कृषि में क्रांति की जरूरत
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दुनिया भर के किसानों, वैज्ञानिकों और नीति नियंताओं को आज कृषि क्षेत्र में नए विचारों, तकनीकों, खेती के तरीकों, औजारों और उत्पादों के नवप्रवर्तन की सबसे ज्यादा जरूरत है, ताकि धरती की बढ़ती जनसंख्या को पर्याप्त खाद्य और पोषण मुहैया कराया जा सके। वर्ष 2050 तक विश्व की जनसंख्या 9.6 अरब तक पहुंचने की संभावना है। यह आशंका भी जताई जा रही है कि 2030 तक भारत जनसंख्या के मामले में चीन को पीछे छोड़ देगा। अभी भारत में शहरी जनसंख्या तकरीबन 40 करोड़ है और 2030 तक इसके 60 करोड़ तक पहुंचने का अनुमान है। गौरतलब है कि शहरी लोग अमूमन खाद्य उत्पादन नहीं करते, मगर बनिस्बत ज्यादा आय होने की वजह से इनकी मांग ग्रामीण लोगों की तुलना में ज्यादा होती है। यही वजह है कि खेती-किसानी में लगे थोड़े से लोगों को अपना पेट भरने के साथ-साथ शहरों में रहने वालों के लिए भी ज्यादा से ज्यादा उत्पादन का दबाव झेलना पड़ता है।
2004 और 2011 के बीच भारत में पहली बार कृषि क्षेत्र में कार्यरत लोगों की संख्या में 3.1 करोड़ की भारी गिरावट आई। आने वाले वर्षों में अर्थव्यवस्था के गति पकड़ने की वजह से तमाम दूसरे लोगों के खेती छोड़ देने की आशंका है। गौरतलब है कि अतीत में विकास के इसी तरीके को ज्यादातर देशों ने अपनाया है। भारत इस मामले में काफी धीमा रहा है। मसलन चीन में आर्थिक सुधारों के बाद से तकरीबन 15 करोड़ लोगों ने खेती को छोड़कर निर्माण, विनिर्माण और रोजगार के दूसरे क्षेत्रों का रुख किया है। ऐसे में बड़ा सवाल यह है कि भारत अपने लोगों का पेट कैसे भरेगा। दरअसल, इसका समाधान उत्पादकता बढ़ाने के लिए ऐसी बेहतर तकनीक को अपनाने में निहित है, जो जल-संरक्षण और मिट्टी की उर्वरता को बढ़ा सके, और कुशल मूल्य शृंखलाओं को तैयार करे, जिससे किसानों को अपनी मेहनत का उचित भुगतान मिल सके।
1960 के दशक में हुई हरित क्रांति से हर कोई वाकिफ है। इस दौरान उच्च उत्पादक किस्म के 18,000 टन गेहूं का मैक्सिको से आयात किया गया। नोर्मन बोरलाग इसके जनक थे। और यहीं से भारत में हरित क्रांति का आगाज हुआ। इसके बाद फिलीपींस से चावल की एक उच्च उत्पादक किस्म (आई आर 8) का भी आयात किया गया। गौरतलब है कि 2012-13 और 2013-14 में भारत का कुल अनाज निर्यात चार करोड़ टन के लगभग रहा, और इसका भंडार भी क्षमता से ज्यादा रहा। इसके अलावा अनाज उत्पादन भी 26.4 करोड़ टन तक पहुंच गया है। यह सब विशेष रूप से पिछले पांच वर्षों के दौरान घरेलू स्तर पर ईजाद की गई या आयातित की गई आधुनिक प्रौद्योगिकियों को अपनाकर ही संभव हो सका। दिलचस्प है कि 1960 के दशक में जिस देश में बुनियादी भोज्य पदार्थों की भारी कमी थी, वह आज विश्व में चावल का सबसे बड़ा निर्यातक है। यह खासकर पिछले पांच वर्षों के दौरान घरेलू स्तर पर ईजाद या आयातित आधुनिक तकनीक के जरिये ही संभव हो सका है।
1970 के दशक के दौरान, भारत का कृषि क्षेत्र दुग्ध क्रांति का गवाह बना। दरअसल 60 के दशक में भारत में दूध की खासी किल्लत थी। लेकिन 70 के दशक में 'ऑपरेशन फ्लड' के जरिये छोटे किसानों को मुख्य धारा में लाते हुए, उन्हें ग्रामीण क्षेत्रों में स्थापित दुग्ध केंद्रों से जोड़ा गया, उन्हें दूध की गुणवत्ता के आधार पर कीमत चुकाई गई, ग्रामीण क्षेत्रों में शीतलन (कूलिंग) के लिए बुनियादी ढांचा तैयार किया गया, फिर दूध को संयंत्रों में परिष्करण के लिए भेजा गया और आखिर में खुदरा बिक्री के लिए दुकानों तक पहुंचाया गया। इसी का नतीजा है कि 2013-14 में भारत दुनिया में सबसे ज्यादा दूध उत्पादन करने वाला देश बना।
इसके अलावा बीटी कपास की कामयाबी ने एक दशक में कपास के उत्पादन को दुगुने से भी ज्यादा कर दिया है। संकरित मक्का और पूसा बासमती भी कुछ ऐसी ही कामयाबियों के उदाहरण हैं। इन कामयाबियों के पीछे आधुनिक तकनीक का उपयोग और खासकर निर्यात के लिए आकर्षक बाजारों तक पहुंच की कोशिशों का बड़ा योगदान रहा है। दरअसल बाजारों के महत्व को समझना बहुत जरूरी है। सोचिए, अगर कपास या मक्का या बासमती के निर्यात पर रोक लगा दी जाए तो क्या होगा? घरेलू स्तर पर इनके दाम गिरने लगेंगे, जिससे सीधे तौर पर किसानों की आय प्रभावित होगी और वे इसको उपजाने से बचने लगेंगे। सबक यह है कि तकनीक को बढ़ावा देना तभी फायदेमंद होता है, जब बाजार का माहौल सकारात्मक हो और किसानों को फायदा पहुंच रहा हो।
भविष्य की संभावनाओं की बात करें, तो आज अनेक देशों ने हरित क्रांति से जीन क्रांति की तरफ रुख किया है। इसके अलावा भूरी क्रांति की चर्चा है, जिसमें मृदा की गुणवत्ता पर खास ध्यान दिया जाता है। खेती में इस तरह के उपायों से आज की तुलना में संसाधनों की बचत होगी, उत्पादकता बढ़ेगी और पर्यावरण के अनुकूल खेती को बढ़ावा दिया जा सकेगा। बायो-फोर्टीफिकेशन तकनीक के जरिये फसलों को लौह तत्व, जिंक या विटामिन-ए से समृद्ध किया जा सकता है। इन उपायों से भारत में कुपोषण से लड़ने में मदद मिलेगी। कुछ भी हो, इसमें संदेह नहीं कि खेती का भविष्य ज्यादा से ज्यादा ज्ञान आधारित होता जाएगा, और उसमें जल के उचित उपयोग और मृदा की उर्वरता जैसे मुद्दे हावी रहेंगे।
(इंडियन काउंसिल फॉर रिसर्च ऑन इंटरनेशनल इकोनॉमिक रिलेशंस में कृषि पीठ के प्रोफेसर)