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अपने रास्ते पर अकेले
नंदिता दास
Updated Sat, 01 Jun 2013 09:12 PM IST
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कान फिल्म फेस्टिवल से लौटते ही मुझे यह खबर मिली। अचानक रितु दा के बारे में ऐसा सुनकर पहली दफा तो यकीन ही नहीं हुआ। मैं इस खबर से गहरे सदमे में हूं।
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मुझे समझ नहीं आ रहा कि अपने समय के एक बेहतरीन फिल्मकार के यूं अचानक और असमय चले जाने पर कैसी प्रतिक्रिया दूं। सिर्फ एक निर्देशक ही नहीं एक इंसान के तौर पर भी रितु दा के लिए मेरे मन में हमेशा आदर और प्रशंसा की भावना रही है।
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मेरे ख्याल से सार्वजनिक स्तर पर काम करने वाले लोगों में ऐसे कुछ ही गिने-चुने लोग होते हैं, जो अपने विश्वास और दृंढ़निश्चय के लिए अपना सब कुछ दांव पर लगा देते हैं।
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वह एक स्पष्टवादी और साहसी इंसान थे। सिर्फ उनकी फिल्मों ने ही नहीं उनके व्यक्तित्व ने भी कई लोगों के लिए मिसाल कायम की। समाज के अनदेखे मुद्दों को अपनी फिल्मों में एक अच्छी और साधारण भाषा में बेहद दिलचस्प और दमदार तरीके से दिखाने की कला ही रितु दा की फिल्मों को खास बनाती है।
एक निर्देशक की भूमिका हो या अभिनेता के तौर पर किसी किरदार को जीवंत करने की बात वह कभी भी लकीर के फकीर नहीं बने।
उनकी पहली फिल्म ‘हीरेर आंग्टी’ से लेकर ‘दहन’, ‘असुख’ ‘चोखेर बाली’, ‘बारीवाली’, ‘अंतरमहल’,‘नौकादुबी’, ‘अबोहोमन’, ‘चित्रांगदा’, ‘शुभमुहूर्त’ और ‘द लास्ट लियर’ तक इस बात की बानगी देखी जा सकती है। उनकी सभी फिल्मों की खासियत में संगीत का अहम योगदान होता था।
उनकी एक खास बात यह भी थी कि वह कलाकारों को भी काम करने की पूरी आजादी देते थे। मुख्यधारा के भारतीय सिनेमा में उन्हें बॉलीवुड को फिर से एक रचनात्मक गति देने के लिए हमेशा ही याद किया जाता रहेगा। रितु दा ने अपनी फिल्मों में हर एक कलाकार को उसकी जिंदगी के सबसे यादगार और बेहतरीन अभिनय की सौगात दी।
खुद भी एक अभिनेता के रूप में उन्होंने ‘चित्रांगदा’ फिल्म में ट्रांसजेंडर की अलग तरह की भूमिका निभाकर ऐसे लोगों की दुर्दशा को दिखाया, जिन्हें समाज में नजरअंदाज कर दिया जाता है।
उनके सिनेमा का संसार बहुत विशाल था और उनकी फिल्में दर्शकों के मन को गहराई तक छूती थीं। सिर्फ बंगाली ही नहीं गैरबंगाली दर्शक भी उनकी इस खूबी का दीवाना है।
उनके व्यक्तित्व का खास पहलू यह था कि वह हमेशा अलग से पहचाने जाते थे, याद किए जाते थे और उन पर बात की जाती थी। वह अपने रास्ते पर शायद अकेले थे।
इसकी वजह उनके काम करने की खास शैली थी। आज अनेक ऐसे फिल्मकार हैं जो अनूठा सोच सकते हैं, अनोखा प्रयोग कर सकते हैं, लेकिन दुनिया क्या कहेगी या फिर बाजार में क्या हश्र होगा, इसकी चिंता में लीक पर बने रहते हैं। यहीं आकर रितुपर्णो का रास्ता अलग हो जाता है।
उन्होंने वही बनाया जो सोचा, जो जीया। दुनिया कहती है तो कहती रहे। बाजार की फिक्र भी नहीं थी। हां, कई बार उनकी जबरदस्त आलोचनाएं भी हुईं, लेकिन न तो निजी जीवन में और न ही एक फिल्मकार और अभिनेता के रूप में उन्होंने इसकी परवाह की।
उनके बारे में कहने के लिए बहुत कुछ है। शूटिंग के दौरान या सामान्य मुलाकातों में उनके साथ के कई किस्से इस समय आंखों के आगे हैं। लेकिन मैं उन्हें इस तरह याद नहीं करना चाहती जैसे कि वह सच में चले गए हैं। उन्हें इस तरह याद करना गलत होगा। मुझे लगता है कि वह अपनी कला और व्यक्तित्व के जरिये हमारे बीच हमेशा मौजूद रहेंगे। लेकिन उनके जाने से न केवल बंगाली सिनेमा बल्कि राष्ट्रीय सिनेमा की भी बड़ी क्षति हुई है।