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नमो-नीतीश टकराव के मायने
उर्मिलेश
Updated Mon, 17 Jun 2013 10:08 PM IST
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राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन से जनता दल (यू) के अलगाव पर भाजपा और जद (यू) के शीर्ष नेता अपने-अपने पक्ष में चाहे जो दलीलें दें, इस बिखराव से दोनों की मुश्किलें बढ़ी हैं। घटनाक्रम से खुश हुई कांग्रेस ने समय गंवाए बगैर चुनावी-तैयारी के तहत रविवार को अपने केंद्रीय संगठन में फेरबदल का ऐलान किया। केंद्र सरकार की नाकामियों और कमजोरियों के खिलाफ उभरते जनाक्रोश का राष्ट्रीय स्तर पर जिस विपक्षी गठबंधन को सबसे ज्यादा फायदा मिलने की संभावना जताई जा रही हो, उसके बिखराव से कांग्रेस का खुश होना लाजिमी है।
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भाजपा चाहे जितना बहादुराना चेहरा दिखाए, सच यह है कि इस घटनाक्रम से उसे गहरा धक्का लगा है। जिस बिहार से उसके पूर्व अवतार-जनसंघ ने 1967 में गठबंधन (संयुक्त विधायक दल) के रास्ते अपनी राजनीतिक-अस्पृश्यता को खत्म करने में कामयाबी हासिल की थी, वहीं राजग में उसका सबसे बड़ा गठबंधन-सहयोगी उससे सिर्फ रूठा ही नहीं, राजनीतिक-शत्रु बनकर गठबंधन से बाहर गया है। एक समय राजग में तेईस दल थे, अब सिर्फ तीन बचे हैं।
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वर्ष 1967 में संयुक्त विधायक दल की बिहार और पंजाब आदि की सरकारों में जनसंघ की हिस्सेदारी की पटकथा दीनदयाल उपाध्याय ने लिखी। लेकिन अब गठबंधन के अपने सबसे बड़े सहयोगी के बाहर होने का जोखिम उठाते हुए भाजपा ने नरेंद्र मोदी के राजनीतिक आकर्षण पर ज्यादा भरोसा किया। बहुमत मिलने की स्थिति में प्रधानमंत्री पद के वह सबसे प्रबल दावेदार बनकर उभरे हैं, जिसकी घोषणा अभी पार्टी की तरफ से नहीं हुई है। जद (यू) के नेताओं का कहना था कि विधिवत घोषणा का होना अब एक औपचारिकता है। जद (यू) की जिद और भाजपा की चतुराई की चर्चा के विस्तार में जाने के बजाय अगर राजग के बिखराव के असल मुद्दों और उनके निहितार्थों पर नजर डालें, तो भावी राजनीतिक परिदृश्य के कुछ महत्वपूर्ण संकेत मिलते हैं।
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यह गठबंधन विचारधारा-आधारित गठबंधन नहीं था, यह राष्ट्रीय राजनीतिक मुद्दों से अनुप्रेरित भी नहीं था। वस्तुतः यह बिहार की राजनीति के एक खास पहलू पर आधारित गठबंधन था, जिसकी प्रासंगिकता कब की खत्म हो चुकी थी। अगर जद (यू) को सेक्यूलरवाद से अपनी कथित प्रतिबद्धता के चलते इस गठबंधन को तोड़ना था, तो प्रथमतः इसे बनना ही नहीं चाहिए था, क्योंकि बाबरी-ध्वंस (वर्ष 1992) के बाद यह बना। नीतीश को सेक्यूलरिज्म और समाजवाद से इतना गहरा लगाव था, तो वह 1995 की अपनी लाइन (समता-आईपीएफ तालमेल) को जारी रखते।
पर उन्होंने ऐसा नहीं किया। वर्ष 1996 में भाजपा के साथ हो लिए। रेडिकल वाम से रेडिकल राइट! ‘लालू-हटाओ’ की तात्कालिक जरूरत के हिसाब से गठबंधन बन भी गया, तो 2002 के गुजरात दंगे के बाद मोदी को सत्ता से न हटाए जाने के बाद इसे टूट जाना चाहिए था। आखिर रामविलास पासवान ने उस वक्त इसी आधार पर राजग से खुद को अलग कर लिया था। पर जद (यू) के धुरंधर समाजवादी (या सुविधावादी!) राजग-राज के मजे लेते रहे। बिहार में भाजपा के सहयोग से ही जद (यू) की विधानसभाई (2010) और संसदीय (2009) सीटों में इजाफा संभव हो सका। ऐसे में यह साझा मुनाफे, सुविधा और सहूलियत का गठबंधन था।
गठबंधन नरेंद्र मोदी के नाम पर टूटा जरूर, पर इसके पीछे सियासत के कई अंतःपुर थे। बिहार में भाजपा-संघ ने बीते आठ वर्षों की सत्ता के दौरान खूब जमकर राजनीतिक विस्तार किया। जद (यू) के साथ नौकरशाह, कॉरपोरेट और ठेकेदार नत्थी होते रहे, तो भाजपा-संघ के साथ विभिन्न वर्गों-वर्णों में नए-नए कार्यकर्ता-समर्थक जुड़ते रहे। नीतीश के कथित अति-पिछड़ा और महादलित आधार में भी संघ-संपोषित संगठनों ने पैठ बना ली।
नीतीश का सब्र कब तक बंधा रहता! पिछले डेढ़-दो साल से नरेंद्र मोदी के खिलाफ लगातार बोल-बोलकर नीतीश ने बिहार के लगभग 16.5 फीसदी मुस्लिम मतदाताओं में पुख्ता आधार तलाशने की कोशिश की, पर राजग में बने रहते हुए उन्हें ज्यादा सफलता नहीं मिल पा रही थी। उन्हें कुछ समय पहले तक यकीन था कि लालकृष्ण आडवाणी के जरिये भी वह मोदी-विरोध की लड़ाई जीत सकते हैं। मगर गोवा बैठक के बाद उनका यह विश्वास धाराशायी हो गया। फिर सियासत का खूबसूरत शब्द सेक्यूलरिज्म थाम लेने में हर्ज नहीं था और नीतीश ने वही किया।
भाजपा से अलगाव के ऐलान के साथ नीतीश और शरद ने दावा किया कि उन्होंने सिद्धांतों से समझौता न करने का फैसला किया। साथ में यह भी कहा कि गठबंधन अटल-आडवाणी के चलते हुआ था। यह कौन सा सिद्धांत है, जिसमें किसी पार्टी का दूसरी पार्टी के साथ समझौता विचारों व साझा कार्यक्रमों के बजाय सिर्फ व्यक्तियों के आधार पर होता है! आखिर जद (यू) कैसे निर्देशित करेगी कि भाजपा का अगला नेता कौन हो या भाजपा क्यों तय करेगी कि जद (यू) का मुख्यमंत्री पद का दावेदार कौन हो! चुनाव-परिणाम के बाद जद (यू) यदि किसी नाम पर वीटो लगाता, तो उसका कोई मतलब था।
जद (यू) के पास अब दो ही रास्ते हैं। वह क्षेत्रीय दलों के प्रस्तावित फेडरल फ्रंट के लिए कोशिश करे या फिर कांग्रेस के सहयोगी की भूमिका संभाले। राहुल गांधी के निकटस्थ नेताओं का एक समूह और कुछ असरदार कॉरपोरेट घराने नीतीश को कांग्रेस के नजदीक लाने की कोशिश में हैं, पर शरद इस पहल को लेकर थोड़े असहज बताए जाते हैं। फेडरल फ्रंट की खिचड़ी की हांडी अभी चूल्हे पर चढ़ी नहीं। नीतीश को दोनों विकल्पों के लिए और इंतजार करना होगा। अभी, शायद वह अपनी सरकार बचा लेंगे, लेकिन आगे का रास्ता उतना निरापद नहीं।