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एक साथ चुनाव की जरूरत
सुधांशु रंजन
Updated Mon, 31 Oct 2016 07:05 PM IST
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सुधांशु रंजन
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भारत के मुख्य निर्वाचन आयुक्त नसीम जैदी ने कहा है कि चुनाव आयोग लोकसभा एवं विधानसभा चुनावों को साथ-साथ कराने को तैयार है, बशर्ते सभी राजनीतिक दलों में इस पर मतैक्य हो। आयोग ने इसे देश के लिए अच्छा बताते हुए विधि आयोग को इस आशय की अनुशंसा भेज दी है। इस पर काफी समय से बहस चल रही है और सरकार का भी मानना है कि सभी चुनावों एक साथ कराने से कई फायदे हैं।
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वर्ष 1967 तक लोकसभा एवं विधानसभा चुनाव साथ-साथ होते थे। 1967 स्वाधीन भारत के इतिहास में एक महत्वपूर्ण पड़ाव है, जब देश की राजनीति ने करवट ली। राम मनोहर लोहिया ने गैर-कांग्रेसवाद का नारा दिया और आठ राज्यों में गैर-क्रांग्रेस सरकारें बनीं, जो विभिन्न दलों की मिली-जुली सरकारें थीं। इन्हें संविद सरकार कहा गया, जिसमें वामपंथी दलों से लेकर दक्षिणपंथी जनसंघ की भी सहभागिता थी। इसके अलावा लोकसभा में भी कांग्रेस की शक्ति क्षीण हो गई। कई टांगों पर खड़ी मिली-जुली कई सरकारें कार्यकाल पूरा करने के पहले गिर गईं। कई बार लोकसभा भी अपना कार्यकाल पूरा करने के पहले भंग हो गईं। इसकी शुरूआत 1971 में हुई, जब इंदिरा गांधी ने समय से एक वर्ष पूर्व ही लोकसभा भंग कर मध्यावधि चुनाव करा दिया। अब तक सात बार लोकसभा के चुनाव निर्धारित समय से पहले हुए। 1996 और 1999 के बीच तो तीन आम चुनाव हुए।
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अभी तो लगभग हर वर्ष चुनाव होते हैं। 2017 में पांच राज्यों में चुनाव होने हैं, जबकि 2018 में 13 तथा 2019 में नौ राज्यों में चुनाव होंगे। चुनाव के दरम्यान सरकारी कामकाज बुरी तरह प्रभावित होता है। चुनाव आयोग ने 1983 में ही इस बारे में चिंता जाहिर की थी और दोनों चुनावों को एक साथ कराने की सिफारिश की थी। 1999 में विधि आयोग ने भी ऐसी ही अनुशंसा की। इसके अलावा ई सुदर्शन नचियप्पन की अध्यक्षता वाली कार्मिक, जन शिकायत, विधि एवं न्याय मंत्रालयों की संसद की स्थायी समिति ने भी रिपोर्ट सौंपी कि बार-बार चुनाव कराए जाने से थकी जनता तथा सरकारी मशनरी को इस समस्या से निदान दिलाना होगा।
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एक मत यह है कि साथ-साथ चुनाव कराने से एक दल का पूरे देश में वर्चस्व हो जाएगा, क्योंकि एक खास समय किसी खास पार्टी की हवा होती है। एक पार्टी का वर्चस्व लोकतंत्र तथा देश के लिए शुभ नहीं है। बार-बार चुनाव होने से केंद्र सरकार एवं राजनीतिक दलों पर एक दबाव होता है और वे जनता के प्रति जवाबदेह होते हैं। इसके विरूद्ध तर्क यह दिया जाता है कि बार-बार चुनाव होने से सरकार कोई कठोर निर्णय नहीं ले पाती है, जो दूरगामी दृष्टि से लाभप्रद हो।
यदि सरकार चुनाव साथ-साथ कराना चाहती है, तो इसके लिए संविधान के अनुच्छेद 83,85,172 तथा 174 में संशोधन करना पड़ेगा। अनुच्छेद 83 लोकसभा एवं अनुच्छेद 172 विधानसभा का कार्यकाल पांच वर्षों के लिए निर्धारित करता है। यानी इसमें समय की अधिकतम सीमा तो है, लेकिन कार्यकाल की कोई न्यूनतम सीमा नहीं है। राजनीतिक दलों में सहमति के बिना संविधान संशोधन संभव नहीं है। जब तक ऐसा नहीं होता है, तब तक कुछ सुधार बिना संविधान संशोधन के भी किए जा सकते हैं। अभी चुनाव आयोग को अधिकार है कि विभिन्न राज्यों में छह महीने के अंदर होने वाले चुनावों को आगे-पीछे कर एक साथ कर दे। इस अवधि को बढ़ाकर एक वर्ष तक किया जा सकता है। अभी उम्मीदवारों के खर्च की तो सीमा है, परंतु राजनीतिक पार्टियों के खर्च पर कोई सीमा नहीं है। इसकी भी सीमा तय होनी चाहिए।