Nepal Politics: नेपाल का विपक्षहीन लोकतंत्र, हर राजनीतिक दल अवसरवादी
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विस्तार
कुछ छोटे दक्षिण एशियाई देशों में लगातार यह प्रवृत्ति दिखाई देती है कि वे भारत या चीन के बीच झूलते रहते हैं। यह इस बात पर निर्भर करता है कि राष्ट्रीय चुनाव में कौन-सी पार्टी या गठबंधन जीतता है। राजनीतिक प्रभाव, आकर्षक योजनाएं और भी बहुत कुछ उसी के अनुसार टलते रहते हैं। इसी तरह जब तक पार्टी सत्ता से बाहर न हो जाए, यह चर्चा चलती रहती है, जिसमें एक 'बड़े भाई' का पक्ष लिया जाता है और दूसरे को खलनायक बना दिया जाता है। मालदीव में राष्ट्रपति का चुनाव इसी वर्ष सितंबर में होना है। पिछले वर्ष भारी आर्थिक संकट से गुजरने वाले श्रीलंका में राष्ट्रपति चुनाव 2024 में होगा। अपने आसपास होने वाले इन घटनाक्रमों में चीन और भारत, दोनों के हित जुड़े हैं। फिलहाल, पिछले नवंबर में हुए नेपाल के संसदीय चुनाव में खंडित जनादेश आने के बाद कम्युनिस्टों के नेतृत्व वाली एक नई गठबंधन सरकार सत्ता में आई है, जिसे चीन की जीत बताया जा रहा है।
नेपाल के नए प्रधानमंत्री पुष्प कमल दहल ‘प्रचंड’ ने कहा है कि वह 'नकारात्मकता, अनादर और प्रतिशोध की राजनीति के बजाय आम सहमति, सहयोग और आपसी विश्वास की राजनीति' को बढ़ावा देना चाहते हैं। लेकिन उनकी सरकार का गठन इरादे और प्रभाव, दोनों के मामले में गंभीर संदेह पैदा करता है। उनकी सरकार सर्वसम्मति की सरकार है, क्योंकि जिस शेर बहादुर देउबा के गठबंधन को प्रचंड ने छोड़ दिया, उन्होंने भी इनकी सरकार के प्रति समर्थन जताया है। इसका मतलब यह है कि लोकतांत्रिक नेपाल में अब विपक्ष नहीं है। यह नौटंकी कब तक चलेगी, यह देखने वाली बात होगी।
प्रचंड ने अपने धुर विरोधी केपी शर्मा ओली के साथ सत्ता साझा करने का समझौता किया है, जिसके तहत ढाई वर्ष बाद उनकी जगह पर ओली प्रधानमंत्री बनेंगे। लेकिन उसी ओली ने उसी प्रचंड के साथ पहले के समझौते को तोड़ते हुए, नेपाल में राजनीतिक गतिरोध और अस्थिरता पैदा करके प्रधानमंत्री पद छोड़ने से इनकार कर दिया था। क्या इतिहास अपने आप को दोहराएगा? वर्ष 1990 में लोकतंत्र की बहाली के बाद किसी भी सरकार ने नेपाल में पांच वर्ष का कार्यकाल पूरा नहीं किया है। नेपाली विश्लेषक कहते हैं कि प्रचंड-ओली गठबंधन के, जिसे देउबा बाहर से समर्थन दे रहे हैं, अपवाद होने की संभावना नहीं है। वर्ष 2004 से 2022 के बीच नेपाल 10 प्रधानमंत्रियों, 15 सरकारों और सैकड़ों मंत्रियों का साक्षी रहा है। नए प्रधानमंत्री के रूप में दहल की नियुक्ति से पहले यूएमएल और माओवादी सेंटर के बीच सत्ता-साझा करने के समझौते के अनुसार, यूएमएल अपने उम्मीदवारों को प्रतिनिधि सभा के सभापति और राष्ट्रपति के रूप में चुनेगा।
वास्तव में नेपाल में हर राजनीतिक दल अवसरवादी है। पांच बार प्रधानमंत्री रहे देउबा ने प्रचंड के साथ यही सौदा किया था, जब पिछले नवंबर चुनाव में दोनों ने गठजोड़ किया था, लेकिन मतदान खत्म होते ही देउबा ने चुप्पी साध ली। सबसे ज्यादा 89 सीटें जीतने के बाद वह छठी बार पूरे पांच साल के लिए प्रधानमंत्री बनना चाहते थे। देउबा की बेरुखी ने प्रचंड के लिए रास्ता खोल दिया। नेपाली कांग्रेस ने अपने तत्कालीन गठबंधन सहयोगियों के साथ संघीय और सात में से छह प्रांतीय सरकारें बनाने का अवसर खो दिया। देउबा फ्लोर टेस्ट के लिए दबाव डाल सकते थे, जिसका नई सरकार को सामना करना चाहिए था। लेकिन गठबंधन टूटने और संख्या बल कम होने के साथ उन्होंने विपक्षी नेता की जिम्मेदारी से बचने का विकल्प चुना।
इससे नेपाली कांग्रेस के भीतर दरार पैदा हो गई और दो महासचिवों ने प्रचंड सरकार के खिलाफ मतदान किया। अब नेपाली कांग्रेस न तो सरकार में है और न ही विपक्ष में, लिहाजा भविष्य में भले ही वह विलुप्त न हो, पर उसे क्षरण का सामना करना पड़ सकता है। अगर नेपाली कांग्रेस को नुकसान हुआ है, तो सत्ता की भूख ने नेपाल के कम्युनिस्टों को भी कमजोर किया है। यह उनके चुनावी प्रदर्शन से परिलक्षित होता है। जब 2017 के चुनाव में प्रचंड के यूएमएल और ओली के माओवादी सेंटर ने गठजोड़ किया था, तो उन्होंने क्रमशः 121 और 53 सीटें जीती थीं। नया आंकड़ा क्रमशः 79 और 32 सीटों का है। बाद में दोनों दल नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी (एनसीपी) के रूप में एक विशाल वामपंथी ताकत को जन्म देने के लिए एकजुट हुए।
एकीकृत पार्टी ने केंद्र के साथ-साथ देश के सात प्रांतों में से छह में सरकारें बनाईं। लोगों ने कम्युनिस्ट गठबंधन को पांच साल तक शासन करने का भारी जनादेश दिया था; उन्होंने स्थिरता के पक्ष में मतदान किया था। पर यह होना नहीं था। जैसा कि उनके विलय के समय संदेह था, दोनों कम्युनिस्ट पार्टियां एक साथ इसलिए नहीं आई थीं कि उनमें वैचारिक समानता थी, बल्कि इसलिए कि यह विलय ओली और प्रचंड, दोनों की राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं के अनुकूल था। अब वे फिर से एकजुट हो गए हैं, यह उनका अवसरवाद है, न कि साम्यवादी पुनरुत्थान। राजनीतिक अंतर्कलह और एक स्थायी सरकार बनाने में विफलता लंबे समय से चली आ रही राजनीतिक अस्थिरता को बढ़ा सकते हैं, जो एक नवजात लोकतंत्र के लिए जटिल स्थिति पैदा कर सकता है।
नेपाली भारत और चीन, दोनों को बाहरी कारक मानते हैं, जिनसे वे बच नहीं सकते और उन्हें दोनों के बीच संतुलन बनाना चाहिए। वे अब तक इसमें विफल रहे हैं। प्रचंड और ओली, दोनों चीनी समर्थक और भारत विरोधी माने जाते हैं। वास्तव में ओली ने भारत के खिलाफ एक अभियान चलाया, विवादास्पद मुद्दों को उठाया, भारतीय क्षेत्र के कुछ हिस्सों पर दावा करने वाले नक्शे जारी किए और यहां तक कि भारत पर कोविड-19 महामारी फैलाने का आरोप लगाया। क्या फिर से ऐसे अभियानों की पुनरावृत्ति होगी, यह शांत होकर भारत को देखने की जरूरत है।
जैसा कि पूर्व प्रधानमंत्री बाबूराम भट्टाराई ने कहा है, 'नेपाल यदि भारत-चीन के बीच एक पुल की भूमिका निभाने के लिए तैयार है, तो यह केवल भारत-चीन प्रतियोगिताओं के उतार-चढ़ाव और भारत-चीन तालमेल के जरिये ही पनप सकता है।' लेकिन इसका लोकतंत्र बहुत नाजुक और इसकी राजनीति बहुत निराशाजनक है। नेपाली संविधान का मसौदा तैयार करने वाले और नेपाल समाजवादी पार्टी के प्रमुख भट्टाराई कहते हैं : 'नेपाल की राजनीति विश्व कप फुटबॉल फाइनल की तरह सनसनीखेज हो गई।' इस आकलन में स्पष्ट रूप से वहां की राजनीतिक सनक की झलक मिलती है।