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एक अदद अपनी डॉक्टरेट जरूरी है

Thu, 27 Feb 2014 05:46 PM IST
प्रकाश पुरोहित
प्रकाश पुरोहित Updated Thu, 27 Feb 2014 05:46 PM IST
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Need of own docterate

डॉक्टरेट का तो ऐसा है भाई साब कि अगर आपने खुद अपनी मेहनत से हासिल नहीं की, तो अपने कर्मों से इतनी लेनी पड़ जाएगी कि गिनती ही भूल जाएंगे। इसीलिए सलाह दी जाती है कि या तो खुद ही एकाध डॉक्टरेट कबाड़ लो, या फिर ऐसे आम आदमी बने रहो, जिसे डॉक्टर और डॉक्टरेट का अंतर ही पता न हो। अगर आपने खुद डॉक्टरेट पा ली है, तो लोग फिर भी रहम खा जाते हैं कि पहले ही इतना परेशान होता रहा है, अब जा के कहीं डॉक्टरेट हासिल हुई है। यह दया का पात्र है और ऐसे शख्स पर रहम करने से पुण्य हासिल होता है। जो खुद ही अपना भला-बुरा नहीं समझ रहा हो, ऐसे को और डॉक्टरेट देकर और तंग क्यों करना!

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मगर जो बगैर डॉक्टरेट किए, समाज में कुछ अलग होने की ख्वाहिश रखते हैं, उन्हें तो सावधान रहना ही चाहिए कि न जाने किस तरफ से डॉक्टरेट पटक दी जाए। चूंकि आपके पास, अपनी मेहनत और कमाई की डॉक्टरेट नहीं है, तो आप उसी पल एक अदद मानद डॉक्टरेट के योग्य उम्मीदवार घोषित हो जाते हैं। और जब आपने किसी की दी हुई डॉक्टरेट बगैर ना-नुकुर के स्वीकार कर ली, तो आप आइंदा के लिए इन्कार करने का अधिकार भी खो देते हैं। देने वाले तो हर साल देते हैं, उन्हें तो एक अदद चेहरे की तलाश रहती है। वे यह भी याद नहीं रखते कि इस साल जिसे डॉक्टरेट देने का जुगाड़ कर रहे हैं, दस साल पहले उन्हें एक दे ही चुके हैं। हर साल और कई बार तो साल में दो-चार बार भी डॉक्टरेट देने की नौबत आ जाती है। तो यह कौन याद रखता है कि किसे, कब दी थी। ज्वलंत सवाल तो यही रहता है कि इस बार किसे टिकाई जाए।
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अब यदि आपने एक बार डॉक्टरेट लेना मंजूर कर ही लिया, तो कई खड़े हो जाते हैं ‘एक मेरी तरफ से भी’, ‘एक हमारी भी रख लें’, ‘एक बार देख तो लें, दावा है फिर लेने आ जाएंगे।’ ऐसे देने वाले हर जगह, हर वक्त मौजूद रहते हैं। आपने अगर इन्कार कर दिया कि इतनी सारी धरी तो हैं पहले से, तो यही विनती की जाएगी कि कौन-सा कंधे पर उठाए घूमना है। एक हमारी भी पटक लीजिए। यदि आपने ज्यादा ही नखरे दिखाए, तो हो सकता है कि अबे-तबे पर बात आ जाए... कि उस चोर की तो खुशी-खुशी रख ली...अब हम दे रहे हैं तो आदर्श बघार रहे हैं।
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बेहतर यही है कि तमाम डॉक्टरेट से बचने के लिए अपने बूते एक अदद डॉक्टरेट कबाड़ ली जाए, ताकि बाकी जिंदगी शांति और बगैर बदनामी के गुजर सके।

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