{"_id":"57b31ae14f1c1b4c446ebb8f","slug":"need-of-a-new-kashmir-policy","type":"story","status":"publish","title_hn":"एक नई कश्मीर नीति की दरकार","category":{"title":"Opinion","title_hn":"नज़रिया ","slug":"opinion"}}
एक नई कश्मीर नीति की दरकार
तवलीन सिंह
Updated Tue, 16 Aug 2016 07:23 PM IST
विज्ञापन
तवलीन सिंह
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
पिछले सप्ताह प्रधानमंत्री मोदी ने पहली बार कश्मीर घाटी में फैली अशांति पर कुछ कहा। अफसोस कि उन्होंने कुछ नया कहने के बदले वही कहा, जो कभी अटल बिहारी वाजपेयी ने घाटी में शांति बहाली के लिए कहा थाः इंसानियत, कश्मीरियत और जम्हूरियत।
विज्ञापन
इंदिरा गांधी और उनके बेटे की गलतियों की वजह से घाटी के लोगों को ऐसा लग रहा था कि लोकतंत्र बेशक भारतवासियों के नसीब में हो, लेकिन उनके नसीब में नहीं है। इंदिरा गांधी ने 1984 में फारूक अब्दुल्ला की सरकार को इस आरोप के साथ बेवक्त हटा दिया था, कि वह घाटी में अलगाववादी भावनाएं भड़का रहे हैं। आरोप बिल्कुल बेबुनियाद था, इतिहास गवाह है। इसके बाद राजीव गांधी के पास अच्छा मौका था 1996 में निष्पक्ष चुनाव करवाने का, जिसे उन्होंने गंवा दिया। इसी के बाद घाटी के नौजवान सीमा पार गए आतंकवाद का प्रशिक्षण लेने।
विज्ञापन
सो अटल जी जब प्रधानमंत्री बने, उन्हें एहसास था कि घाटी के लोगों के साथ अन्याय हुआ है और इसको सुधारे बिना शांति नहीं आ सकती है। आज वह स्थिति नहीं है। आज कश्मीर के लोग भारत के साथ अन्याय कर रहे हैं। बुरहान वानी की हत्या को लेकर जो अशांति फैली है, उससे कोई हमदर्दी नहीं रख सकता, क्योंकि वह न सिर्फ आतंकवादी था, बल्कि इस्लाम के लिए जेहाद कर रहा था। वह जेहाद के नाम पर अपने वीडियो के जरिये उसी तरह से नौजवानों को उकसाने की कोशिश कर रहा था, जैसे इस्लामिक स्टेट के वीडियो करते हैं। यानी कश्मीर घाटी की लड़ाई सिर्फ 'आजादी' तक सीमित नहीं है, वैश्विक जेहाद का हिस्सा बन गई है।
विज्ञापन
मुझे याद है कि '90 के दशक में जिस रात लाखों कश्मीरी पंडित अपना घर-बार, ज़मीन-जायदाद छोड़कर भागे थे, मैं इत्तफाक से श्रीनगर में थी। अगले दिन मैं श्रीनगर की बड़ी मस्जिद गई थी आम लोगों से बातचीत करने। वहां पहुंचते ही मैं मुस्लिम नौजवानों की भीड़ में घिर गई थी, जिनमें से कुछ ने धमकाने वाले अंदाज में मुझे अपना सिर ढकने के लिए कहा। मैंने इंकार कर दिया और कहा कि मैं मुसलमान नहीं हूं और न ही मस्जिद के अंदर जाने की कोशिश कर रही हूं। मेरे इस जवाब से एक तनाव-सा पैदा हो गया। इन नौजवानों ने क्रोधित होकर कहा कि मुझे वापस ‘इंडिया’ जाना चाहिए। इस घटना के बाद जब भी मैं कश्मीर गई हूं, मैंने पाया है कि जेहादी इस्लाम का असर बढ़ता ही गया है। पहले सिनेमाघर बंद हुए, फिर वीडियो की दुकानें, फिर जबरदस्ती शराबबंदी। बेहिजाब लड़कियों पर हमले होने लगे। देखते-देखते कश्मीरी इस्लाम वहाबी इस्लाम में परिवर्तित हो गया है। इसे स्वीकार किए बिना हमारी इस सबसे पुरानी राजनीतिक समस्या का समाधान ढूंढना असंभव है। ये सब जानते हुए भी मोदी सरकार की तरफ से अब तक नए सिरे से नीति तैयार नहीं हुई है। मुझे उम्मीद थी कि कम से कम उनसे यह सुनने को मिलेगा कि जो ऐतिहासिक समस्या उन्हें विरासत में मिली थी, बदलकर कुछ और हो गई है।
इसलिए एक नई नीति द्वारा नए सिरे से इसका हल ढूंढना ज़रूरी हो गया है। इस नई नीति का आधार होना चाहिए कि सीमाएं बदली नहीं जाएंगी। दूसरा यह कि कश्मीर भारत की अंदरूनी समस्या है, सो पाकिस्तान इसमें दखल न दे। यह भी स्पष्ट हो कि कश्मीरी पंडितों की घर वापसी के लिए पूरी कोशिश की जाएगी और समस्या के समाधान में लद्दाख और जम्मू की उतनी ही भागीदारी होगी, जितनी घाटी की है। अटल जी की पुरानी कश्मीर नीति अब बेमतलब हो गई है, क्योंकि समस्या का चरित्र बदल गया है।