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क्रांतिकारी ढांचे में नई शिक्षा नीति, बता रहे हैं सुधीश पचौरी

Mon, 03 Aug 2020 12:25 AM IST
sudheesh pachauri सुधीश पचौरी
Updated Mon, 03 Aug 2020 12:25 AM IST
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New education policy in revolutionary structure, telling Sudhish Pachauri
छात्र-छात्राएं (प्रतीकात्मक तस्वीर) - फोटो : iStock

पहली नजर में नई शिक्षा नीति का प्रस्तुत ढांचा तो एकदम क्रांतिकारी है। पुरानी के अनुसार अब तक हम 'दस जमा दो जमा तीन' के हिसाब से बीए तक पढ़ते-पढ़ाते थे, लेकिन नई शिक्षा नीति के अंतर्गत ‘पांच जमा तीन जमा तीन जमा चार’ की व्यवस्था है। यह प्री नर्सरी के बच्चों के बस्ते का बोझ कम करती है। इसमें पांचवीं तक सबको मातृभाषा में शिक्षा देने की व्यवस्था है।


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परंपरागत कौशलों के शिक्षण के साथ सेकंडरी में अनेक विषयों में व्यापक ‘चॉयस’ दी गई है। अब स्नातक कोर्स चार साल का होगा, जो ग्लोबल स्तर का होगा, जिसमें हर स्तर पर अंतर्विषयी लचीलापन होगा। छात्रों को अपनी पसंद के विषय चुनने की आजादी होगी।

संगीत का छात्र गणित चाहे तो पढ़े या विज्ञान वाला चाहे, तो विज्ञान के साथ कला शिल्प भी पढ़े। पहले तीन साल पूरा करने पर बीए की डिग्री ली जा सकती है। अगर कोई एक साल या दो साल पढ़कर बीच में छोड़कर जाता है, तो एक अवधि तक वापस आकर वह अपनी डिग्री पूरी कर सकता है।

'दाखिले' और ‘छोड़ने’ के बीच का यह लचीलापन छात्रों के हित में है। नई शिक्षा नीति में प्रस्तावित चार साल के स्नातक कोर्स का चौथा बरस एकदम क्रांतिकारी विचार है। इसमें अंतर्विषयी व व्यावहारिक शिक्षा और ‘क्वालिटी-रिसर्च’ पर बल दिया गया है। उसके बाद छात्र बिना एम.फिल. के पीएच.डी. में जा सकेंगे।

अपने रूप और अंतर्वस्तु में यह शिक्षा नीति लगभग वैसी ही है, जैसी 2012-13-14 के वर्षों में दिल्ली विश्वविद्यालय ने अपने यहां लागू की थी और जिसे एफवाईयूपी यानी चार वर्षीय बीए का नाम दिया गया था। लेकिन तब न्यस्त स्वार्थों से प्रेरित कुछ वामपंथी शिक्षक संगठनों ने इसका विरोध किया था और केंद्र में नई-नई आई भाजपा सरकार ने भी विरोध किया था और उस सफल प्रयोग का असमय गला घोंट दिया गया था।

विरोध तो इसका भी होगा, लेकिन हमें उम्मीद है कि सरकार पीछे नहीं हटेगी। यह शायद पहली बार है कि यह नीति किसी भाजपा छाप थिंकटैंक से नहीं निकली है, बल्कि के. कस्तूरीरंगन जैसे बौद्धिक की बनाई हुई है, जो दो लाख फीडबैकों से पुष्ट है। जो भी आज के जड़ और मृत होते शिक्षा संसार से असंतुष्ट है, वह इसका स्वागत ही करेगा, क्योंकि भले ही इसको लागू करने वाली भाजपा हो, इसकी परिकल्पना कस्तूरीरंगन की है, जो भाजपा के तो नहीं ही हैं।

यह शिक्षा नीति समकालीन डिजिटल व तकनीकी परिवर्तनों की शिनाख्त करती है और उनसे शिक्षा-दीक्षा को जोड़ती है। डिजिटल क्रांति का उपयोग करना, ज्ञान व तकनीक से नित्य नए नवोन्मेषण संभव करना, ज्ञान के अति स्पर्धी ग्लोबल जगत में अपनी जगह बनाना, अंतर्विषयी ज्ञानाध्ययन पर बल देना और सामाजिक जरूरतों के हिसाब से शोधादि को प्रोत्साहित करना, साथ ही कौशल विकास को बढ़ावा देना इसके कुछ बेहद मौलिक व चमकदार बिंदु हैं। इनसे अपनी शिक्षा-दीक्षा का ढांचा एकदम विश्व स्तरीय हो जाता है। यह जीवनानुभव और सिद्धांत ज्ञान के बीच परस्परता पर जोर देती है।

अब तक हम हायर सेंकडरी तक भले ही चार-पांच विषय पढ़ते थे, लेकिन एम.ए. तक आते-आते किसी एक विषय की सुरंग में बंद हो जाते थे। फिजिक्स वाले को केमिस्ट्री वाले से, इतिहास वाले को भूगोल से कोई मतलब नहीं रहता था। इसी  तरह साहित्य कला वाले विज्ञान से परहेज करते थे और विज्ञान वाले साहित्य कला को मनोरंजक और हेय समझते थे।

कॉमर्स वाला संगीत को हीन समझता था और आईटी वाला साहित्य को बेकार समझता था। अब ऐसा नहीं होगा। अब सभी विषय एक दूसरे के पूरक और मित्र बनेंगे। आज इकहरे एकायामी व्यक्तित्व की जगह ‘मल्टीपरपज’ उपयोग वाले ‘मल्टी टास्कर’ की कीमत है। यह शिक्षा का उत्तर आधुनिक दौर है। भूमंडलीकरण व तकनीकी क्रांति ने ज्ञान की कट्टर दीवारें तोड़ दी हैं। एक विषय का ज्ञान अपर्याप्त हो उठा है और बहु-विषयी और अंतर्विषयी ज्ञान की प्यास बढ़ी है। आज अंतर्विषयी ज्ञान और शोध के बिना किसी का उद्धार नहीं है।

यह नीति पहली बार इसे संभव करती और ज्ञान के क्षेत्र में पिछड़ गए भारत को दुनिया के बराबर करने का अवसर देती है। अतीत के नालंदा और तक्षशिला जैसे विश्वविद्यालय अपने समय में अंतर्विषयी ज्ञान व शोध के लिए ही तो जाने जाते थे। हम बहुत दिन बाद अपनी जमीन पर लौटे हैं। यह स्वागत योग्य है।

लेकिन दुनिया के अच्छे विश्वविद्यालयों का अनुभव यह भी बताता है कि यह नीति तभी फलदायी हो सकती है, जब अपने शिक्षा संस्थान अपेक्षित रूप से ‘स्वायत्त' और पर्याप्त रूप से ‘फंडित’ हों। और इस नीति की यही सबसे कमजोर कड़ी है।

इसमें शिक्षा के निरे निजीकरण पर जोर है, जबकि अपने जैसे गरीब देश में शिक्षा आज भी पर्याप्त सरकारी फंडिंग से ही सफल बन सकती है। निजी क्षेत्र के शिक्षण संस्थान सिर्फ अमीरों के लिए होते हैं, जबकि इस तरह की नई शिक्षा नीति की सबसे अधिक जरूरत गरीबों को ही है। यों यह शिक्षा नीति उनका ख्याल तो करती है, लेकिन बिना फंडिंग के कोरा ख्याल क्या कर लेगा?

यह नीति अमेरिकी मॉडल को कुछ हेर-फेर के साथ लागू करती है, लेकिन यह भूल जाती है कि अमेरिका में निजी विश्वविद्यालय किसी परचूनिया शॉप की तरह नहीं होते, बल्कि बड़े कॉरपोरेटी फंड वाले उच्च ज्ञान के अड्डे होते हैं, जहां प्रतिभाशालियों को ससम्मान नियुक्त किया जाता है और उन्हें काम की पूरी आजादी दी जाती है।

इनके बरक्स यहां के ‘स्व-वित्त पोषित कॉलेजों’ को देखिए, जो हमेशा हायर-फायर में यकीन करते हैं और पूरी तनख्वाह पर दस्तखत कराकर शिक्षक को आधी तनख्वाह देते हैं। शिक्षा नीति इसे रोकने के लिए क्या करती है, यह देखना होगा। इस नीति के अंतर्गत सौ नामी विदेशी विश्वविद्यालय यहां अपने कैंपस खोल सकेंगे और छात्र यहीं बैठे अमेरिकी या ब्रितानी डिग्री ले सकेंगे।

हो सकता है, इस प्रतिस्पर्धा में हम भी कुछ सीखें, लेकिन यह अपने ‘आत्मनिर्भर’ भारत के नारे के तो एकदम विपरीत जाता है। नई शिक्षा नीति में कई ऐसे झोल हैं, जो आने वाले दिनों में प्रकट हो सकते हैं, लेकिन इन झोलों के बावजूद नीति का ताजापन स्वागत योग्य है!

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