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Hindi News ›   Columns ›   Opinion ›   Netanyahu and Trump are not so bad, proving to be force for good on broader issue of Iranian threat

विश्लेषण: इतने बुरे भी नहीं नेतन्याहू और ट्रंप, ईरानी खतरे के व्यापक मुद्दे पर अच्छाई की ताकत साबित हुए

Tue, 01 Jul 2025 07:30 AM IST
david brux डेविड ब्रूक्स
Updated Tue, 01 Jul 2025 07:30 AM IST
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सार
अगर ट्रंप और नेतन्याहू के आलोचक यह निष्कर्ष निकालते हैं कि हमें हर उस चीज का विरोध करना चाहिए, जिसका ये दोनों समर्थन करते हैं, तो यह आपदा वाली स्थिति ही होगी। मैं भी कोई इन नेताओं का समर्थक नहीं हूं, लेकिन यह मानना ही होगा कि पश्चिम एशिया की सूरत बदलने के लिए जो भी जरूरी था, वह ये कर रहे हैं।
 
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Netanyahu and Trump are not so bad, proving to be force for good on broader issue of Iranian threat
डोनाल्ड ट्रंप और नेतन्याहू - फोटो : एएनआई

विस्तार

अलग राजनीतिक झुकाव रखने वाले बहुत से लोगों की तरह मैं भी पिछले कुछ दशकों से इस्राइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के खिलाफ रहा हूं। फिर भी मेरे जैसे उनके आलोचकों को एक असहज तथ्य का सामना करना पड़ रहा है कि पिछले 10 महीनों में, नेतन्याहू ने पश्चिम एशिया की सूरत बदलने के अपने उद्देश्य को प्रभावशाली ढंग से पूरा किया है। उन्होंने हमास और हिजबुल्ला को कमजोर किया है, ईरानी धर्मतंत्र को दयनीय और जीर्ण-शीर्ण बना दिया है। इस्राइल ने अपने दुश्मनों पर अपनी विशाल सैन्य और खुफिया सर्वोच्चता का प्रदर्शन किया है। इसने दिखा दिया कि इसके एजेंट दुश्मन संगठनों में घुसपैठ कर सकते हैं और उनके आतंकी नेताओं को खोजकर मार सकते हैं।



इसमें ईरान के परमाणु कार्यक्रम पर इस्राइल-अमेरिका का हमला भी शामिल है। हमें अब तक नहीं पता कि उस हमले से कितना नुकसान हुआ है। पेंटागन की एक प्रारंभिक रिपोर्ट में पाया गया कि हमलों ने ईरानी परियोजना को कुछ महीने पीछे धकेल दिया है। लेकिन विज्ञान एवं अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा संस्थान सहित कई अन्य रिपोर्टों में पाया गया कि इस हमले ने ईरान के संवर्धन कार्यक्रम को ‘प्रभावी रूप से नष्ट’ कर दिया।


हम समय रहते जान सकते हैं कि बमबारी से क्या हासिल हुआ। हम यह भी जानते हैं कि इस्राइल और अमेरिका के पास ईरान पर कभी भी और कहीं भी हमला करने की इच्छाशक्ति और क्षमता है। हम जानते हैं कि यदि ईरान अपने परमाणु कार्यक्रम को पुनः शुरू करता है, तो इस्राइल और अमेरिका के पास इससे भी अधिक विनाशकारी तथा शासन-तंत्र के लिए खतरा पैदा करने वाली क्षमता है। हम यह भी जानते हैं कि ईरान और उसके सहयोगियों ने सात अक्तूबर, 2023 के बाद से कुछ पागलपन भरी आत्म-विनाशकारी गलतफहमियां पाल ली हैं, जो तेहरान में बैठे धर्म-शासकों के लिए अशुभ संकेत हैं। मैं यह नहीं कह रहा हूं कि सात अक्तूबर, 2023 के हमले पर नेतन्याहू की सभी तरह की प्रतिक्रिया का समर्थन करता हूं। मैं तो बस यह कह रहा हूं कि नेतन्याहू और डोनाल्ड ट्रंप जैसे लोग कम से कम ईरानी खतरे के व्यापक मुद्दे पर अच्छाई की ताकत साबित हुए हैं।

हममें से जो लोग नेतन्याहू और ट्रंप से नफरत करते हैं, उन्हें थोड़ी विनम्रता दिखानी चाहिए और कुछ पुनर्विचार करना चाहिए। खैर, जो कुछ भी हुआ, उससे हम क्या सीख सकते हैं? मुझे लगता है कि नेतन्याहू का पिछले कई दशकों से ईरान के प्रति जुनूनी होना सही था। 1979 की ईरानी क्रांति विश्व इतिहास की एक महत्वपूर्ण घटना थी। तब से ईरान पश्चिम एशिया में अस्थिरता का मुख्य स्रोत रहा है। उस क्षेत्र के अन्य मुद्दे गौण हैं। पिछले कुछ दशकों में, ईरान ने आतंकवादी लड़ाकों और उन्नत हथियारों के साथ इस्राइल के चारों ओर व्यवस्थित रूप से फंदा बनाया है। अयातुल्ला अली खामनेई ने घोषणा की है कि 2040 में इस्राइल का अस्तित्व नहीं रहेगा।

दशकों से, इस्राइल और अमेरिका, दोनों ही इस फंदे को बर्दाश्त करने को तैयार थे। लेकिन सात अक्तूबर को यह बदल गया। इस्राइल को यह जानकर आश्चर्य और निराशा हुई कि उसके पास जानलेवा हमलों का अनुमान लगाने और उन्हें रोकने की क्षमता नहीं है। अचानक से यह फंदा असहनीय लगने लगा। उसने हिजबुल्ला और ईरानी परमाणु हथियारों की भविष्य की आशंका सहित पूरे फंदे को खत्म करने का प्रयास किया, और अब यह सही निर्णय लगता है।

कभी-कभी मैं लॉन पर लगे साइनबोर्ड देखता हूं कि ‘युद्ध इसका उत्तर नहीं है’, लेकिन यहां एक ऐसी परिस्थिति थी, जिसमें युद्ध ही इसका उत्तर था। इस्राइल हिजबुल्ला को हराने में सक्षम था, क्योंकि यह अधिक प्रभावी और अधिक शक्तिशाली है। ईरान ने बमबारी का कमजोर जवाब दिया है, क्योंकि वह कम शक्तिशाली है। अन्य अमेरिकी प्रशासनों ने कल्पना की थी कि वे किसी तरह की बातचीत के जरिये ईरान को निष्प्रभावी कर सकते हैं, लेकिन 40 से ज्यादा वर्षों से ईरान ने पश्चिम के साथ मेल-मिलाप से लगातार इन्कार किया है। नेतन्याहू की यह सोच भी सही थी कि कभी-कभी सेना को हराने की तुलना में किसी आख्यान को हराना ज्यादा महत्वपूर्ण होता है।

यह सबक हमें बार-बार सीखना होगा कि हमारे शत्रु वास्तव में हमारे शत्रु हैं। 1930 के दशक में ब्रिटिश सत्ता का एक बड़ा हिस्सा जर्मनी गया और यह दावा करते हुए लौटा कि हिटलर एक अच्छा व्यक्ति है, जिसके साथ व्यापार किया जा सकता है। वे उस व्यक्ति में निहित बुराई को समझ नहीं सके। ईरान, हमास और हिजबुल्ला के प्रति पश्चिमी प्रतिक्रिया में भी यही नकार का भाव व्याप्त था। लेकिन नेतन्याहू, अपनी तमाम नैतिक कमियों के बावजूद, ईरानी वास्तविकता को उसके असली नाम से पुकारने और उससे स्पष्ट निष्कर्ष निकालने को तैयार हैं।

मैं नेतन्याहू या ट्रंप की तरफदारी नहीं कर रहा हूं। बल्कि मैं उन दिनों को याद कर रहा हूं, जब इस धरती पर उदारवादी लोग होते थे। एक परंपरा थी, जो ऐसे लोगों से बनी थी, तब लोकतंत्र और मानवाधिकारों के हिमायती थे, लेकिन वे यह भी समझते थे कि एक खतरनाक दुनिया में स्थिरता, शांति और सभ्यता के लिए अमेरिका एक आवश्यक शक्ति है। पर इराक युद्ध की विफलताओं के बाद उदारवादियों की परंपरा खत्म हो गई।

मैं ईरान पर अमेरिकी बमबारी के बाद कई डेमोक्रेटिक नेताओं की प्रतिक्रियाओं को देखता हूं और पाता हूं कि इनमें से कई लोग सहज रूप से यह मानते हैं कि अमेरिकी शक्ति ही दुनिया की पहली समस्या है। वे मानते हैं कि यदि ट्रंप ऐसा करते हैं, तो यह बुरा ही होगा, और इसमें स्वतंत्र सोच की आवश्यकता नहीं है। लेकिन यह एक आपदा होगी, अगर नेतन्याहू और ट्रंप के आलोचक यह निष्कर्ष निकालते हैं कि हमें उन सभी चीजों के खिलाफ होना चाहिए, जिनका वे समर्थन करते हैं। इसका मतलब होगा भेड़ियों को आजाद छोड़ देना। इंटरनेशनल एटॉमिक एनर्जी एजेंसी (आईएईए) के डायरेक्टर जनरल राफेल ग्रॉसी ने युद्धविराम के बाद हाल ही में फिर से आशंका जताई है कि ईरान अमेरिका द्वारा नष्ट किए गए परमाणु स्थलों के बावजूद फिर से यूरेनियम कार्यक्रम को आगे बढ़ाने की दिशा में काम करेगा। ईरान आसानी से परमाणु हथियार बनाने की अपनी जिद छोड़ने वाला नहीं है।  

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