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जीएम फसलों के नए पैरोकार

Thu, 11 May 2017 07:32 PM IST
के सी त्यागी
के सी त्यागी Updated Thu, 11 May 2017 07:32 PM IST
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New advocate of GM crops
के सी त्यागी

जीन संवर्धित (जीएम) फसलों को लेकर नीति आयोग की टिप्पणी से भारतीय किसान, कृषि संगठन और कृषि वैज्ञानिक हतोत्साहित हैं। जीएम फूड और फसलों के खिलाफ उठी तमाम आवाजों और विरोध को दरकिनार करते हुए नीति आयोग ने कृषि विकास के लिए जीएम बीजों के इस्तेमाल की पैरवी की है। आयोग ने हाल में जारी अपने तीन वर्षीय (2017-2020) ऐक्शन एजेंडा में कहा है कि जीएम बीज पिछले दो दशकों में एक नई शक्तिशाली तकनीक के रूप में उभरा है। इसने कृषि में उच्च उत्पादकता, बेहतर गुणवत्ता और उर्वरकों और कीटनाशकों के कम उपयोग का मार्ग प्रशस्त किया है।

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जब दुनिया के कई मुल्कों ने अपने यहां जेनेटिक संशोधनों से विकसित फसलों की खेती पर पाबंदी लगा दी है, तब हमारे यहां इसकी खेती के लिए दरवाजे खोलना गले नहीं उतरता। जीएम फसलों की व्यावसायिक खेती की प्रक्रिया को आसान बनाने के लिए यूपीए सरकार एक विधेयक लाई थी। आज केंद्र में पदासीन कई मंत्रियों ने तब उसका विरोध किया था। हालांकि सरकार ने इस मुद्दे पर अभी अपना रुख साफ नहीं किया है, पर  कृषि संगठनों ने इस पर कड़ी आपत्ति जताई है। स्वदेशी जागरण मंच ने भी इसका जोरदार विरोध किया है। यह एक दुष्प्रचारित तथ्य है कि जीएम फसलों से कृषि उत्पादकता बढ़ाई जा सकती है। 1951-52 में देश में मात्र 5.2 करोड़ टन अनाज का उत्पादन होता था। पर आज बिना जीएम तकनीक के 27 करोड़ टन अनाज का उत्पादन हो रहा है। जीएम अनुसंधान के व्यावसायीकरण के लगभग दो दशक बीतने और करोड़ों डॉलर खर्च करने के बाद भी कोई ऐसा जीएम बीज नहीं हैं, जो फसल की उपज बढ़ाता हो। सूखे का सामना करने या मिट्टी की गुणवत्ता को बचाने के लिए भी कोई जीएम फसल नहीं है।
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अमेरिकी बायोटेक कंपनी मोन्सेंटो ने करीब दस साल पहले बीटी कपास को भारतीय बाजार में उतारा था। पर यह न तो कीट प्रतिरोधी साबित हुआ, न ही अधिक उत्पादन देने वाला। पंजाब के कपास किसानों को बीटी कपास के कारण बेहद प्रतिकूल स्थितियों का सामना करना पड़ा। महाराष्ट्र, तेलंगाना, आंध्र प्रदेश और पंजाब में सबसे ज्यादा बीटी कपास की खेती करने वाले किसानों ने ही आत्महत्याएं की हैं। लागत ज्यादा और मुनाफा कम होने के बावजूद विदर्भ के किसान बीटी कपास उगाने को मजबूर हैं, क्योंकि वैकल्पिक बीज उपलब्ध नहीं हैं। बीटी बैगन को बाजार में उतारने की तैयारी मोन्सेंटो ने लगभग पूरी कर ली थी, पर नौ राज्यों की सरकारों, किसानों, पर्यावरण विशेषज्ञों और कृषि वैज्ञानिकों के विरोध के कारण सरकार को अपना कदम वापस लेना पड़ा था।
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नीति आयोग की नई सिफारिशों से लगता है कि वह जीएम फूड कंपनियों और उनके उत्पाद को देश में बिना किसी रोक-टोक के लाने की तैयारियों में लगा है। स्वामीनाथन टास्क फोर्स ने अपनी सिफारिश में कहा था कि किसी भी बायो तकनीक नियमन नीति का मकसद पर्यावरण की सुरक्षा, किसान परिवार का कल्याण, कृषि व्यवस्था का पर्यावरणगत एवं आर्थिक टिकाऊपन, उपभोक्ताओं के स्वास्थ्य एवं पोषण के मामले में सुरक्षा और देश की जैव सुरक्षा के हित में  होना चाहिए। आयोग ने इन चिंताओं पर ध्यान दिए बगैर जीएम फसलों की वकालत की है। बेशक हमें हर नई तकनीक का विरोध नहीं करना चाहिए, पर यदि यह कृषि और किसान हित की उपेक्षा कर चंद विदेशी कंपनियों के मुनाफे के लिए हो, तो विरोध जरूरी है।

-लेखक जदयू के राष्ट्रीय प्रवक्ता हैं

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