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हमारी नौसेना को पनडुब्बियां चाहिए
Tue, 25 Jun 2019 02:40 PM IST
Raman Singh
रंजीत कुमार
रंजीत कुमार
Published by: Raman Singh
Updated Tue, 25 Jun 2019 02:40 PM IST
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भारतीय पनडुब्बी
- फोटो : Indian Navy
रक्षा मंत्रालय ने हाल ही में नौसेना के लिए छह नई पनडुब्बियां हासिल करने के करीब 45,000 करोड़ रुपये के सौदे के लिए आरंभिक टेंडर जारी कर दिया। मोदी सरकार के दूसरे कार्यकाल में एक महीने के भीतर सैन्य ताकत मजबूत करने का यह पहला बडा कदम उठाया गया है। इन पनडुब्बियों की मंजूरी 2007 में ही मिल गई थी, पर पिछले बारह साल से विभिन्न सरकारें इसके सौदे और निर्माण की प्रक्रिया के बारे में ही उलझी रहीं। हालांकि यह सौदा संपन्न करने से लेकर इन्हें नौसेना को सौंपने में एक दशक से भी अधिक का वक्त लग सकता है। यह प्रसंग बताता है कि भारतीय सैन्य तैयारी किस तरह राजनीतिक अनिश्चितता का शिकार बनती है।
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हिंद महासागर में चीन की बढ़ती गतिविधियों के मद्देनजर अपने समुद्री हितों की रक्षा के लिए समुचित संख्या में नए पोत हासिल करने की भारी जरूरत महसूस की जा रही थी। कारगिल युद्ध के बाद देश के सामने पैदा नई सामरिक चुनौती के अनुरूप दो नई पनडुब्बी निर्माण सुविधा बनाने का नीतिगत फैसला लिया गया था। इसके तहत प्रोजेक्ट-75 के अंतर्गत 2006 में फ्रांस के सहयोग से मुंबई की मझगांव गोदी में छह स्कारपीन पनडुब्बियां बनाने का करीब 23,000 करोड़ रुपये का सौदा किया गया था। उसके एक साल बाद छह नई पनडुब्बियां देश में ही भारतीय कंपनियों को साथ लेकर बनाने को मंजूरी दी गई थी।
प्रोजेक्ट-75 के तहत स्कारपीन वर्ग की दो पनडुब्बियां नौसेना को पिछले दो साल में सौंपी जा चुकी हैं, जबकि बाकी निर्माण की विभिन्न अवस्था में हैं। हमारे रक्षा कर्णधारों ने 1999 में तय किया था कि 2030 तक नौसेना के पास 24 पनडुब्बियां होनी चाहिए। फिलहाल नौसेना के पास रूसी किलो वर्ग की जो नौ पनडुब्बियां हैं, वे दो दशक से अधिक पुरानी हो चुकी हैं। जर्मन टाइप-209 वर्ग की चार पनडुब्बियां भी दो दशक से अधिक पूरानी हो चुकी हैं।
अगले दशक के अंत तक जब इन दोनों वर्गों की पनडुब्बियों को रिटायर करना होगा, तब तक नौसेना के पास केवल स्कारपीन वर्ग की छह पनडुब्बियां ही बचेंगी औरे रूस से लीज पर ली गई एक परमाणु पनडुब्बी को रूस को लौटाना होगा। नौसेना की एकमात्र अरिहंत परमाणु पनडुब्बी के अलावा दो और परमाणु पनडुब्बी 2030 तक नौसेना में शामिल हो सकेंगी। यानी अगले दशक के अंत तक करीब एक दर्जन पनडुब्बियां ही बचेंगी।
सवाल यह उठता है कि 2030 तक हिंद महासागर से प्रशांत महासागर तक के इलाके में निरंतर चौकसी की बढ़ी जिम्मेदारी सीमित पनडुब्बियों से कैसे पूरी होगी। नौसेना को ऑस्ट्रेलिया से लेकर अफ्रीकी तट और फारस की खाड़ी से मलक्का तक अपने विशाल समुद्री इलाके में पनडुब्बियों की क्षमता निरंतर बढ़ाते रहने की जरूरत है, क्योंकि अगले कुछ साल में हिंद महासागर के इलाके के बड़ी ताकतों का अखाड़ा बन जाने की पूरी आशंका है।
चूंकि फिलहाल नई पनडुब्बियां हासिल करने की हमारी कोई और योजना नहीं है, ऐसे में, हमारी नौसेना हिंद महासागर में टोह लेने की अपनी वांछित क्षमता से कहीं पीछे रहेगी। जबकि हमें पनडुब्बी क्षमता का विकास अपने मुख्य प्रतिद्वद्वी देशों चीन और पाकिस्तान की पनडुब्बी क्षमता के मद्देनजर करना होगा। चीन के पास परमाणु और डीजल पनड्ब्बियों सहित 68 और पाकिस्तान के पास दस डीजल पनडुब्बियां हैं, जो हिंद महासागर के इलाके में भारत के लिए चुनौती बन सकती हैं। इनसे मुकाबला के लिए हमारी नौसेना की पनडुब्बी क्षमता में तत्काल समुचित बढ़ोतरी की जरूरत है।