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नेपाल संकट का नया अध्याय: देउबा के गठबंधन में सेंध लगाने में जुटे ओली

Sun, 18 Jul 2021 08:10 AM IST
प्रदीप कुमार प्रदीप कुमार
Updated Sun, 18 Jul 2021 08:10 AM IST
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Nepal political crisis stable government challenge for PM Sher Bahadur Deuba KP Sharma Oli is trying to break Deuba alliance
शेर बहादुर देउबा और केपी शर्मा ओली - फोटो : सोशल मीडिया

प्रधानमंत्री की कुर्सी से चिपके रहने के लोभ ने केपी शर्मा ओली और उनकी समर्थक राष्ट्रपति विद्या देवी भंडारी को नैतिकता के धरातल से पटक कर अपमानजनक हालत में पहुंचा दिया। सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर ओली को पद छोड़ना पड़ा और शेर बहादुर देउबा नए प्रधानमंत्री बने। भंडारी-ओली की जोड़ी के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट की कुछ टिप्पणियां सांविधानिक नजीर के रूप में देखी जा सकती हैं।


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राष्ट्रपति कार्यालय की याचिका ठुकराते हुए अदालत ने कहा, 'अगर राष्ट्रपति के कार्य संविधान के अनुरूप न हों, तो सुधारात्मक कदम उठाना सुप्रीम कोर्ट की जिम्मेदारी हो जाता है। राष्ट्रपति का फैसला कार्यपालिका के दायरे में आता है। इस स्थिति में राष्ट्रपति के कार्य अगर न्यायिक समीक्षा के दायरे से बाहर रखे जाएं, तो वह सत्ता नियंत्रण और संतुलन के पृथक्करण के सिद्धांतों पर प्रहार होगा।' इस फैसले के बाद सुप्रीम कोर्ट के एक पूर्व जज सहित अनेक लोगों ने भंडारी के इस्तीफे की मांग की है।

पर राजनीतिक संकट अभी जारी है। देउबा के बहुमत हासिल करने तक और उसके बाद गठबंधन सलामत रहता है, तो डेढ़ साल तक सरकार चलती रहेगी। नहीं तो छह महीने में चुनाव होगा। बहुत दारोमदार मधेसी नेता उपेंद्र यादव की जनता समाजवादी पार्टी पर है। ओली ने कुर्सी छोड़ी है, कुर्सी का लालच नहीं। आशंका है कि वह जनता समाजवादी पार्टी के सांसदों को तोड़ सकते हैं। ओली ने विदाई संदेश में कहा, 'बहुदलीय लोकतंत्र में आस्था रखने वाले कोर्ट के निर्णय से चिंतित हुए हैं।' यह सुप्रीम कोर्ट और देउबा सरकार को उनकी खुली चुनौती है।

ओली के कुछ बयान भारत के लिए भी गौरतलब हैं। शासन के अंतिम दौर में उन्होंने कहा था, 'मैंने भारत के साथ अपनी समस्याएं हल कर ली हैं। अतीत की गलतफहमियों में फंसे रहने के बजाय हमें सकारात्मक संबंधों की ओर बढ़ना चाहिए।' काठमांडू से आने वाली रिपोर्टों के मुताबिक, ये समस्याएं व्यक्तिगत नहीं थीं; ओली ने लिपुलेख-लिंपियाधुरा-कालापानी विवाद पर अपना अड़ियल रुख छोड़ने का संकेत दिया। ओली ने ही चीन के इशारे पर इस विवाद को तूल देते हुए नेपाल का नक्शा बदल डाला था। वह नक्शा संविधान में शामिल हो चुका है, इसलिए अब हल के लिए संविधान में संशोधन करना होगा। नेपाली कांग्रेस हो या माओवादी, सभी ने भारत विरोध को नेपाली राष्ट्रवाद का पर्याय-सा बना दिया।

नेपाल की सबसे खतरनाक समस्या है नस्लवाद। पहाड़ का बांभन-ठकुरी वर्चस्ववादी वर्ग लोकतंत्रीकरण के मार्ग का सबसे बड़ा रोड़ा है। नेपाल की करीब 50 फीसदी आबादी भारत की सीमाओं से लगे तराई इलाके में रहती है। ये मधेसी दूसरे दर्जे के शहरी हैं। स्थायी शांति और समृद्धि के लिए बुनियादी शर्त है कि समस्त समुदायों में भागीदारी की भावना बनी रहे। ओली ने अंतिम दौर में मधेसी नेताओं को पटाने की कोशिश की। पर कुछ मौकापरस्त मधेसी नेताओं को मंत्री बनाने से नहीं, आम मधेसी को व्यापक भागीदारी देने से मसला हल होगा।

विगत मई में जेएनयू में पढ़े कम्युनिस्ट नेता और पूर्व प्रधानमंत्री बाबूराम भट्टराई ने कहा कि राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय ताकतें नेपाल के संघीय, गणतांत्रिक, लोकतांत्रिक संविधान को उखाड़ कर पुरानी हिंदू राजतंत्री व्यवस्था कायम करना चाहती हैं। उन्होंने ओली पर इसमें सहभागी होने का आरोप लगाया। पर बिना खून-खराबे के सर्वमान्य राजनीतिक व्यवस्था कहीं भी नहीं बदली जा सकती है। नेपाल में चर्चित 12 सूत्री समझौता नई दिल्ली में हुआ था और राजतंत्र के खात्मे पर भी भारत की सहमति थी। बड़ी वजह यह कि राजतंत्र प्रायः भारत-विरोधी रहा। राजतांत्रिक व्यवस्था चीन की अहसानमंद थी, क्योंकि बीजिंग माओवादियों के खिलाफ महल का साथ दे रहा था। नेपाल में उथल-पुथल का बीजारोपण 1959 में ही हो गया था, जब राजा महेंद्र ने विधिवत चुने गए प्रथम प्रधानमंत्री बीपी कोइराला को बर्खास्त कर दिया था। आशा की जाए, इतिहास दोहराया नहीं जाएगा।

नेपाली पत्रकार अमीश राज मुलमी की हाल में आई किताब ऑल रोड्स लीड नॉर्थ भारत के लिए संभावित खतरों का संकेत देती है। वह लिखते हैं, 'विश्व में बौद्धों की दूसरी सबसे बड़ी आबादी चीन में है। 2019 में 1,70,000 चीनी यात्री नेपाल आए। धार्मिक पर्यटन जनता के बीच संपर्क बढ़ाने की बीजिंग की नीति के अनुरूप है। बौद्ध धर्म चीन की सॉफ्ट पावर का एक उपकरण है, हालांकि दलाई लामा जिस मत का अनुसरण करते हैं, चीन तिब्बत में जनता को उससे विमुख करता है। प्रत्याशा है, भविष्य में दो दलाई लामा होंगे। एक, जिनका समर्थन चीन करेगा और दूसरा, जिन्हें निर्वासित तिब्बती चुनेंगे।' चीन अपने दलाई लामा के लिए बहुत देशों का समर्थन जुटा लेगा। भारत के लिए यह नया संकट होगा। प्रधानमंत्री मोदी की दलाई लामा को जन्म दिवस पर बधाई भविष्य का दिशा सूचक मानी जा सकती है। भारत की नेपाल नीति भू-सामरिक तकाजों के अनुसार भावना रहित होकर तय करनी पड़ेगी।

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