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राजनीति का नया कीमियागर

Sun, 18 May 2014 07:00 PM IST
एम के वेणु
एम के वेणु Updated Sun, 18 May 2014 07:00 PM IST
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New alchemist of politics

लोकसभा चुनाव के नतीजे भाजपा नेतृत्व के उम्मीद भरे आकलन से भी बेहतर रहे हैं। एग्जिट पोल आने के बाद नरेंद्र मोदी ने कहा था कि हमारी पार्टी को इतनी सीटें मिलेंगी, जितनी 1991 के बाद किसी राजनीतिक पार्टी को नहीं मिली है। वह कह रहे थे कि उनकी पार्टी सबसे अच्छा प्रदर्शन करेगी, पर शायद 1991 में कांग्रेस को मिली सीटों से आगे न बढ़ पाए, जब कांग्रेस को 244 सीटें मिली थीं। पर चुनाव परिणाम ने भाजपा को सुखद आश्चर्य से भर दिया।

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यह हुआ कैसे? दरअसल उत्तर भारत में भाजपा के पक्ष में स्पष्ट लहर थी, जहां पार्टी ने 95 फीसदी सीटों पर कब्जा कर लिया। इसी ने कांग्रेस का नुकसान भी तय किया, जिसे उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड, राजस्थान, मध्य प्रदेश, पंजाब, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, दिल्ली और जम्मू-कश्मीर-यानी उत्तर भारत के 11 राज्यों की 233 लोकसभा सीटों में महज 10 सीटें मिलीं। उत्तर भारत में कांग्रेस की यह बदतरीन हार है। उत्तर भारत में विराट मोदी लहर ने उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे राज्यों में जाति के पुराने समीकरणों को ध्वस्त करने में मदद की। मायावती की पार्टी का प्रदर्शन तो स्तब्ध करने वाला है, जो उत्तर प्रदेश में खाता तक नहीं खोल पाई।
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वड़ोदरा में अपने विजय भाषण में मोदी ने दावे के साथ कहा कि इस चुनाव ने जाति के तमाम ढांचे तोड़ दिए हैं। साथ ही उनका यह भी कहना था कि इसके लिए पार्टी ने धार्मिक अपील का सहारा नहीं लिया। पर जब मतदाताओं की चेतना में हिंदुत्व की भावना पहले से जड़ जमाए हुए हो, तब धार्मिक अपील का सहारा लेने की जरूरत भी नहीं थी। इस लेखक को उत्तर प्रदेश और बिहार के अनेक युवा मतदाताओं ने बताया कि एक मजबूत हिंदू नेता के तौर पर मोदी की छवि को वे पसंद करते हैं। इसलिए मोदी ने भले ही विकास के मुद्दे उठाए हों, पर युवा मतदाताओं के मानस में उनके प्रति पहले से एक शक्तिशाली हिंदू नेता की जो छवि बनी थी, उसका उन्हें लाभ मिला। इसी ने भाजपा को उत्तर प्रदेश में जाति का ढांचा तोड़ने में मदद की। मुजफ्फरनगर दंगे से निपट पाने में अखिलेश सरकार की विफलता और आजम खान की उकसाऊ टिप्पणियों ने भी सपा-बसपा की जातिगत व्यूह संरचना तोड़ने में भाजपा की सहायता की। दलितों और पिछड़ी जातियों ने खुले तौर पर और भारी संख्या में भाजपा को वोट दिए। इसी कारण उत्तर प्रदेश की चौतरफा चुनावी लड़ाई में उसे अभूतपूर्व 42 फीसदी वोट मिले। भाजपा सपने में भी नहीं सोच सकती थी कि राज्य की 80 लोकसभा सीटों में से 71 पर वह कब्जा जमा लेगी। यहां उसे अधिक से अधिक 45 से 50 सीटें मिलने का अंदाजा था। राज्य में भाजपा का 42 प्रतिशत वोट सपा (22 फीसदी) और बसपा (19 फीसदी) के कुल मतों से भी अधिक है।
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इसका मतलब यह भी है कि पूर्वी उत्तर प्रदेश की अनेक सीटों पर, जहां मुलायम और मायावती पारंपरिक रूप से मजबूत हैं, वहां इन दोनों पार्टियों का कुल वोट भाजपा प्रत्याशियों को पड़े वोट से कम थे। ऐसा पहली बार हुआ है। जबकि पश्चिमी उत्तर प्रदेश में भाजपा ने अजित सिंह के रालोद के जनाधार को ध्वस्त कर दिया। वह और उनके बेटे जयंत, दोनों चुनाव हार गए। साफ है कि जाटों का बड़ा हिस्सा अजीत सिंह से छिटक गया है।

उत्तर प्रदेश में मोदी ने भले ही जाति आधारित ढांचे को नुकसान पहुंचाया है, पर भारतीय राजनीति में जाति का आधार खत्म हो जाने का निष्कर्ष देना जल्दबाजी है। अतीत में कई बार ऐसे नतीजे आए हैं, पर उसके बाद खासकर ग्रामीण मतदाताओं को जातिगत निष्ठाओं में वापस लौटते देखा गया है। पर यह भी सच है कि विकास और तेज शहरीकरण जातिगत ढांचों को बेअसर करता है। हालांकि भारत अभी उस तरह के शहरीकरण से दूर है।

दूसरी बड़ी चुनावी भूमि बिहार में भाजपा और उसके सहयोगियों ने अच्छा प्रदर्शन किया और 28 सीटें हासिल कीं। यह भी उनकी उम्मीद से अधिक था। पहले खुद भाजपा नेता कह रहे थे कि मुस्लिम-यादव वोट बैंक को अपने पाले में कर लालू प्रसाद ने वापसी कर ली है। पर बेहद पिछड़ी जातियों (ईबीसी) ने, जिनका वोट राज्य के कुल वोट का 33 फीसदी है, मोदी की ओर रुख किया। ऐसे में, लालू को रामविलास पासवान की उस लोजपा से भी कम सीटें मिलीं, जिसे मोदी लहर का फायदा पहुंचा। दरअसल बिहार के चुनाव अभियानों में भाजपा ने मोदी के पिछड़ी जाति में पैदा होने की सच्चाई का प्रचार किया था।

इस चुनाव में मोदी ने असंभव काम कर दिखाया है। वह मंडल और कमंडल जैसी दो विपरीत धारणाओं को जोड़ने के लिए एक नया रसायन तैयार करने में सफल हुए। गौरतलब है कि 1989 में मंडल का मुकाबला करने के लिए भाजपा में लालकृष्ण आडवाणी ने कमंडल का पासा फेंका था। लेकिन विकास का तर्क देकर मोदी इन दो धारणाओं को एक साथ जोड़ने में सफल हुए। पर संघ परिवार के दबाव को देखते हुए क्या उनके पास विकास के रास्ते पर चलने की प्रतिबद्धता होगी? जैसा कि अमित शाह ने दावा किया है, संघ परिवार के कार्यकर्ताओं ने ही उत्तर प्रदेश की 80 लोकसभा सीटों के लिए लगभग आठ लाख बूथ कार्यकर्ता मुहैया कराए।


मोदी ने यह कहकर अच्छी शुरुआत की है कि विकास के एजेंडे पर वह सभी सांसदों को साथ लेकर चलेंगे। केरल से चुने गए कांग्रेसी सांसद शशि थरूर के बधाई संदेश पर उन्होंने टिप्पणी की कि एक बेहतर भारत के लिए आइए, हम मिलकर काम करें। अगर यह भावना बनी रहे, तो भाजपा अपने बहुमत का बेहतर इस्तेमाल प्रशासन और सामाजिक एकता को मजबूत करने में कर सकती है।

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