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अंबेडकर भक्तों की नई जमात

Mon, 04 May 2015 07:39 PM IST
कुमार प्रशांत
कुमार प्रशांत Updated Mon, 04 May 2015 07:39 PM IST
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New crop of Ambedkar devotees

एक सौ पच्चीसवीं जयंती के बहाने हर तरफ डॉ. भीमराव अंबेडकर के नाम की धूम रही-कुछ वैसी धूम, जिसकी चाहत उन्हें ताउम्र रही, लेकिन जो उन्हें कभी मिली नहीं। भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में जिसने कभी भाग नहीं लिया; जिसने आजादी के लिए लड़ने से कहीं अहम वाइसराय के दरबार की सदस्यता को माना; जिसने खुलेआम कहा कि आजादी का तब तक इंतजार करें, जब तक कि हमारे लोगों की सत्ता में भागीदारी पक्की नहीं हो जाती है, वैसे बाबासाहेब अंबेडकर ने अपना कद इतना बड़ा कैसे किया होगा कि वह भारतीय संविधान सभा की मसविदा समिति के अध्यक्ष बने, भारतीय संविधान को लिपिबद्ध करने का गुरुतर भार वहन किया, और जवाहरलाल नेहरू की अनिच्छा के बावजूद, महात्मा गांधी के मजबूत निर्देश के कारण आजाद मुल्क की पहली सरकार में विधि मंत्री बने, फिर भी विपक्ष की भूमिका निभाते रहे? आज अंबेडकर का अपमान करते हुए, उनकी विरासत का खोखला दावा करने में हिंदुत्ववादियों और दलित चिंतकों का रवैया एक है।

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अंबेडकर भक्तों की नई जमात में संघ परिवार ने अभी-अभी दाखिला लिया है। अंबेडकर के जीते-जी हिंदुत्ववादियों में से किसी ने, कभी उनके समर्थन में कुछ कहा हो, तो मुझे पता नहीं है। अंबेडकर-प्रेम की ताजा लहर बिहार के आसन्न चुनाव की वजह से उठी है। बिहार हारे, तो फिर जीतने और कहने को कुछ बाकी नहीं रहेगा, यह संघ भी समझ रहा है और बिहार की राजनीति के दूसरे खिलाड़ी भी। इसलिए वैसे नए राजनीतिक गठबंधन बने हैं, जिनकी गांठें अभी से साफ नजर आ रही हैं। सत्ता भारतीय राजनीति का वह सच है, जिसके सामने कोई भी दूसरा सत्य टिकता नहीं है-अंबेडकर भी नहीं! इसलिए दलित राजनीति आज कहीं नहीं बची है। इसके दो सबसे चमकीले नाम, मायावती और रामदास अठावले के पास आज कहने-करने को कुछ बचा नहीं है, तो इसलिए कि उनकी गाड़ी आज तक सत्ता के ईंधन से चलती-दौड़ती रही है; और वह ईंधन चुक गया है।
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अंबेडकर सत्ता को पहचानते थे। वह गांधी के विरोधी ही नहीं, उनके विपरीत भी थे और इसे उन्होंने अपना हथियार बनाया। वह अपने लोगों का पूर्ण समर्थन जुटाकर कभी चुनाव नहीं जीत सके। लेकिन उनका सामाजिक असर गहरा और मजबूत था। 1950 से 52 तक जिस संविधान को रचने में वह जुटे रहे, 1953 में उसी संविधान को उन्होंने अस्वीकार किया, तो वह इसे एक व्यक्ति का नहीं, पूरे दलित समाज का सवाल बनाने में सफल हुए। उन्होंने ऐसे एक राज्य की कल्पना की थी, जो धार्मिक अनाचार के मामलों में दलितों के साथ खड़ा होगा। क्या संघ परिवार ऐसी अवधारणा के साथ खुद को जोड़ेगा?
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अंबेडकर ने जब कहा कि वह जन्मे भले हिंदू हैं, पर हिंदू मरेंगे नहीं, तो वह एक ऐसे संकल्प की घोषणा थी, जिससे दलित समाज ने खुद को तुरंत ही जोड़ लिया। आज अंबेडकर का राजनीतिक इस्तेमाल सारी मर्यादाएं तोड़ गया है, पर दलित समाज को उच्छिष्ट की तरह छोड़ गया है। इस चातुरी में भाजपा को वक्ती सफलता भले मिल जाए, अंतत: वैसी ही विफलता मिलेगी, जैसी मायावती और कांग्रेस को मिली है। संघ परिवार ने इसका गणित लगा लिया है-अंबेडकर यदि बिहार में नैया पार लगा देते हैं, तो उनका काम खत्म; आगे के लिए वह कोई दूसरा अंबेडकर खोजेंगे।

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