डिजिटल शिक्षा के लिए चाहिए नया निवेश

सृजनपाल सिंह Updated Thu, 22 Oct 2020 04:46 AM IST
विज्ञापन
सांकेतिक तस्वीर
सांकेतिक तस्वीर - फोटो : पीटीआई

पढ़ें अमर उजाला ई-पेपर
कहीं भी, कभी भी।

*Yearly subscription for just ₹299 Limited Period Offer. HURRY UP!

ख़बर सुनें
कोविड-19 ने मार्च 2020 से ही पूरे भारत में 40,000 कॉलेजों और 15 लाख स्कूलों को अस्थायी रूप से बंद करने पर मजबूर कर दिया। इस वर्ष कोविड के वैक्सीन के आने की संभावना धूमिल है। लंबे समय तक इसका संक्रमण जारी रहने की आशंका है। ऐसे में पूरी दुनिया की तरह हमारे देश की शिक्षा व्यवस्था भी डिजिटल युग की एक नई सच्चाई से रूबरू हो रही है। कोरोना संक्रमण की शुरुआत से ही देश के सबसे बड़े ऑनलाइन एजुकेशन प्लेटफॉर्म बाईजूस ने 1.5 करोड़ नए छात्रों को अपने साथ जोड़ा। आज इसके शेयरों की कुल कीमत लगभग 80,000 करोड़ रुपये है, जो देश के स्कूली शिक्षा और साक्षरता बजट का लगभग सवा गुना है। ऑनलाइन प्रतियोगिता परीक्षा की ट्रेनिंग देने वाले अनएकेडमी के तीन करोड़ से भी ज्यादा रजिस्टर्ड यूजर हैं, जिनमें से अधिकांश उसके साथ मार्च के बाद जुड़े।
विज्ञापन

ज्यादातर कॉलेजों और स्कूलों ने शिक्षा के ऑनलाइन तरीके को अपना लिया है, क्योंकि इसके लिए किफायती प्लेटफॉर्म उपलब्ध हैं। डिजिटल शिक्षा प्रणाली कोई नई बात नहीं है। हां, बस इतना हुआ है कि कोविड-19 के कारण तेजी से लोग इस तरफ मुड़े हैं। पारंपरिक शिक्षा के मुकाबले डिजिटल शिक्षा प्रणाली के कुछ स्पष्ट फायदे और समस्याएं भी हैं, जिन्हें समझना आवश्यक है। डिजिटल शिक्षा के प्लेटफार्म तेजी से अपने छात्रों की संख्या बढ़ा सकते हैं। चंद मिनटों में ही बाईजूस अपने सर्वर में इतना स्पेस बना लेता है कि कुछ हजार नए छात्रों को उसमें जोड़ा जा सके, जबकि पारंपरिक शिक्षा व्यवस्था में उतने छात्रों के लिए भवन निर्माण और सुविधाओं का इंतजाम करने में वर्षों लग जाते थे। डिजिटल शिक्षा में कॉलेज के पास सीटों का कोटा बढ़ाने का अवसर है, जिसका लाभ करोड़ों छात्रों को मिल सकता है। अकेले दिल्ली में हर वर्ष 2.5 लाख बच्चे स्कूलों से पास होते हैं, लेकिन कॉलेज में उनके दाखिले के लिए राज्य में महज 1.25 लाख सीटें हैं।
मगर यह भी सही है कि डिजिटल प्रणाली पूरी तरह से भौतिक संरचना की जगह नहीं ले सकती है। उदाहरण के लिए, प्रयोगशाला से जुड़े काम के लिए छात्र कहां जाएंगे? इसके लिए हम एक हाइब्रिड प्रणाली पर काम कर सकते हैं, जिसमें डिजिटल और भौतिक स्वरूप, दोनों को ही शामिल करें। साथ ही, डिजिटल रूप से इंटरएक्टिव लैब बनाने के लिए हम वर्चुअल और ऑगमेंटेड रियलिटी का इस्तेमाल कर सकते हैं। जहां तक गुणवत्ता की बात है, तो डिजिटल एजुकेशन में अच्छे शिक्षक इंटरनेट के जरिये बच्चों को सीधे पढ़ा सकते हैं, और इंटरनेट यदि हर छात्र के लिए उपलब्ध हो जाए, तो शिक्षा का आलोक देश के कोने-कोने तक पहुंच सकता है।
डिजिटल एजुकेशन में छात्र दूसरे कौशल को सीखने में अधिक समय दे सकेंगे। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस शिक्षकों को अपने नियमित कामों को पूरा करने में मदद करेगी और रचनात्मक सामग्री तैयार करने के साथ ही वे अपनी जानकारी समृद्ध कर सकते हैं। इससे हर छात्र की जरूरत के अनुसार सामग्री तैयार करने में मदद मिलेगी। लेकिन डिजिटल शिक्षा की तीन बड़ी चुनौतियां भी हैं। बेशक डिजिटल शिक्षा किफायती है, लेकिन कम आयवर्ग वाले समूह के छात्रों के लिए इसे हासिल करना
महंगा हो सकता है। सर्वेक्षणों में यह जानकारी सामने आई है कि मात्र एक तिहाई अभिभावक ही अपने बच्चों के लिए डिजिटल शिक्षा की व्यवस्था कर सकते हैं। इंटरनेट के साथ एक डिजिटल स्क्रीन पर साल में कम से कम 6,000 रुपये का खर्च आएगा। 

इस हिसाब से भारत में सीमित आय वर्ग के सभी बच्चों तक इसे पहुंचाने में 80,000 करोड़ रुपये का खर्च आ सकता है। एक समस्या यह भी है कि ऑनलाइन शिक्षा व्यवस्था में युवाओं में सामाजिक कौशल का विकास कैसे किया जाए! ऑनलाइन शिक्षा के छोटे-छोटे बच्चों की सेहत पर पड़ने वाले असर से निपटने के बारे में भी हमें सोचना पड़ेगा। हमें आने वाले समय में शिक्षा प्रणाली के मिले-जुले तरीके को आगे बढ़ाना पड़ेगा, जिसमें डिजिटल शिक्षा की बड़ी हिस्सेदारी होगी। कोरोना संकट ऐसा अवसर है, जब हमारी शिक्षा प्रणाली एक बड़ी छलांग लगा सकती है। लेकिन नया प्रयोग करने के साथ ही हमें नए निवेश के लिए भी तैयार रहना होगा। 

(-लेखक कलाम सेंटर के सीईओ हैं।) 
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

Spotlight

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
Election
  • Downloads

Follow Us

X

प्रिय पाठक

कृपया अमर उजाला प्लस के अनुभव को बेहतर बनाने में हमारी मदद करें।
डेली पॉडकास्ट सुनने के लिए सब्सक्राइब करें

क्लिप सुनें

00:00
00:00
X