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जम्मू-कश्मीर में फिर दिखी प्रकृति की विनाशक शक्ति: चेतावनियों के बावजूद लापरवाही क्यों? आपदाओं के बीच सवाल...
Thu, 28 Aug 2025 08:06 AM IST
ज्योति भास्कर
अमर उजाला, नई दिल्ली।
अमर उजाला, नई दिल्ली।
Published by: ज्योति भास्कर
Updated Thu, 28 Aug 2025 08:06 AM IST
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जम्मू-कश्मीर में भूस्खलन, दिखी प्रकृति की मार
- फोटो :
एएनआई
विस्तार
जम्मू के कटड़ा स्थित वैष्णो देवी मंदिर मार्ग पर हुआ भू-स्खलन एक बार फिर प्रकृति की विनाशकारी शक्ति को तो सामने लाया ही है, इसने फिर से यह भी दर्शाया है कि प्राकृतिक आपदाओं से निपटने की हमारी तैयारियों में अभी कितनी कमियां हैं। अब तक करीब 32 लोगों के मारे जाने की खबर है और घायलों की संख्या भी अच्छी-खासी है।
दरअसल, मंगलवार को दोपहर करीब तीन बजे पत्थर और चट्टानें तेजी से गिरने लगीं, जिसके परिणामस्वरूप वैष्णो देवी यात्रा को अस्थायी तौर पर रोक दिया गया। इस किस्म के हादसों की जब खबरें आती हैं, तब बरबस इस बात पर ध्यान जाता है कि संचार माध्यमों ने दुनिया को जितना छोटा कर दिया है, संवेदनाओं की खाई को शायद उतना ही चौड़ा कर दिया है।
क्या अब सरकारी कर्मकांडों या अकर्मकांडों के अलावा बार-बार आ रही इन आपदाओं के प्रति सामाजिक या मानवीय स्तर पर कोई दुख, कोई हलचल, कोई सुगबुगाहट दिखाई देती है? लेकिन इसे महज प्राकृतिक आपदा मानकर स्वीकार कर लेना अपने इक्कीसवीं सदी के वैज्ञानिक मनुष्य होने का अपमान करना है।
उल्लेखनीय है कि मंदिर तक जाने के लिए दो रास्ते हैं- हिमकोटि मार्ग पर सुबह से ही यात्रा स्थगित कर दी गई थी, जबकि पुराने मार्ग पर दोपहर डेढ़ बजे तक यात्रा जारी थी, जिसके बाद अधिकारियों ने मूसलाधार बारिश के मद्देनजर अगले आदेश तक इसे स्थगित करने का निर्णय लिया। यहां सवाल उठता है कि बादल फटने, अचानक बाढ़ और भू-स्खलन की संभावनाओं के साथ बहुत भारी बारिश की भविष्यवाणी करने वाले मौसमी अलर्ट के बावजूद, पुराने मार्ग के माध्यम से मंदिर की यात्रा को स्थगित करने में प्रशासन ने देरी क्यों की?
यह जानते हुए कि क्षेत्र के किश्तवाड़, कठुआ और रियासी जिलों में िपछले 12 दिनों के भीतर 136 लोगों की जान चली गई, जिनमें 129 तीर्थयात्री शामिल हैं और मौसम विभाग भी हर घंटे मौसम का पूर्वानुमान जारी कर प्रशासन को चेतावनी जारी कर रहा था, तब ऐसी लापरवाही तो बिल्कुल भी नहीं होनी चाहिए थी।
इन चेतावनियों को लेकर प्रशासन ने उचित ही अमरनाथ यात्रा को स्थगित करने का निर्णय लिया था, लेकिन वही समझदारी वैष्णो देवी यात्रा को सही समय पर स्थगित करने में दिखाई न देने से सवाल तो उठते ही हैं। अगर कुछ ही घंटों पहले ऐसी प्राकृतिक आपदाओं की हल्की-सी आशंका पर ही हमारा प्रशासनिक अमला चुस्त-दुरुस्त हो जाए, तो क्या नुकसान को बड़ी हद तक सीमित नहीं किया जा सकेगा?
कहीं ऐसा तो नहीं कि प्रकृति के तांडव के आगे नतमस्तक हो जाने की मानसिकता के चलते बार-बार आ रही इन आपदाओं के प्रति हमारी संवेदनाएं भी कुंद होती जा रही हैं?