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युवाओं से संवाद की जरूरत

Wed, 25 Dec 2019 08:09 AM IST
Srijan Pal Singh सृजन पाल सिंह
Updated Wed, 25 Dec 2019 08:09 AM IST
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Need of Dialogue with Youth

एक मशहूर कहावत है कि यदि किसी देश का विनाश करना हो, तो न तो किसी परमाणु बम की आवश्यकता है, और न ही किसी मिसाइल की। बस उसकी शिक्षा का स्तर गिरा दीजिए और उसके छात्रों को परीक्षा में नकल करने दीजिए, राष्ट्र अपने आप नष्ट हो जाएगा। किसी भी समाज का आधारस्तंभ और भविष्य उसका युवा होता है। यदि यह युवा भटक जाए, तो राष्ट्र अपना रास्ता खो देगा और अगर यही युवा अपनी ऊर्जा राष्ट्र निर्माण में लगा दे, तो देश विश्व में अग्रणी बन जाएगा।


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भारत वह राष्ट्र है, जो अपने इतिहास में ऐसे स्थान पर है, जहां विरले ही राष्ट्र पहुंचते हैं। आज हमारे देश में 60 करोड़ युवा हैं, जो दुनिया में किसी भी राष्ट्र से अधिक है। भारत की औसत आयु 28 वर्ष है। इसकी तुलना में चीन और अमेरिका 38 वर्ष, जापान और जर्मनी 47 वर्ष और यूरोपीय संघ 43 वर्ष की औसत आयु रखता है। ऐसी युवा शक्ति रखने वाले देश के लिए यह अति-महत्वपूर्ण है कि वह इस बल को सही दिशा में ले जाए, जिससे कि वह एक महाशक्ति बन सके। अब सवाल है कि भारत के युवा को वाकई एक राष्ट्र निर्माण की ऊर्जा कैसे बनाया जाए? इसके लिए उन्हें और उनकी उत्सुकताओं को समझना आवश्यक है। हमें चार आयामों पर काम करना होगा। सर्वप्रथम हमें युवाओं को जागरूक बनाना होगा। नागरिकता कानून में संशोधन के बाद कुछ दिनों से चल रही राष्ट्रव्यापी अशांति इस बात को इंगित करती है कि हमें युवाओं से बेहतर और निर्बाध संवाद बनाना होगा, ताकि भ्रांतियां दूर हों। इसके लिए स्कूलों और कॉलेजों में राष्ट्र नीति को समझाने के लिए लघु पाठ्यक्रम उपलब्ध कराया जा सकता है। यह काम ऑनलाइन संसाधनों का प्रयोग करके भी हो सकता है।

दूसरा आयाम है संवेदना। भारत का युवा वैसे ही भारतीय संस्कृति का मौलिक स्तंभ - करुणा में पला-बढ़ा है। अब यह भी आवश्यक है कि शिक्षा नीति में ही संवेदना को जागृत करने और दिशा देने वाले प्रायोगिक पाठ्यक्रम पर हम ध्यान दें। तीसरा आयाम अनुशासन है। युवा ऊर्जा से भरे होते हैं और उनके विचार क्रांतिकारी होते हैं। इसमें कोई बुराई नहीं है। किंतु यह भी आवश्यक है कि हम युवाओं में अनुशासन और धैर्य की भावनाओं की भी नींव रखें। आज आय से पहले ही व्यय करके ईएमआई चुकाने की एक नई व्यवस्था बन रही है। हमने इस नई संस्कृति का दुष्परिणाम पश्चिमी राष्ट्रों में देखा है, जहां 2008 में इसी कारण घोर आर्थिक मंदी आई थी। हमें भारतीय संस्कृति के तहत जीवन की आदतों और व्यय के तरीकों में अनुशासन लाने का पाठ युवाओं को छोटी उम्र से ही पढ़ाना होगा।

चौथा आयाम युवाओं को सेवा का अवसर देना है। मैंने कई बार देखा है कि भारत के युवाओं को ऐसा लगता है कि वे शक्तिहीन हैं और उनके विचार को कोई सुनना ही नहीं चाहता। ऐसे सभी युवा समाज और राष्ट्र के लिए कुछ करना चाहते हैं, लेकिन उन्हें ऐसा करने के लिए कोई अवसर मौजूदा शिक्षा प्रणाली में नहीं मिल पाता। हमने एनएसएस और एनसीसी जैसे प्रयास तो किए, किंतु आज के संदर्भ में यह जीर्ण हो चुके हैं। युवाओं को, टेक्नोलॉजी के इस दौर में, कुछ नई और आकर्षक व्यवस्था की जरूरत है। क्यों न एक ऐसी व्यवस्था बनाई जाए, जिससे वे अपनी शिक्षा के दौरान ही ऐसे प्रोजेक्ट पर काम कर सकें, जोकि वर्तमान संदर्भ में प्रासंगिक हों और छात्रों द्वारा किए गए काम वाकई जमीन पर कुछ बदलाव ला सकें।

भारत समय के उस मोड़ पर है, जब हमें अपने युवाओं को एक सम्मानजनक अवसर देना होगा कि वे एक सृजनात्मक बदलाव का हिस्सा बनें और अपनी ऊर्जा का सही प्रयोग करें।

-लेखक कलाम सेंटर के सीईओ हैं।

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