फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Columns ›   Opinion ›   National Human Rights Commission a ray of hope for hopeless people in india

न्याय: मायूस लोगों के लिए उम्मीद की किरण है मानवाधिकार आयोग

Kanhaiya Tripathi कन्हैया त्रिपाठी
Updated Sat, 11 Mar 2023 06:11 AM IST
विज्ञापन
सार
मानवाधिकार आयोग ने तीन दशक के अपने सफर में स्वतः संज्ञान लेकर ऐसे लोगों के मानवाधिकारों की रक्षा की है, जिनकी कहीं सुनवाई नहीं होती।
loader
National Human Rights Commission a ray of hope for hopeless people in india
राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग - फोटो : सोशल मीडिया

विस्तार

विषम परिस्थितियों में न्याय मांगते लोग जब अपने पीछे किसी ऐसे स्तंभ का हाथ देखते हैं, जो उनके हित की लड़ाई में सहयोगी बन बैठा हो, तो उनके अंधेरे जीवन में एक रोशनी-सी आ जाती है, और वे उम्मीद से अपने होने का पुनः एहसास करने लगते हैं। भारत का राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग इस दिशा में वर्ष 1993 से ऐसी पहल करते हुए देश की जनता के साथ है, जिसके लिए आयोग की तारीफ की जानी चाहिए।



राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग की स्थापना 1993 में हुई और 24 जून, 1993 को ही आयोग ने जमाल अफगानी के मामले को स्वतः संज्ञान में लिया। उन दिनों आयोग के अध्यक्ष न्यायमूर्ति रंगनाथ मिश्रा थे। वह आयोग के प्रथम अध्यक्ष थे। वर्ष 1993 से अब तक मानवाधिकार आयोग ने 2,685 मामले स्वतः संज्ञान में लिए हैं, जो कि उदाहरणीय संख्या है। आयोग की ओर से साल 2023 में ही स्वतः संज्ञान मामलों की संख्या 25 है। इन सभी मामलों को संज्ञान में लाने में सामान्य जन, अखबार, रैपोर्टियर (दूत), टीवी और दूसरे महत्वपूर्ण लोग हैं। किंतु खबरें चला दी जाएं या प्रकाशित कर दी जाएं, या चिट्ठी लिख दी जाए या रिपोर्ट कर दिया जाए, उससे कोई प्रभाव नहीं पड़ता। आयोग ने उसे स्वीकार किया या आयोग ने स्वतः सूत्रों से उन विषयों को अपने दिमाग का हिस्सा बनाया, यह बहुत ही महत्वपूर्ण बात है।


मानवाधिकार आयोग की सक्रियता इससे प्रकट होती है। अब तक आयोग के सामने जितने भी मामले आए, उनकी संख्या 21 लाख 85 हजार 76 है, उनमें से 21 लाख 71 हजार 690 का निस्तारण किया गया है। आयोग निस्संदेह एक बड़ी भूमिका निभा रहा है। भले ही लोग सवाल करें कि आयोग करता क्या है! बाबासाहेब डॉ. भीमराव आंबेडकर ने संविधान के दायरे में रहकर इससे पोषित स्वायत्त संस्थाओं से यह आशा की थी कि वे अपने उत्तरदायित्वों का निर्वहन निष्ठापूर्वक करके सामाजिक न्याय की संकल्पना को मजबूत बनाएंगी।

मानवाधिकार आयोग ने निस्संदेह इस दिशा में आगे बढ़कर संविधान का सम्मान किया है और अपनी स्वतः संज्ञान जैसी पहल से सबके भीतर स्थान बनाया है। वर्तमान में इसके अध्यक्ष न्यायमूर्ति अरुण कुमार मिश्रा अपने दो माननीय सदस्य सहयोगियों डॉ. ज्ञानेश्वर मनोहर मुले और राजीव जैन के साथ नेतृत्व करते हुए आयोग की प्रतिष्ठा बढ़ा रहे हैं। स्वतः संज्ञान के मामले में आयोग की मंशा साफ झलकती है कि वह मानवीय संवेदनाओं के प्रति बहुत ही गहरे जुड़ा हुआ है।

अभी 2023 की शुरुआत ही है, और आयोग की 25 मामले स्वतः संज्ञान के दायरे में लाकर न्याय करने की पहल वास्तव में हमें उम्मेद से भर देती है। भारत की जनता ऐसी पहल को अपने कवच के रूप में देखे तो कोई अतिशयोक्तिपूर्ण बात नहीं होगी।

दुनिया में ऐसी स्वतः संज्ञान की एक लंबी परंपरा न्याय-तंत्र में है। हाल के समय में रोहिंग्या मामले हों या अफगानिस्तान में महिलाओं के ऊपर प्रतिबंधों का मामला हो, या फिर क्यों न यूक्रेन युद्ध के ही हताहत लोगों के मामले हों, संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार उच्चायुक्त कार्यालय ने कई बार स्वतः संज्ञान लिया है, और अपने विशेष दूत के माध्यम से ऐसी अनेक पहल करने की कोशिश की है। इस प्रकार के मामले यदि स्वतः संज्ञान में लेकर नहीं निपटाए जाएंगे, तो मानवता पीड़ा में ही रहने को मजबूर हो जाएगी। भारत में राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग द्वारा इसलिए इस दिशा में सकारात्मक और सक्रिय भूमिका निराश लोगों के जीवन में आशा का दीप प्रज्ज्वलित कर रही है।

केवल आयोग ही क्यों जागरूक हो, समाज की भी जिम्मेदारी है कि वह ऐसे मामलों को आयोग के संज्ञान में लाए, ताकि लोगों को न्याय मिल सके। जब दुनिया के अनेक देशों में स्थापित एनएचआरसी कुछ ज्यादा परिणाम नहीं दे पा रहे हैं, और उनके यहां मानवाधिकारों के हनन की निरंतरता बनी हुई है, तो ऐसे समय में, निस्संदेह भारत के 75 वर्षीय लोकतंत्र की महान यात्रा में एनएचआरसी के अब तक के स्वतः संज्ञान के मामले न्याय के प्रति आश्वस्त करते हैं।
- लेखक दिवंगत पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी के विशेष कार्य अधिकारी रह चुके हैं

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

Next Article

Followed