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राष्ट्र की सुरक्षा ज्यादा जरूरी
तवलीन सिंह
Updated Sun, 31 Jan 2016 06:22 PM IST
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जब से आईएस ने साबित किया है कि वह दुनिया के किसी भी शहर में बेगुनाहों को मार सकते है, तब से जेहादी आतंकवाद ने एक नया रूप गढ़ा है। दावोस में पिछले सप्ताह मुझे मिस्र का एक दोस्त मिला, जिसने कहा कि दाएश (आईएस) की पहुंच अब तकरीबन हर जेहादी संस्था तक है। यह ऐसा खतरनाक है कि दुनिया को संगठित होकर इसका सामना करना पड़ेगा।
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ये शब्द मेरे दोस्त के मुंह से निकले ही थे कि मालूम पड़ा, पेशावर में किसी मस्जिद के सामने आत्मघाती हमला किया गया है, जिसमें कई लोग मारे गए। आतंकी हमले की आशंका पूरी दुनिया में है। पर अपने इस भारत महान में इस मंडराते खतरे के बारे में हम अब भी दबी जुबान से ही बात करते हैं। इसकी वजह यह है कि जेहादी आतंकवाद के बारे में अगर कोई कुछ कहने की हिम्मत करता है, तो फौरन उस पर सांप्रदायिक होने का इल्जाम लग जाता है। ऐसा मेरे साथ भी हुआ। पठानकोट हमले के बाद मैंने अपने एक लेख में जेहादी आतंकवाद के खिलाफ रणनीति तय करने की जरूरत पर लिखा, तो कांग्रेस नेता सलमान सोज ने मेरे बारे में लिखा कि मैं बेकार ही खतरे की घंटी बजा रही हूं, क्योंकि पिछले वर्ष भारत में जेहादी हमले कम हुए, और दुनिया में जहां भी ऐसे हमले हुए हैं, वहां मरने वालों में ज्यादातर मुसलमान होते हैं। सलमान सोज ने जो बात कही, वह मैंने कई बार दूसरे भारतीय मुसलमानों से सुनी है। सो, स्पष्ट शब्दों में यह कहना जरूरी है कि बात हिंदू-मुस्लिम की नहीं, राष्ट्र की सुरक्षा की है। जब तक हम इसे मानकर आगे नहीं बढ़ेंगे, तब तक इस खतरे का सामना नहीं कर पाएंगे।
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पिछले सप्ताह हमारी सुरक्षा संस्थाओं ने खबर दी कि लखनऊ के कुछ मुस्लिम नौजवानों ने दाएश का एक भारतीय दस्ता गठित किया है, जिसकी मंशा है आईएस के लिए भारतीय नौजवानों की भर्ती करना। तो क्या हम यह मानकर चलें कि भारतीय मुसलमानों की सहानुभूति आईएस के साथ है? ऐसा सोचना भी गलत है, क्योंकि शायद ही दूसरा कोई देश है, जिसमें मुसलमानों की इतनी बड़ी आबादी होने के बावजूद इतने कम लोग गए हैं आईएस में शामिल होने। यह साबित करता है कि जेहादी आतंकवाद में भारतीय मुसलमानों की कोई रुचि नहीं है। यह बहुत अच्छी बात है। लेकिन ऐसा भी नहीं है कि इनको गुमराह करने की कोशिशें नहीं हो रहीं। मालदा में हाल ही में हमने देखा कि मजहब के नाम पर किस तरह भीड़ को सड़क पर उतारा गया। कई बार राजनीतिक दलों द्वारा इस मकसद से अफवाहें फैलाई जाती हैं कि मुसलमान उनको चुनाव में वोट देंगे। ऐसी गंदी राजनीति अब बंद होनी चाहिए, क्योंकि वैश्विक वातावरण इतना बदल गया है कि हर गैरइस्लामी देश में मुस्लिमों को शक की निगाह से देखा जाता है।
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डोनाल्ड ट्रंप, जो अगले अमेरिकी राष्ट्रपति बन सकते हैं, साफ शब्दों में कह चुके हैं कि कुछ समय के लिए मुसलमानों को अमेरिका आने से रोका जाना चाहिए। उनके इस बयान की खूब आलोचना हुई, इसके बावजूद रिपब्लिकन पार्टी की नुमाइंदगी हासिल करने में वह सबसे आगे हैं।
ऐसे माहौल में भारत ही एक देश है, जहां मुसलमान पूरी तरह सुरक्षित हैं। सो उनके मन में डर या द्वेष पैदा करने की कोशिशों को रोकने की जरूरत है। वोट बैंक को लेकर दशकों से जो खेल खेला गया है, वह खेल अब राष्ट्र की सुरक्षा के लिए खतरा बन गया है।