फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Columns ›   Opinion ›   NDA's electoral budget

एनडीए का चुनावी बजट

Thu, 01 Feb 2018 09:08 PM IST
शंकर अय्यर
शंकर अय्यर Updated Thu, 01 Feb 2018 09:08 PM IST
विज्ञापन
NDA's electoral budget
ग्रामीण लोग

एक पुरानी कहावत में राजाओं और राजदरबारियों को चेतावनी देते हुए कहा गया है : गरीबों के आंसुओं से डरो, क्योंकि वे ताकतवरों को भी डुबो सकते हैं। दशकों से उत्तरोत्तर सरकारों का अब यह चलन ही हो गया है कि वे गरीबी हटाओ जैसे नारों तथा कार्यक्रमों का वायदा कर इस चेतावनी को सुनने का एहसास कराती हैं। पुराने जमाने में साधुओं द्वारा व्यक्त की गई ऐसी भावनाओं की प्रतिध्वनि उत्तर प्रदेश समेत कई चुनाव अभियानों में सुनी गई। पिछले कुछ साल में इस तरह की जो चीजें देखी-सुनी गईं, गुजरात के हाई वोल्टेज चुनाव प्रचार में उसका शोर शिखर पर था।


loader

2018 का बजट गरीबों, साधनहीनों, किसानों तथा युवाओं के लिए प्रार्थना और तुष्टीकरण का निवेदन, दोनों है। चूंकि नौ राज्यों में विधानसभा चुनावों के साथ लोकसभा चुनाव भी नजदीक हैं, ऐसे में, यह बजट प्राचीन साधुओं की चेतावनियों तथा विकास और समृद्धि के हाशिये पर खड़े लोगों की हताशा का स्वीकार है। 2018 का बजट एनडीए का चुनावी बजट है। यह कृषि की बदहाल वास्तविकता और बढ़ती बेरोजगारी से पैदा दुश्चिंता तथा इसका प्रतिकार करने का वायदा-दोनों का प्रमाणीकरण है-गरीब, नौकरी/रोजगार, किसान, कृषि और स्वास्थ्य जैसे शब्दों का बजट में बार-बार उल्लेख हुआ है।

हर दशक में गरीब, किसान तथा युवाओं के मतदाता वर्ग ने ही राजनीतिक अदल बदल तथा सत्ता परिवर्तन को अंजाम दिया है। वित्त मंत्री अरुण जेटली के 90 मिनट से कुछ अधिक का बजट भाषण जहां सत्तारूढ़ पार्टी की चुनावी तथा राजनीतिक चिंता को रेखांकित करता है, वहीं यह भारत की वास्तविकताओं को मान्यता देता है। लंबे बजट भाषण के 11 पैराग्राफ तथा 750 शब्द गरीबों तथा साधनहीनों को, 11 पैराग्राफ और करीब 800 शब्द खेती और किसानी से जुड़े मुद्दों को, 13 पैराग्राफ और 790 शब्द ग्रामीण भारत को, 12 पैराग्राफ और 500 शब्द रोजगार और युवाओं तथा मध्यवर्ग को दिए गए लॉलीपॉप को समर्पित हैं। फसलों का न्यूनतम समर्थन मूल्य बढ़ाकर तथा उन्हें बाजारों से जोड़कर पांच साल में ‘किसानों की आय दोगुनी करना’, बजटीय आवंटन तथा बीमा योजनाओं के जरिये गरीबों और साधनहीनों के लिए शिक्षा, सामाजिक सुरक्षा, स्वास्थ्य सेवा और आवास मुहैया कराना तथा आवंटन बढ़ाकर ‘युवाओं में ऊर्जा भरने’ के लिए कौशल तथा रोजगार देना बजट की मुख्य बातें हैं।

सैद्धांतिक तौर पर बजट पिछले वर्ष का वित्तीय लेखा-जोखा तथा भविष्य का एजेंडा होता है। जबकि भारत में बजट का मतलब है दशकों से क्या नहीं हुआ, और पिछले कुछ साल में क्या नहीं किया जा सका। कृषि की स्थिति, इससे जुड़े अलाभकारी बिजनेस मॉडल तथा देश भर में किसानों की बदहाली परिचित तथ्य हैं-जमीनों के मालिक पाटीदारों, मराठों, जाटों और कापुओं तथा दिल्ली में प्रदर्शन कर रहे तमिलनाडु के किसानों के गुस्से के रूप में यह प्रतिबिंबित होता रहा है। यह भाजपा के 2014 के घोषणापत्र से भी स्पष्ट हुआ था, जिसमें उसने ‘कृषि लागत का न्यूनतम 50 फीसदी मुनाफा देकर कृषि में लाभप्रदता बढ़ाने’ जैसे कदमों का वायदा किया था।

इन पंक्तियों का लेखक बार-बार यह कहता आया है कि कृषि को नया जीवन देने के लिए अमूल-2 जैसी पहल की आवश्यकता है और पिछले चार में से तीन बजटों में एकीकृत राष्ट्रीय कृषि बाजार की जरूरत का उल्लेख हुआ है। नए ऑपरेशन ग्रीन में 22,000 ग्रामीण हाटों का विस्तार इस जरूरत की स्वीकारोक्ति होने के साथ राज्य सरकारों द्वारा ई-नैम या इलेक्ट्रॉनिक नेशनल एग्रीकल्चर मार्केट को लागू करने के मामले में राज्य सरकारों की विफलता का स्वीकार भी है।

पिछले करीब एक दशक से यह स्वीकारा गया है कि स्वास्थ्य सेवा तक पहुंच न होने के कारण गरीबों की हालत और भी दयनीय हुई है। सरकार का हालिया अध्ययन बताता है कि स्वास्थ्य सेवा का 75 फीसदी खर्च परिवार वालों को ही उठाना पड़ता है। इसके बावजूद न तो स्वास्थ्य सेवा सुविधाओं का विस्तार हुआ और न ही स्वास्थ्य बीमा को गति देने के मामले में संजीदगी देखी गई।

पिछले दो दशक से भी अधिक समय से शिक्षा क्षेत्र का हाल सबको मालूम है-लगभग हर सरकारी और गैरसरकारी रिपोर्टों में यह सच्चाई बार-बार सामने आई है कि आठवीं कक्षा का छात्र गणित के सामान्य सवाल हल नहीं कर सकता, न ही पांचवीं कक्षा के पाठ पढ़ सकता है। इससे खासकर गरीब राज्यों के गरीब छात्रों में सरकारी स्कूलों से निकलकर निजी स्कूलों में दाखिला लेने की प्रवृत्ति तेज हुई है। शिक्षा की बदहाली और कौशल प्रशिक्षण की खराब स्थिति के कारण-यह याद करना चाहिए कि 2006 में शुरू हुआ कौशल विकास कार्यक्रम आज तक रफ्तार नहीं पकड़ पाया है-लाखों युवा आधुनिक अर्थव्यवस्था के लिए तैयार ही नहीं हो पाए हैं। सात फीसदी आर्थिक विकास के बावजूद उत्तर प्रदेश, बिहार, गुजरात या असम के क्षुब्ध युवाओं का रोजगार के लिए सड़कों पर उतरना हकीकत बताने के लिए काफी है। 2018 के चुनावी बजट में इन मुद्दों और इनके समाधान पर फोकस है, लेकिन इन्हें कैसे लागू किया जा सकेगा, इस पर भ्रम है। राजनीतिक रूप से मजबूत एपीएमसी (कृषि उत्पाद विपणन समिति) कृषि बाजारों को खोले जाने का विरोध करती आई है। बीमा के जरिये स्वास्थ्य सेवा को विस्तार देने की कोशिशें जिला मुख्यालयों में सहूलियतों के अभाव में बेअसर साबित होती रही हैं। फंडिंग का मुद्दा तो है ही, मुद्दा कठोर ढांचे का भी है, जो क्रियान्वयन को बाधित करते हैं। पिछले एक दशक में सामाजिक क्षेत्र के लिए केंद्र तथा राज्य सरकारों का खर्च दो लाख करोड़ से बढ़कर नौ लाख करोड़ हो चुका है। इसके बावजूद नतीजा नहीं निकला है।

चूंकि कृषि, ग्रामीण विकास, स्वास्थ्य और शिक्षा राज्यों के विषय हैं, इसलिए अब फोकस बदलकर राज्य सरकारों पर होना चाहिए तथा विफलता के लिए उन्हीं को जिम्मेदार ठहराना चाहिए। जैसा कि कवि कहेगा, अब तुम्हारे हवाले है विकास राज्यो। 

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

Next Article

Followed