नई चुनौतियों के लिए नए शहर चाहिए

राधिका खोसला Updated Wed, 10 May 2017 11:25 AM IST
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स्वच्छ ऊर्जा और जलवायु परिवर्तन के लक्ष्यों के लिहाज से तेजी से शहरों पर ध्यान केंद्रित किया जा रहा है। संयुक्त राष्ट्र के 2015 के संवहनीय विकास लक्ष्यों में पहली बार स्पष्ट रूप से शहरी लक्ष्यों को शामिल किया गया है। 2015 के पेरिस जलवायु परिवर्तन समझौते ने भी राष्ट्रीय विकास के संदर्भों में जलवायु परिवर्तन को नियंत्रित करने वाले उपायों को मजबूत करने पर जोर दिया है। शहरों में स्वच्छ ऊर्जा और जलवायु परिवर्तन पर अभी हो रहा यह मंथन भारत के लिहाज से अहम है, क्योंकि अनुमान जताया गया है कि 2040 तक वैश्विक ऊर्जा खपत में एक चौथाई वृद्धि के लिए भारत जिम्मेदार होगा। ऊर्जा खपत में यह वृद्धि देश में हो रहे आर्थिक और सामाजिक बदलाव के कारण होगी। 2030 तक भारतीय शहरों में 20 करोड़ और लोग रहने लगेंगे। इनमें से अधिकांश लोग विकास के निचले क्रम में होंगे, जिनका जीवन स्तर सुधारने के लिए आधुनिक ईंधन, एयर कंडीशनर सहित अन्य उपकरणों और वाहनों की मांग बढ़ेगी। जनसांख्यिकी रूप से देखें, तो अनुमान है कि भारत के रोजगार बाजार में अगले दो दशकों तक प्रति वर्ष एक करोड़ की दर से नए लोग जुड़ते जाएंगे। अगले पंद्रह वर्षों तक सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) की 75 फीसदी वृद्धि के लिए शहर जिम्मेदार होंगे। इस शहरी संक्रमण को नियंत्रित करना अपने आपमें चुनौती है। ऊर्जा और जलवायु परिवर्तन की जरूरतों के कारण यह चुनौती और जटिल हो जाती है।
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भवनों, परिवहन और सड़कों के ढांचागत नेटवर्क अर्थव्यवस्था के अहम घटक होते हैं। सड़क, परिवहन और भवन ये तीनों मिलकर ऊर्जा की खपत का पैटर्न बनाते हैं। दरअसल आज किस तरह से भारतीय शहरों का निर्माण होता है, उससे यह पता चलेगा कि इस सदी के अंत तक अधिकांश भारतीय किस तरह जीवन यापन कर रहे होंगे। यानी यह इस पर निर्भर होगा कि लोग किस तरह के भवनों में रहेंगे, गर्मी और शीतलता के लिए ऊर्जा की कितनी खपत होगी, उन्हें रोजाना कितना सफर करना होगा और इसका साधन क्या होगा। इन विकल्पों का हवा, पानी, भीड़, ऊर्जा और जलवायु परिवर्तन पर प्रभाव पड़ेगा।

 
एक बार जब शहरी आधारभूत संरचना में बड़ी पूंजी का निवेश कर दिया जाता है, तो फिर नई आधारभूत संरचना में रूपांतरण की लागत बहुत बढ़ सकती है। इसमें रूपांतरण पर होने वाला खर्च और इससे होने वाली असुविधा दोनों शामिल हैं। अभी भारतीय शहरों की स्थिति को देखकर भविष्य की जरूरतें निर्धारित की जा सकती हैं और उसके अनुरूप विकास के वैकल्पिक रास्तों पर विचार किया जा सकता है। इससे शहर की जरूरतों से समझौते नहीं करने पड़ेंगे और ऊर्जा की खपत को भी नियंत्रित किया जा सकेगा।

हमें अभी यह समझना होगा कि शहरों में आधारभूत संरचना और आय के स्तर में किस तरह के बदलाव होते हैं और उनका कैसा प्रभाव पड़ता है। जरा तेजी से आगे बढ़ते गुजरात के दूसरी श्रेणी के शहर राजकोट के दो उदाहरणों पर गौर कीजिए। पहला, यह शहर मकानों की ऐसी डिजाइन पर काम कर रहा है, जहां विंडो शेडिंग, वेंटिलेशन और छत इस तरह की हो, जिसकी वजह से घर वहां रहने वाले को अधिक आरामदायक लगे और वह भी ऊर्जा की खपत बढ़ाए बिना। दूसरा उदाहरण परिवहन से जुड़ा हुआ है। राजकोट शहर भविष्य के परिवहन की जरूरतों और ईंधन की खपत घटाने पर विचार कर रहा है। इसके लिए पब्लिक ट्रांजिट कॉरीडोर विकसित किया जा रहा है।

-लेखिका सेंटर फॉर पॉलिसी रिसर्च, नई दिल्ली की फेलो हैं 

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