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उदार होने की जरूरत
नीरजा चौधरी
Updated Sat, 05 Apr 2014 02:04 AM IST
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नरेंद्र मोदी क्या नागपुर में कोई रैली करेंगे? नागपुर में न केवल राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का मुख्यालय है, बल्कि नितिन गडकरी इस सीट से भाजपा के उम्मीदवार भी हैं। मोदी आ रहे हैं या नहीं, मीडिया में बस यही सवाल घुमड़ रहा है। अंदरखाने चर्चा यह है कि गडकरी वहां मोदी की रैली के ज्यादा इच्छुक नहीं हैं। महाराष्ट्र के इस शहर में मोदी के होर्डिंग्स भी कम ही दिखते हैं।
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संघ के मुख्यालय 'महल' क्षेत्र के पास स्थित मोमिनपुरा मुस्लिम बहुल कॉलोनी है। वहां जाकर मुझे समझ में आया कि गडकरी आखिर क्यों नहीं चाहते कि मोदी नागपुर आएं। यहां के कुछ मुस्लिमों का गडकरी के प्रति झुकाव देखकर मुझे हैरत हुई। इनका कहना है, 'हम जब भी उनके पास जाते हैं, वह हमारा काम करते हैं। यह सिलसिला वर्षों से चला आ रहा है।' मगर वे यह भी कहते हैं कि मोदी की वजह से वे गडकरी को वोट नहीं दे सकते। बाईस वर्षीय खुवैद के परिवार की चूड़ियों की एक दुकान है।
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खुवैद बताते हैं, 'पिछले कई दिनों से रात के नौ बजे दुकान बंद होने के बाद हम लोग बाहर बैठकर अपनी इस दुविधा पर मंथन कर रहे हैं। ऐसे में अगर मोदी शहर में आते हैं, तो हममें से जिन लोगों का झुकाव गड़करी की ओर है, वे घबराकर फिर से कांग्रेस की ओर मुड़ जाएंगे।'
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मोदी को लेकर गडकरी के असमंजस की कोई वजह नहीं है, क्योंकि मोदी की वजह से भाजपा से छिटकने वाले मुसलमानों की तुलना में उनसे आकर्षित होकर भाजपा से जुड़ने वाले हिंदुओं की तादाद कहीं ज्यादा है। मगर गडकरी बनाम मोदी का यह द्वंद्व भाजपा के अंदर चल रही उठापटक का ज्वलंत उदाहरण है। छोटे दलों के भाजपा से हाथ मिलाने की वजह से मोदी के अभियान ने तेजी पकड़ी है। इनमें बिहार में रामविलास पासवान और तमिलनाडु में द्रविड पार्टियों से हाथ मिलाने समेत कांग्रेस के जगदंबिका पाल और साक्षी महाराज जैसे नेता शामिल हैं। अब कांग्रेस के एस राव भी भगवा ताकतों की ओर आकर्षित होते दिख रहे हैं।
अपनी मीडिया और प्रचार टीम के जरिये मोदी शुरुआत से ही चुनावी अभियान की बागडोर जिस तरह अपने हाथ में संभाले हैं, उससे साफ है कि वह पार्टी के उन नेताओं से दूरी बनाए रखना चाहते हैं, जिन्होंने मोदी की सरपरस्ती मजबूरी में स्वीकार की है।
इसके बावजूद हैरत इस बात पर है कि लगातार आगे बढ़ रहे मोदी ने अपनी पसंदीदा सीटों से चुनाव लड़ने की पार्टी के बुजुर्ग नेताओं की इच्छा को तवज्जो नहीं दी। मोदी को समझना चाहिए था कि यह बमुश्किल तीन या चार सीटों की बात थी और इससे उनकी व्यापक योजनाओं पर भी कुछ खास प्रभाव नहीं पड़ता।
पहले लालकृष्ण आडवाणी, फिर मुरली मनोहर जोशी और अंत में जसवंत सिंह, जिन्हें बाड़मेर सीट से चुनाव लड़ने की जिद के चलते पार्टी से बाहर का रास्ता दिखा दिया गया। अब वह इस सीट पर निर्दलीय प्रत्याशी के तौर पर मैदान में हैं। कुछ महीने पहले जब इंदौर से संभावित प्रत्याशी के तौर पर आडवाणी का नाम सामने आया था, तब गांधीनगर सीट के बजाय किसी दूसरी सीट से चुनाव लड़ने पर उन्होंने आपत्ति जताई थी।
मगर हाल में गांधीनगर सीट को लेकर उनकी दुविधाएं बढ़ गईं। हो सकता है कि उन्हें डर हो कि अपने खुले मोदी-विरोध के चलते गुजरात के मुख्यमंत्री उन्हें उस गांधीनगर से हराने का षड्यंत्र रचें।
यह समझना जरूरी है कि पार्टी के वरिष्ठ नेताओं की इच्छाएं तर्क के तराजू पर नहीं तौली जानी चाहिए। आखिरकार आज पार्टी जिस मुकाम पर है, वह इन्हीं नेताओं की बदौलत है। दशकों से पार्टी का नेतृत्व संभाल रह इन नेताओं के साथ जैसा व्यवहार हुआ, क्या उससे बचा नहीं जा सकता था ? आखिर वह आडवाणी ही थे, जिन्होंने अटल बिहारी वाजपेयी के साथ मिलकर दशकों तक पार्टी का नेतृत्व संभाला। फिर जसवंत सिंह भी तो अपने राजनीतिक करियर के अंत पर खड़े थे।
शायद मोदी को डर हो कि आडवाणी मध्य प्रदेश के विकास के मॉडल की तुलना गुजरात मॉडल से कर सकते हैं, जैसा कि वह पहले भी कर चुके हैं। इससे भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार को नाहक परेशानी का सामना करना पड़ सकता था।
जसवंत सिंह को मोदी के निकट समझी जाने वाली वसुंधरा राजे सिंधिया से खराब रिश्तों का खामियाजा भुगतना पड़ा। रही बात मुरली मनोहर जोशी की, तो उन्हें वाराणसी सीट को छोड़ने में कोई दिक्कत नहीं थी। 2009 में वाराणसी से उन्हें केवल 17 हजार मतों से जीत हासिल हुई थी। लेकिन जिस तरह से इस मामले को निपटाया गया, उस पर जोशी नाराज थे।
हमारी परंपरा में बुजुर्गों का असम्मान करना अच्छा नहीं माना जाता। इसीलिए मोदी को खासकर पार्टी के बुजुर्ग नेताओं के प्रति उदार बनने की जरूरत है। भाजपा बदलाव के दौर से गुजर चुकी है। इसलिए मोदी के लिए जरूरी है कि वह समावेशी रुख रखें। तब तो और, जब संघ प्रमुख मोहन भागवत बंगलूरू में संघ की एक सभा में कार्यकर्ताओं को 'नमो-नमो' के जाप से बचने की हिदायत दे चुके हैं।
इसे पार्टी के भीतर किसी शख्स को भगवान का दर्जा देने की प्रवृत्ति पर मोहन भागवत की आपत्ति के तौर पर देखा गया। पार्टी के वरिष्ठ नेताओं के प्रति नरेंद्र मोदी के रूखे व्यवहार से उनके चुनाव अभियान पर बेशक कोई फर्क नहीं पड़ेगा, लेकिन इसमें भाजपा के भविष्य की झलक तो दिखती है। वह यह कि फैसलों पर अमल करने के लिए मोदी के अपने तरीके हैं। वह न सिर्फ अपनी नई टीम चाहते हैं, बल्कि पुरानी टीम को ठिकाने लगाना भी उन्हें अच्छी तरह आता है। संदेश साफ है कि पार्टी में अब नमो की ही मर्जी चलेगी।