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पाकिस्तान की राह पर नेपाल: चीन से करीबी तय करेगी द. एशियाई भू-राजनीतिक परिदृश्य का भविष्य, भारत की सतर्कता अहम
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नेपाल के पीएम केपी शर्मा ओली और चीन के राष्ट्रपति शी जिपिंग
- फोटो :
अमर उजाला
विस्तार
चीन के प्रति झुकाव रखने वाले घोर कम्युनिस्ट नेता नेपाल के प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली ने अपने देश को चीन की बेल्ट ऐंड रोड इनीशिएटिव (बीआरआई) परियोजना से जोड़ लिया है। नेपाल के विकास आख्यान में ‘टर्निंग पॉइंट’ के रूप में इस निर्णय को लेकर काठमांडो में जश्न मनाया गया, जिससे भारत के साथ ऐतिहासिक रिश्तों में दरार पड़ने का खतरा है, क्योंकि भारत ने शुरू से ही बीआरआई के जोखिम भरे ढांचे का विरोध किया है।देश की राजनीतित गतिशीलता पर असर
प्रधानमंत्री के रूप में ओली के पिछले कार्यकाल में नेपाल के विवादास्पद नक्शे में भारतीय क्षेत्रों लिंपियाधुरा, लिपुलेख और कालापानी को शामिल किया गया था, जिसे भारत ने सख्ती के साथ खारिज कर दिया था।
हैरानी की बात यह है कि नेपाल की गठबंधन सरकार में नेपाली कांग्रेस (भारत समर्थक) का वर्चस्व है। इसके बाद भी ओली ने बीआरआई के बारे में आम सहमति लेने की जहमत नहीं उठाई है, जो भविष्य में हिमालयी देश में राजनीतिक गतिशीलता पर असर डाल सकता है। इससे पहले 13 जुलाई, 2020 को नेपाली कवि भानुभक्त आचार्य की 206वीं जयंती समारोह के दौरान ओली ने यह दावा कर विवाद खड़ा किया था कि भगवान राम से जुड़ा ऐतिहासिक राज्य अयोध्या भारत में नहीं, बल्कि नेपाल में बीरगंज के पश्चिम में स्थित है।
ओली ने छेड़ दी थी बहस
ओली की टिप्पणियों ने भारत और नेपाल में संवेदनशील सांस्कृतिक और धार्मिक संबंधों को छूते हुए एक बहस छेड़ दी। वहीं ओली की टिप्पणियों को कुछ लोग राजनीतिक नजरिये से, तो कुछ नेपाल की विरासत के दावे के रूप में देख रहे हैं। हालांकि बीआरआई के बारे में प्रधानमंत्री का निर्णय बड़ा दांव साबित होगा, जो नेपाल की भू-राजनीतिक पहचान को पुनर्परिभाषित कर सकता है। नेपाल ने बीआरआई को अपनाकर अपने तटस्थ रुख से हटकर भारत और अमेरिका से टकराव लेने के संकेत दिए हैं।
ट्रांस-हिमालयन मल्टी-डायमेंशनल कनेक्टिविटी नेटवर्क
नेपाल का यह बदलाव पड़ोसी और वैश्विक शक्तियों के हितों के बीच कुशल कूटनीति को संदर्भित करने की मांग करता है। ट्रांस-हिमालयन मल्टी-डायमेंशनल कनेक्टिविटी नेटवर्क के तहत परिवर्तनकारी बुनियादी ढांचा परियोजनाओं का वादा करते हुए इस पहल में आर्थिक अस्थिरता और भू-राजनीतिक उलझनों के खासे जोखिम हैं। चीन की ‘ऋण जाल कूटनीति’ ने कई देशों को अपने जाल में फांस लिया है। विशेष रूप से पाकिस्तान को, जिस पर चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे (सीपीईसी) के तहत अनुमानित 25 अरब डॉलर का बकाया है।
लगभग 38 अरब डॉलर के कर्ज के बोझ तले नेपाल पहले से ही दबा है। चीन ने नेपाल को तीन अरब डॉलर का नया ऋण दिया है, जिसमें जलविद्युत, सड़क निर्माण और हवाई अड्डा परियोजनाओं का वित्तपोषण शामिल है, जबकि उसके ऊपर भारत का ऋण 1.5 अरब डॉलर है, जिसमें स्वास्थ्य, शिक्षा और बुनियादी ढांचे के लिए अनुदान और ऋण पर जोर दिया गया है।
ओली का बीआरआई को समर्थन भारत के क्षेत्रीय प्रभुत्व को भी चुनौती देता है। नई दिल्ली का बीआरआई को लेकर विरोध उसकी संप्रभुता संबंधी चिंताओं को लेकर है, खासकर चीन पाकिस्तान आर्थिक गलियारे (सीपीईसी) के संबंध में, जो पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर से होकर गुजरता है।
चीन की पहल की ओर नेपाल का झुकाव भारत की क्षेत्रीय पहल, जैसे बीबीआईएन (बांग्लादेश-भूटान-भारत-नेपाल) ढांचे को कमजोर करता है। ओली का निर्णय एक तरह से नेपाल की विदेश नीति में बदलाव को दर्शाता है। अपने कार्यकाल के दौरान भारत से पहले उनकी चीन यात्रा इस ओर इशारा कर ही रही थी। अब बीआरआई को औपचारिक रूप से अपनाने से नेपाल भारत से दूर हो गया है और भारत-नेपाल संबंधों में ऐतिहासिक संतुलन को चुनौती मिली है।
ओली के बीआरआई निर्णय का घरेलू राजनीति पर भी असर होगा। परंपरागत रूप से भारत की करीबी नेपाली कांग्रेस ने ऋण जोखिम और रणनीतिक कमजोरियों का हवाला देते हुए इस पहल का विरोध किया है। यह कलह ओली की कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ नेपाल (यूएमएल) और कांग्रेस के बीच मतभेद बढ़ाने के साथ ही गठबंधन सरकार को अस्थिर कर सकता है।
इसके अलावा, नेपाल के हुम्ला जिले में चीनी अतिक्रमण की रिपोर्ट, जहां सीमा पर निगरानी टावर और कांटेदार तार की बाड़ दिखाई दी है, ने स्थानीय विरोध को जन्म दिया है। इन उकसावों पर ओली की चुप्पी बीजिंग के प्रति उनके समर्पण को उजागर करती है, जिससे उनके नेतृत्व में नेपाल की संप्रभुता पर भी सवाल उठते हैं।
दक्षिण एशिया में चीन की रणनीतित हठधर्मिता
दक्षिण एशिया में चीन की रणनीतिक हठधर्मिता उसके आर्थिक और बुनियादी ढांचे में स्पष्ट है। अनुदान के बजाय ऋण को बीजिंग की प्राथमिकता ने कई देशों में निर्भरता का एक चक्र बना दिया है। पाकिस्तान का सीपीईसी ऋण बढ़कर 62 अरब डॉलर हो गया है, जो चीन की चाल को स्पष्ट करता है। नेपाल भी उसी रास्ते पर चलने का जोखिम उठा रहा है, क्योंकि उसकी आर्थिक कमजोरी ऋण स्थिरता की चुनौतियों को बढ़ा रही है। नेपाल का यह निर्णय वाशिंगटन की हिंद-महासागर रणनीति को कमजोर करता है और इसके मिलेनियम चैलेंज कॉरपोरेशन (एमसीसी) करार के प्रभाव को कमजोर करता है, जिसे नेपाल की ऊर्जा और परिवहन बुनियादी ढांचे को मजबूत करने के लिए डिजाइन किया गया है।
चीन के प्रभुत्व का मुकाबला करने के लिए अमेरिका को प्रतिस्पर्धी और टिकाऊ विकल्प पेश करते हुए नेपाल के साथ अपने संबंधों को फिर से व्यवस्थित करना होगा। नेपाल का बीआरआई पर झुकाव भारत को अपनी पड़ोसी पहले’ वाली नीति के पुनर्मूल्यांकन को लेकर भी चेतावनी है। नई दिल्ली को काठमांडो के साथ आर्थिक, सांस्कृतिक और रणनीतिक संबंधों को मजबूत करने को प्राथमिकता देनी चाहिए। चीन के बढ़ते प्रभाव का मुकाबला करने के लिए लोगों से लोगों के बीच संपर्क बढ़ाना, बुनियादी ढांचा परियोजनाओं में तेजी लाना और समय पर वित्तीय सहायता प्रदान करना महत्वपूर्ण होगा।
भारत की ऐतिहासिक भूमिका
एक विकास भागीदार के रूप में भारत की ऐतिहासिक भूमिका उसे चीनी पहलों के लिए व्यवहार्य विकल्प प्रस्तुत करने की स्थिति में रखती है। बीआरआई का आकर्षण भले ही नेपाल के आर्थिक हितों में निहित हो, लेकिन ‘कर्ज के जाल’ में फंसने का जोखिम दोधारी तलवार पर चलने जैसा है। भारत को अब बड़ी सावधानी के साथ इस मसले पर कदम उठाने की जरूरत है, क्योंकि नेपाल की चीन से नजदीकी दक्षिण एशिया भू-राजनीतिक परिदृश्य के भविष्य को आकार देगी।