नेपाल अब भी संभावना है
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भारत और नेपाल के लोगों के बीच बहुत पहले से धार्मिक और सांस्कृतिक निकटता रही है। पर आज राजनीतिक व आर्थिक मुद्दों पर दोनों देशों के बीच जो अविश्वास है, उसने एक ऐसी खाई पैदा कर दी है, जिसे तत्काल और पूरी तरह पाटे जाने की जरूरत है। देर से ही सही, पर ऐसा करने के लिए ठोस कदम उठाए जा रहे हैं, यह शुभ संकेत है। किन्हीं और दो देशों के संबंध इतने घनिष्ठ, फिर भी इतने जटिल नहीं हैं, जितने भारत और नेपाल के हैं। दोनों देश अपनी धार्मिक और सांस्कृतिक जड़ों को नहीं भूल सकते। भारत वह देश है, जहां नेपाल के लोग अध्ययन करने, रोजगार खोजने, तीर्थयात्रा करने के लिए आते हैं। फिर भी नेपाल के कुछ लोग भारत पर उसके आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप करने और नेपाल को हल्के में लेने का आरोप लगाते हैं।
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प्रधानमंत्री बनने के बाद से नरेंद्र मोदी तीन बार नेपाल की यात्रा कर चुके हैं। मई, 2018 में नरेंद्र मोदी की नेपाल यात्रा ने उसके महत्व और दोनों देशों के बीच संबंधों में तनाव, दोनों को दर्शाया। 2015 की कथित आर्थिक नाकेबंदी से पैदा हुई कटुता खत्म करने के लिए मोदी ने नेपाल की यात्रा की, जिसमें काठमांडू ने भी सहयोग किया। हालांकि उन दिनों की यादें नेपाली समृति से पूर्णतः मिट नहीं सकतीं। इसी की प्रतिक्रिया में नेपाल अभूतपूर्व रूप से चीन की ओर झुका और चीन ने भी उसे गले लगाया, जो भारत के लिए झटका था।
2015 की नाकेबंदी ने नेपाली नेताओं को यह सुनिश्चित करने का विवेक प्रदान किया कि पड़ोसी देश पर ऐसी निर्भरता दोबारा नहीं होनी चाहिए, जो नेपाली लोगों को घुटने पर ला दे। कम्युनिस्ट सरकार के नेतृत्व में नेपाल के लिए चीन की ओर झुकाव स्वाभाविक है, पर यह भारत के लिए चेतावनी की घंटी भी है।
अच्छी बात यह है कि दोनों देश, कम से कम अभी, आपसी संबंधों में विश्वास के खोए तत्वों को वापस लाने के लिए आगे बढ़ने के प्रति अधिक आत्मविश्वास महसूस करते हैं। मोदी और ओली, दोनों मानते हैं कि संबंधों में सुधार का वक्त आ गया है। मई, 2018 में ओली ने जनकपुर में मोदी की अगवानी की। ओली के साथ मोदी ने रामायण सर्किट (जनकपुर और अयोध्या के बीच सीधी बस सेवा) का उद्घाटन किया। इसमें साझा सांस्कृतिक एवं धार्मिक संबंधों पर फोकस था, जो सिर्फ सरकार से सरकार को जोड़ने के बजाय नेपाल और भारत के लोगों को जोड़ता है। बुनियादी ढांचे में सुधार करने के लिए बिहार के रक्सौल को काठमांडू से जोड़ने वाली रणनीतिक रेलवे लाइन के निर्माण के लिए एक सहमति पत्र (एमओयू) पर हस्ताक्षर किए गए। बिम्सटेक की चौथी बैठक के लिए मोदी की दो दिवसीय काठमांडू यात्रा के दौरान दोनों प्रधानमंत्रियों ने तीन बैठकों में आधिकारिक और अनौपचारिक वार्ता की, जिसे आधिकारिक रूप से गर्मजोशी भरा बताया गया। बेहतर द्विपक्षीय रिश्तों के लिहाज से शीर्ष स्तरीय दौरे शुभ संकेत होते हैं। यह दोनों देशों के हित में है कि वे किसी भी तरह के विवाद से बचें।
इन घटनाक्रमों के बीच चीनी बंदरगाहों पर नेपाली पहुंच को औपचारिकता प्रदान की गई, जो भारतीय बंदरगाहों पर तीसरे देश की निर्यात निर्भरता को खत्म करता है। इससे साफ हो जाता है कि आर्थिक नाकेबंदी खत्म होने के तुरंत बाद 2016 में भारत के साथ समझौता करने पर ओली को उनके पद से क्यों हटा दिया गया था। भारी बहुमत के साथ उनकी सत्ता में उस समय वापसी हुई, जब चीन भी हिंद महासागर क्षेत्र में अपने पैर फैला रहा है।
नेपाल पर अपनी पकड़ खोने के बजाय भारत को उसके साथ ज्यादा समानता से बर्ताव करना सीखने की जरूरत है। नेपाल को अब भी भारत तक पहुंच की आवश्यकता होगी, लेकिन इसके लिए भारत को और ज्यादा सुलभ होने की जरूरत है। यह इसलिए, क्योंकि नेपाल जिस चीनी बंदरगाह का इस्तेमाल करने जा रहा है, वह नेपाल-चीन सीमा से 3,000 किलोमीटर से ज्यादा दूर है। इस समय नेपाल तीसरे देशों के साथ व्यापार करने के लिए कोलकाता और विशाखापट्टनम बंदरगाह का उपयोग करता है। कोलकाता भारत-नेपाल सीमा से 742 किलोमीटर दूर है, जबकि विशाखापट्टनम सीमा से करीब 1,400 किलोमीटर दूर है।
चीन को शिगेट्से से नेपाली सीमा के पास क्यिरोंग तक अपने रेलवे लाइन का विस्तार करने में कुछ वर्ष लग सकते हैं। यद्यपि नेपाल चीन की ‘वन बेल्ट-वन रोड’ पहल का हिस्सा है, लेकिन यह हिमालयी देश पर है कि बीआरआई के तहत परियोजनाओं को चुनने के लिए वह जरूरी लागत-लाभ विश्लेषण करे, और इस प्रक्रिया में अपने राष्ट्रीय हितों को महत्व दे। इस प्रकार, नेपाल के ज्यादा अनुकूल होने के कारण भारत को धीरे-धीरे, पर दृढ़ता से वहां अपना प्रभुत्व पुन: स्थापित करने का समय और मौका है।
कुछ अन्य मुद्दे भी हैं, जिन पर भारत को गंभीरता से सोचने की जरूरत है। यह नेपाल के नदी जल से संबंधित है, जिसे भारत बड़े पैमाने पर साझा और उपयोग करता है। भारतीय मीडिया को भी नेपाल में लो प्रोफाइल रहने की जरूरत है। नेपाल में जब भूकंप आया था, तब भारत ने सबसे पहले उसकी मदद की, लेकिन भारतीय टीवी चैनलों ने इसे इस तरह प्रसारित किया कि नेपाली लोगों को भारत के सामने अपनी तुच्छता का एहसास हुआ। इससे बचना चाहिए।
आखिरी, पर महत्वपूर्ण बात है सुरक्षा का मुद्दा और सैन्य रिश्ते। नेपाल पुणे में बिम्सटेक के सैन्य अभ्यास में शामिल नहीं हुआ, जिसकी मेजबानी भारत कर रहा था। लेकिन नेपाल चीन द्वारा आयोजित संयुक्त सैन्याभ्यास में शामिल हुआ। इस पर भारतीय मीडिया ने ओली को चीन समर्थक बताया। हालांकि मोदी ने इसकी अनदेखी कर दी। अगर भारत यह महसूस करता है कि चीनी ड्रैगन पूरे दक्षिण एशिया में तेजी से अपने पांव पसार रहा है, तो वह पड़ोसियों को समृद्ध एवं सैन्य रूप से ताकतवर चीन की तरफ जाने से नहीं रोक सकता। चाहे वह नेपाल हो या कोई और, पड़ोसी के प्रति शत्रुतापूर्ण व्यवहार करने के बजाय चतुराई इसी में है कि 'मैं भी' जैसी रणनीति अपनाई जाए। यह मौजूदा समय का संकेत है। भारत के पास अब अपने पड़ोसियों की देखभाल करने के लिए पर्याप्त संसाधन और समझ है।