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नेपाल : सांविधानिक संकट का अग्निपथ, खतरे में वैधता और भावना, नकारात्मक असर को टालने की जरूरत
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नेपाल नेशनल असेंबली (प्रतीकात्मक तस्वीर)
- फोटो :
Agency (File Photo)
विस्तार
नेपाल में राणा शासन का इतिहास रहा है। राजा महेंद्र ने 1960 में बीपी कोइराला की चुनी हुई सरकार को बर्खास्त कर दिया और फिर उन्हें जेल में डाल दिया था, जो लोकतांत्रिक आंदोलन की शुरुआत का कारण बना और अंततः 1991 में संसद बहाल हुई। लेकिन वहां का लोकतंत्र अब भी कमजोर है और अपनी जड़ें नहीं जमा सका है, जिसे अपने संविधान का मसौदा तैयार करने और अपनाने में 24 साल लग गए।वहां के संविधान की वैधता और भावना खतरे में है, क्योंकि राष्ट्रपति विद्या देवी भंडारी और गठबंधन सरकार के बीच सीधे टकराव के कारण गंभीर संकट खड़ा हो गया है। यह संकट वहां के सुप्रीम कोर्ट के प्रधान न्यायाधीश शमशेर राणा के खिलाफ संसद में लंबित महाभियोग के कारण और बढ़ गया है, जो सत्तारूढ़ गठबंधन द्वारा भ्रष्टाचार के आरोपों में लाया गया है।
ऐसी खबरें हैं कि उन्हें नजरबंद रखा गया है, हालांकि सुप्रीम कोर्ट में उन्होंने कामकाज शुरू करने का विफल प्रयास किया था। इधर भारतीय थलसेना प्रमुख जनरल मनोज पांडे ने हाल ही में आधिकारिक घोषणा की कि दोनों देशों के बीच मौजूदा सहमति के अनुसार 40,000 अग्निवीरों की भर्ती की भारत की योजना को रोकने के नेपाल के फैसले से कड़वाहट पैदा हो सकती है, क्योंकि दिल्ली इन पदों पर भर्ती कर सकती है।
ऐसे ही नेपाली राष्ट्रपति विद्या देवी भंडारी ने जब पांच लाख नेपाली पुरुषों एवं महिलाओं को लाभ पहुंचाने वाले नागरिकता संशोधन विधेयक पर हस्ताक्षर करने से इनकार कर दिया, तो गठबंधन सरकार से उनका सीधा टकराव हो गया। विधेयक के अनुसार, वे बच्चे वंश के आधार पर नेपाल के नागरिक होंगे, जिनके जन्म के समय उनके माता या पिता नेपाल के नागरिक थे।
इसी तरह अगर कोई नेपाली महिला नागरिक किसी विदेशी मूल के पुरुष से विवाह करती है, तो उसके बच्चे को भी नेपाली नागरिकता मिल जाएगी। केपीएस ओली के नेतृत्व वाली पिछली कम्युनिस्ट सरकार द्वारा पारित विधेयक में प्रावधान था कि नागरिकता पाने के लिए सात साल की प्रतीक्षा अवधि अनिवार्य है। लेकिन शेर बहादुर देउबा के नेतृत्व वाली मौजूदा गठबंधन सरकार द्वारा इस बिल में संशोधन किया गया था, जो विद्या देवी भंडारी के इनकार करने का मूल कारण प्रतीत होता है।
हालांकि संसद ने दो बार इसे पारित किया है, जिससे राष्ट्रपति के लिए इस पर हस्ताक्षर करना अनिवार्य हो गया है। गौरतलब है कि भारत ने बिहार, उत्तर प्रदेश आदि राज्यों से सटे तराई के लोगों (मधेशियों) के साथ हो रहे अन्याय के बारे में अपनी आशंका व्यक्त की थी और गठबंधन सहयोगियों ने मई, 2021 में संसद में ओली सरकार की हार के बाद इस मुद्दे को सुलझाने का वादा किया था।
चीन एशिया में अपना वर्चस्व स्थापित करने के लिए भारत के मित्र राष्ट्रों को दूर करना चाहता है, इसलिए वह खुलेआम राष्ट्रपति भंडारी का समर्थन कर रहा है, जिन्होंने नागरिकता संशोधन विधेयक को बाधित कर रखा है। भंडारी ने हाल ही में सरकार के कड़े विरोध के बावजूद चीनी वैश्विक सुरक्षा पहल की एक आभासी बैठक में भाग लिया।
इधर भारतीय सेना प्रमुख जनरल मनोज पांडे ने यह स्पष्ट कर दिया है कि भारत अपनी नई अग्निपथ योजना के तहत नेपाल से सैनिकों को भर्ती करने के लिए जारी भर्ती चक्र में रिक्तियों को वापस लेने पर मजबूर हो सकता है। काठमांडू स्थित विशेषज्ञों का कहना है कि भारत की ऐसी कार्रवाई से नेपाल के साथ सदियों पुराने संबंधों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है क्योंकि चीन इसका फायदा उठाने की ओर अग्रसर है।
पिछले कुछ वर्षों में चीन ने नेपाल में मजबूत पैठ बना ली है। विशेषज्ञों का मानना है कि चीन नेपाल को भारत विरोधी भावनाओं के लिए उकसा सकता है, हालांकि वर्तमान गठबंधन सरकार का नेतृत्व नेपाली कांग्रेस कर रही है, जिसे भारत समर्थक माना जाता है और वह इसका विरोध कर सकती है। नेपाल में आगामी नवंबर में आम चुनाव होने वाले हैं और संसद स्थगित है, जिसने प्रधान न्यायाधीश राणा के महाभियोग मामले को जटिल बना दिया है।
इस मुद्दे पर सत्ता पक्ष और विपक्ष आमने-सामने हैं। इससे न्यायपालिका में कामकाज को लेकर अनिश्चितता पैदा हो गई है और तत्काल इसका समाधान करने की जरूरत है। नेपाल सरकार ने नई दिल्ली को अवगत कराया है कि अग्निपथ योजना के तहत भर्ती 1947 में तत्कालीन ब्रिटिश, भारत और नेपाली सरकार के बीच हुए त्रिपक्षीय समझौते का उल्लंघन होगी, जो भारतीय सेना में भर्ती सुनिश्चित करता है और भारतीयों की तरह समान वेतन, पेंशन और अन्य सुविधाओं की गारंटी देता है।
लेकिन अग्निवीर योजना स्थायी भर्ती नहीं है। नेपाल सरकार और वहां की राजनीतिक पार्टियां महसूस करती हैं कि सेवानिवृत्ति के बाद इनका कोई भविष्य नहीं होगा और वे सिरदर्द बन जाएंगे, क्योंकि पिछड़ापन और औद्योगिकीकरण के अभाव के कारण नेपाल में रोजगार के अवसर नहीं हैं। दूसरी बात, विपक्षी दल आगामी आम चुनाव में इसे मुद्दा बना सकते हैं, इसलिए सत्तारूढ़ गठबंधन को मतदाताओं की नाराजगी का सामना करना पड़ सकता है।
नेपाल सरकार अग्निवीर योजना से नाराज है, क्योंकि भारत सरकार ने बिना बताए या परामर्श किए यह योजना शुरू की है, जो त्रिपक्षीय समझौते का उल्लंघन करती है। इस योजना के खिलाफ विपक्षी दल नेपाल में सड़कों पर प्रदर्शन कर सकते हैं और सत्तारूढ़ गठबंधन को घेर सकते हैं, इसलिए सरकार चुनाव तक इस पर फैसला स्थगित रखना चाहती है।
भारतीय सेना नेपाल में विभिन्न जगहों पर भर्ती आयोजित कर आगामी दिसंबर में पच्चीस हजार और फरवरी में पंद्रह हजार अग्निवीरों को भर्ती करना चाहती है, लेकिन नेपाल सरकार के नकारात्मक रवैये से पूरा कार्यक्रम बाधित हो गया है। आंकड़ों के अनुसार, भारतीय सेना में नेपाली गोरखाओं की सालाना भर्ती धीरे-धीरे घटकर लगभग 1,500 रह गई है।
काठमांडू स्थित वरिष्ठ पत्रकार कनक मणि दीक्षित मानते हैं कि अग्निपथ योजना का नेपाली समाज पर नकारात्मक असर तो होगा ही, दोनों देशों के संबंधों पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा। विश्लेषकों का मानना है कि आगामी आम चुनाव के बाद अगर नेपाली कांग्रेस और उसके सहयोगियों की सत्ता बरकरार रहती है, तो नेपाल में अग्निपथ योजना लागू हो सकती है, अन्यथा संभावनाएं कम होती दिख रही हैं।