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आरक्षण: समानता जो विकास के साथ चले, व्यवस्था की विषमताओं को दूर करने की जरूरत

Wed, 11 Oct 2023 07:02 AM IST
Shankar Ayair शंकर अय्यर
Updated Wed, 11 Oct 2023 07:02 AM IST
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सार
1931 की जनगणना पर आधारित आरक्षण की भारतीय व्यवस्था की कमियों और अवसर व आय की विषमताओं को दूर करने के लिए आरक्षण के वर्तमान मॉडल के पुनर्गठन की जरूरत बेशक है। लेकिन यह कवायद केवल जरूरतमंदों की पहचान करने तक ही सीमित नहीं रह सकती।
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need for reconstitution of current model of reservation based on 1931 census caste based survey
सीएम नीतीश कुमार (फाइल फोटो) - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

जाति आधारित जनगणना से संबंधित सवाल पिछले करीब दो दशकों से संसद में नियमित तौर पर उठते रहे हैं। पर, केंद्र सरकार ने स्वतंत्रता के बाद से अब तक जो भी जनगणनाएं कराई हैं, उसमें अनुसूचित जाति व जनजाति के अलावा जाति आधारित जनगणना नहीं कराई है। इसी वजह से कई बार हमें चुनौतीपूर्ण हालात का सामना करना पड़ता है। बिहार सरकार ने हाल ही में जातियों पर सर्वे के नतीजे घोषित कर चुनौती पेश कर दी है।



सर्वे के मुताबिक, पिछड़ा वर्ग की आबादी आरक्षण के वर्तमान मॉडल में जितनी मानी जाती है, उससे कहीं ज्यादा है। सर्वे कहता है अन्य पिछड़ा वर्ग कुल आबादी का 27 फीसदी और अति पिछड़ा वर्ग कुल आबादी का 36 फीसदी है। स्वाभाविक है कि बिहार में जाति आधारित गणना ने भारतीय राजनीति में एक तूफान ला दिया है। इससे देश के समाज व राजनीति में जातियों और कोटा की व्यवस्था में निहित खामियों पर बहस फिर से शुरू हो गई है।


आश्चर्य नहीं कि विपक्ष ने एक सुर में एक राष्ट्रीय जाति आधारित गणना की मांग करनी शुरू कर दी है। पर इससे जुड़े ‘अगर’, ‘कैसे’ और ‘कब’ जैसे सवाल राजनीति की दिशा व राजनीतिक दलों के रुख पर निर्भर करेंगे। इस पर बयानबाजी तेज हो चुकी है और इसकी गूंज आगामी विधानसभा और लोकसभा चुनावों में सुनाई देनी तय है। यह देखना भी रोचक है कि आजादी के सात दशक और मंडल आयोग की सिफारिशों को लागू करने के तीन दशक बाद भी जाति का मुद्दा राजनीति में हलचल पैदा करने की ताकत रखे हुए है। सर्वे में जो आंकड़े सामने आते हैं, वे इस स्थिति के कारणों व नतीजों को उजागर करते हैं।

भारत की अर्थव्यवस्था की संरचना पर विचार करें, तो सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में कृषि का योगदान 18.3 फीसदी है और यह 45 फीसदी से ज्यादा कार्यबल को रोजगार देता है। जाहिर है, तकरीबन आधा कार्यबल राष्ट्रीय आय के छठे हिस्से पर निर्भर करता है। परिचालन जोत का औसत आकार बमुश्किल 1.08 हेक्टेयर है और इससे स्वाभाविक ही उपज और आय में कमी आती है। एक अगस्त को, सरकार ने संसद को सूचित किया कि पूरे भारत में कृषि परिवारों की औसत मासिक आय 10,218 रुपये थी, जिसमें  झारखंड में 4,895 रुपये, बिहार में 7,542 रुपये और उत्तर प्रदेश में 8,061 रुपये थी।

पर, कोटा में उचित हिस्सेदारी की मांग केवल पिछड़े वर्गों तक ही सीमित नहीं है। मराठा, पाटीदार, जाट और कापू जैसे अपेक्षाकृत शक्तिशाली वर्गों  की तरफ से भी हाल के दिनों में आरक्षण के लिए आंदोलन किए गए हैं। इसके पीछे की वजह कृषि की घटती व्यवहार्यता है। औद्योगिक और कृषि प्रधान राज्यों के बीच जो फर्क होता है, वह राष्ट्रीय आंकड़ों में भी परिलक्षित होता है। भारत की प्रति व्यक्ति आय 1,96,983 रुपये है। इस सूची में सबसे ऊपर तेलंगाना है, जिसकी प्रति व्यक्ति आय 3,08,732 रुपये है।  इसके बाद करीब तीन लाख रुपये की प्रति व्यक्ति आय के साथ कर्नाटक और 2.96 लाख रुपये के साथ हरियाणा है। इसके बिल्कुल उलट, बिहार में प्रति व्यक्ति जीएसडीपी राष्ट्रीय औसत का लगभग एक-चौथाई यानी 54,383 रुपये है, उत्तर प्रदेश में यह 79,396 रुपये और झारखंड में 80,060 रुपये है।

कम आय और इससे पैदा होने वाली असमानता का असर संपत्ति पर स्वामित्व के रूप में प्रकट होता है। ऋण और निवेश पर 77वें दौर की एनएसएस रिपोर्ट से पता चलता है कि शीर्ष 10 फीसदी परिवारों के पास आधी से ज्यादा संपत्ति है, जबकि नीचे के 50 फीसदी के पास 10 फीसदी से भी कम संपत्ति है। जरूरतों का परिदृश्य कल्याणकारी गतिविधियों के विस्तार से स्पष्ट होता है। रोजगार की उम्मीद और वास्तविकता के बीच अंतर को पाटने के लिए 2005 में ग्रामीण रोजगार योजना मनरेगा बनाई गई थी। 2023 में इसमें 26.59 करोड़ से अधिक पंजीकृत कर्मचारी हैं।

पिछले तीन वर्षों में, मनरेगा पर औसत खर्च तकरीबन एक लाख करोड़ रुपये, जबकि शुरुआत से अब तक कुल खर्च 9.68 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा रहा है। राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम दस वर्ष पुराना है। इस साल सरकार ने 81.35 करोड़ लोगों को मुफ्त राशन मुहैया कराने के लिए करीब दो लाख करोड़ रुपये आवंटित किए हैं। वृद्धावस्था पेंशन से लेकर महिलाओं को नकद भुगतान तक के राज्यों द्वारा प्रशासित कार्यक्रम इसमें जोड़े जाएं, तो यह आंकड़ा और ऊपर जाएगा।

राष्ट्रीय भुगतान निगम के पास प्रत्यक्ष भुगतान हस्तांतरण के लिए 7,517 कोड पंजीकृत हैं। कृषि या मौसमी आय पर निर्भर कई परिवारों के लिए एक निश्चित आय बुनियादी जीविका का भरोसा देती है। यही वजह है कि देश के युवा कोटा के माध्यम से मिलने वाली सरकारी नौकरी को गरीबी से बाहर निकलने का रास्ता मानते हैं। लेकिन युवाओं को निराशा तब होती है, जब वे राजनीतिक उदासीनता के चलते बेरोजगारी और रिक्त पड़े सरकारी पदों के सह-अस्तित्व को देखते हैं।

एक आकलन के मुताबिक, इस वक्त केंद्र और राज्य सरकारों में करीब बीस लाख पद खाली पड़े हैं। इस जुलाई में, सरकार ने राज्यसभा को सूचित किया कि केंद्र सरकार के विभिन्न विभागों में 9.64 लाख पद खाली हैं। दिसंबर, 2022 में सरकार ने संसद को सूचित किया कि राज्यों में 12 लाख से अधिक शिक्षकों के पद खाली हैं। 1.17 लाख स्कूल तो ऐसे बताए गए हैं, जहां एक ही शिक्षक है।

जाहिर है कि पार्टियां चुनाव के दिनों में रियायतें देना पसंद करती हैं। पर, अफसोस की बात है कि नए वादों के लिए आवंटन बुनियादी सेवाएं प्रदान करने की कीमत पर होता है। एक बुनियादी मुद्दा जो राजनीतिक दलों द्वारा लगातार उठाया जाता रहा है, वह यह है कि आरक्षण का पूरा मॉडल 1931 की जनगणना पर आधारित है। यह सच है कि अवसर और आय की विषमताओं को दूर करने के लिए आरक्षण के वर्तमान मॉडल के पुनर्गठन की जरूरत है। लेकिन उससे बड़ा सच है कि यह कवायद केवल जरूरतमंदों की पहचान करने तक ही सीमित नहीं रह सकती। किसी भी समस्या के समाधान के लिए केवल उसकी पहचान करना ही पर्याप्त नहीं होता।

जाति आधारित जनगणना की मांग करने वाले राजनीतिक दलों को विकास को बढ़ावा व जनसांख्यिकीय लाभांश का दोहन करने के लिए कृषि के आधुनिकीकरण, मानव पूंजी में निवेश और रोजगार सृजन के लिए अपना भरोसेमंद एजेंडा स्पष्ट करना चाहिए। समानता निस्संदेह जरूरी है, लेकिन इसे विकास के एक विश्वसनीय मॉडल के साथ जुड़ा होना चाहिए। इसके बगैर कोटा की बात करना, एक ऐसे वायदे की तरह है, जिसका समय निकल चुका है।

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