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जी-20 में राष्ट्रीय हित: भारत अपने राष्ट्रीय हित में फैसले लेगा

Sun, 30 Jun 2019 06:26 PM IST
Raman Singh मनोज जोशी
मनोज जोशी Published by: Raman Singh Updated Sun, 30 Jun 2019 06:26 PM IST
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National interest in G-20
पीएम मोदी और राष्ट्रपति ट्रंप की मुलाकात - फोटो : ANI

जी-20 का गठन 1999 में अंतरराष्ट्रीय वित्तीय स्थिरता के उद्देश्य से विकसित एवं विकासशील देशों के एक मंच के रूप में किया गया था। 1997 के गंभीर एशियाई संकट की पृष्ठभूमि में, जिसने पूर्व और दक्षिण-पूर्व एशिया को ज्यादा प्रभावित किया और जिसके विश्वव्यापी बनने का खतरा पैदा हो गया था, इसका गठन हुआ। 2008 के वैश्विक वित्तीय संकट के बाद वैश्विक समुदाय ने अपने एजेंडे का विस्तार करने और इसे सरकार और राज्यों के प्रमुखों का एक शिखर सम्मेलन बनाने का फैसला किया। इसमें 19 देशों के साथ-साथ यूरोपीय संघ भी शामिल है, जिनकी अर्थव्यवस्था की वैश्विक जीडीपी में 90 फीसदी और व्यापार में 80 फीसदी की हिस्सेदारी है।


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इस वर्ष जी-20 का शिखर सम्मेलन जापान के ओसाका में हुआ, जिसका प्रमुख मुद्दा बढ़ते संरक्षणवाद के मद्देनजर विश्व व्यापार व्यवस्था को ध्वस्त होने से बचाना था। लेकिन जिन अन्य वैश्विक मुद्दों पर चर्चा की गई है, उनमें जलवायु परिवर्तन पर कार्रवाई और संशोधित डिजिटल अर्थव्यवस्था के मद्देनजर वैश्विक व्यापार नियमों को संशोधित और अद्यतन करने की आवश्यकता भी शामिल है। हालांकि इनमें से कई मुद्दे पहले से जारी वार्ताओं का हिस्सा हैं। इसलिए यह आश्चर्यजनक नहीं कि अधिकांश कार्रवाई द्विपक्षीय और कभी-कभी त्रिपक्षीय वार्ताओं पर केंद्रित हैं, जो विश्व नेताओं द्वारा की जाती हैं। निस्संदेह सबसे महत्वपूर्ण द्विपक्षीय वार्ता चीन और अमेरिका के बीच हुई। उस बैठक के, जिसे स्वयं अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप ने उम्मीदों से बेहतर बताया, निहितार्थ आने वाले महीनों में वैश्विक आर्थिक विकास में दिखेंगे। इस बैठक में अमेरिका 300 अरब डॉलर के चीनी सामान पर और शुल्क न लगाने पर सहमत हो गया है और उनके बीच आर्थिक और व्यापार वार्ता फिर से शुरू करने पर भी समझौता हुआ है, जिसे कुछ महीने पहले बंद कर दिया गया था, जब अमेरिका ने चीन पर अपनी प्रतिबद्धताओं से मुकरने का आरोप लगाया था। लेकिन सबसे महत्वपूर्ण अमेरिका का वह फैसला है, जिसके तहत उसने अपनी कंपनियों को हुआवेई को अपने उत्पाद बेचने की अनुमति दी है। इस कंपनी को कुछ महीने पहले अमेरिका ने प्रतिबंधित कर दिया था। हुआवेई 5जी नेटवर्क का वैश्विक अगुआ है और विगत मई में अमेरिका ने राष्ट्रीय सुरक्षा के नाम पर इस कंपनी से व्यापार पर प्रतिबंध लगा दिया था।

भारतीय दृष्टिकोण से प्रधानमंत्री मोदी और अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप के बीच मुलाकात पर सबकी नजर थी, क्योंकि नवंबर, 2017 के पश्चात और मोदी के फिर से प्रधानमंत्री चुने जाने के बाद दोनों नेताओं के बीच यह पहली बैठक थी। विदेश सचिव विजय गोखले के मुताबिक, दोनों नेताओं ने ईरान, 5 जी, व्यापार और रक्षा संबंध-यानी कुल चार मुद्दों पर बातचीत की।

विदेश मंत्री एस जयशंकर और उनके अमेरिकी समकक्ष माइक पोम्पियो के बीच पहले हुई बैठक में ही भारत ने स्पष्ट कर दिया था कि पश्चिम एशिया में शांति और स्थिरता भारत के लिए महत्वपूर्ण है। अमेरिकी दबाव पर भारत ने भले ही ईरान से अपने तेल आयात को शून्य पर ला दिया, लेकिन वह उस क्षेत्र की स्थिति से सहज महसूस नहीं कर रहा, जिसने उसकी ऊर्जा सुरक्षा पर असर डाला है।

यह स्पष्ट नहीं है कि वास्तव में 5जी नेटवर्क के आयात पर क्या चर्चा हुई। न तो भारत और न ही अमेरिका के पास वह तकनीक है, जो चीन की हुआवेई, दक्षिण कोरिया की सैमसंग, स्वीडन की इरिक्शन और फिनलैंड की नोकिया के पास है। यह सुझाव, कि इस तकनीक को विकसित करने के लिए भारत और अमेरिका सहयोग करेंगे, थोड़ा अजीब लगता है, क्योंकि इसे विकसित करने में वर्षों लगेंगे और यह फिर से पहिये का आविष्कार करने जैसा होगा। दरअसल अमेरिका चाहता है कि भारत हुआवेई का बहिष्कार करे। यह एक प्रमुख मुद्दा है, क्योंकि चीन संभवतः इस क्षेत्र में ज्यादा उन्नत है और उसकी तकनीक उस देश के लिए सबसे सस्ती है, जो दुनिया में सबसे सस्ती इंटरनेट सेवा देने का दावा करती है। लेकिन ट्रंप ने हुआवेई को अमेरिका के साथ व्यापार करने की अनुमति देने पर सहमति व्यक्त की, ऐसे में सवाल है कि इस मुद्दे पर अमेरिका कितना गंभीर है।

गोखले के मुताबिक, समय की कमी के कारण रूसी एस-400 मिसाइल के अधिग्रहण पर चर्चा नहीं हो सकी। इस मामले में भी भारतीय दृष्टिकोण को एस जयशंकर ने पोम्पियो के साथ अपनी बैठक में स्पष्ट कर दिया था। एस जयशंकर ने अपने समकक्ष को बता दिया था कि भारत अपने राष्ट्रीय हित में काम करेगा और एस-400 पर नई दिल्ली के फैसले में कोई बदलाव नहीं होगा।

ट्रंप द्वारा सार्वजनिक रूप से 29 अमेरिकी वस्तुओं पर भारत द्वारा लगाए गए शुल्क को वापस लेने से संबंधित ट्वीट करने पर व्यापार एक प्रमुख मुद्दा बनकर उभरा। दरअसल भारत ने एक साल देरी से शुल्क लगाया। उन्हें मूल रूप से 2018 की शुरुआत में भारतीय स्टील और एल्यूमीनियम निर्यात पर शुल्क लगाए जाने के खिलाफ बदले में लगाया जाना था। अमेरिका द्वारा तरजीही राष्ट्र का दर्जा वापस लेने के बाद भारत ने बदले में शुल्क बढ़ाने का फैसला लिया। लेकिन लगता नहीं कि ओसाका की बैठक में इस पर बहुत चर्चा हुई। उसका कारण यह है कि पिछले सितंबर में दोनों देशों के विदेश और रक्षा मंत्रियों के बीच 2+2 वार्ता हो चुकी है, जिसमें व्यापार से संबंधित ऐसी कोई चर्चा नहीं हुई। इसलिए यह आश्चर्य की बात नहीं है कि ओसाका में यह निर्णय लिया गया कि दोनों देशों के बीच वाणिज्य और उद्योग मंत्री और उनके अमेरिकी समकक्षों के स्तर पर चर्चा की जानी चाहिए। ओसाका में प्रधानमंत्री मोदी ने सावधानी पूर्वक भारत की विदेश नीति को संतुलित किया और तुर्की व जापान जैसे देशों के साथ भी द्विपक्षीय वार्ता की, तो चीन एवं रूस के साथ त्रिपक्षीय वार्ता की और ब्रिक्स के सहयोगी देशों के साथ शिखर सम्मेलन किया। जी-20 की मेजबानी करने वाले जापान के प्रधानमंत्री शिंजो अबे के साथ उनकी एक महत्वपूर्ण बैठक हुई और ट्रंप-मोदी की बैठक से ठीक पहले इन दोनों देशों की अमेरिका के साथ त्रिपक्षीय वार्ता भी हुई।

 -लेखक ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन के प्रतिष्ठित फेलो हैं।

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