत-विरोधी प्रस्ताव पारित हुए हैं, उससे यूरोपीय देशों में भारत को लेकर उदासीनता पैदा हुई है।

यूरोपीय संघ के साथ सामरिक साझेदारी के रिश्तों का फायदा उठाना है, तो भारत जिन जनतांत्रिक और मानवीय मूल्यों पर गर्व करता है, जमीनी तौर पर भी उनका पालन हो, तो यूरोपीय देशों में भारत के पक्ष में हवा बनेगी।

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