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नगा मसले का हल अटका खजूर में, बता रहे हैं प्रदीप कुमार
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नागालैंड पुलिस
- फोटो : Twitter
आजादी के थोड़ा पहले से चली आ रही, नगा समस्या के स्थायी समाधान के लिए वर्तमान जैसी अनुकूल स्थितियां पहले कभी नहीं रहीं। नगालैंड की पीपुल्स डेमोक्रेटिक अलायंस की सरकार में नेशनलिस्ट डेमोक्रेटिक प्रोग्रेसिव पार्टी के साथ भारतीय जनता पार्टी की भागीदारी है।
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राज्यपाल आर एन रवि केंद्र सरकार के इतने विश्वासपात्र हैं कि मौजूदा पद संभालने से पहले उन्होंने एनएससीएन (आई-एम) (नेशनल सोशलिस्ट कौंसिल ऑफ नगालैंड- इसाक-मुइवा) के साथ अरसे तक गोपनीय वार्ता की। इसी का नतीजा थी अगस्त 2015 के फ्रेमवर्क एग्रीमेंट, अर्थात समझौते के ढांचे की घोषणा। भारत सरकार की ओर से रवि ने ही इस पर दस्तखत किए थे। तब इसका खुलासा नहीं किया गया था, हालांकि इस पर नगा विद्रोहियों के बड़े नेता टी मुइवा ने सहमति प्रदान की थी। विवरण न देने का कारण यह बताया गया था कि अभी कुछ बारीकियां तय की जानी हैं।
पांच साल तक औपचारिक समझौते के इंतजार के बाद इस साल स्वतंत्रता दिवस पर दुखद सत्य सामने आया कि समझौता खजूर में अटक चुका है। इंटेलिजेंस ब्यूरो में अपने कार्यकाल के दिनों से पूर्वोत्तर, खासतौर से नगालैंड की गहरी समझ रखने वाले रवि ने अपने संदेश में राज्य सरकार पर वस्तुतः अविश्वास व्यक्त कर दिया। उन्होंने कहा, 'गहरी जड़ें जमा चुके निहित स्वार्थों ने शांति के लाभ जनता तक नहीं पहुंचने दिए, उन्हें खुद बटोर लिया, जनता के सपनों और आकांक्षाओं को चूर-चूर कर दिया। यह सब नहीं चलने वाला। नगालैंड उच्च कोटि की मानव और प्राकृतिक संपदा से युक्त है; दुर्भाग्य से आज हालत यह है कि इसका स्थान सबसे खराब काम करने वाले राज्यों में है, पूर्वोत्तर के अन्य राज्य भी बेहतर काम कर रहे।'
मुख्यमंत्री नीफिव रियो ने कठोर प्रतिक्रया में कहा, 'राज्य सरकार का कामकाज सबसे अच्छा भले न हो, विकास के सभी मोर्चों पर राज्य को आगे ले जाने का हम भरसक प्रयास कर रहे हैं। राज्य सरकार की शिरकत के साथ नगा राजनीतिक समस्या का शीघ्र और सम्मानजनक समाधान निकलना चाहिए। नगा जनता वास्तविक शांति के लिए दशकों से प्रतीक्षा करती रही है।
राज्य की चतुर्दिक प्रगति और विकास तभी संभव है। राज्य सरकार समाज के सभी वर्गों से बात कर रही है। इसी सरकार को 2018 और 2019 में अच्छे काम और कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए सम्मानित किया गया था।' भाजपा के मंत्रियों ने अलग से कोई प्रतिक्रिया नहीं जताई, जिसका यह अर्थ निकाला जा सकता है कि वे भी 'शीघ्र और सम्मानजनक' समझौते के हिमायती हैं।
लेकिन विस्फोट किया टी मुइवा ने। 'नगालिम जनवादी गणतंत्र' की 74 वीं वर्षगांठ पर उन्होंने कहा, 'पृथक नगा ध्वज और संविधान पर पुनर्विचार का कोई सवाल ही नहीं उठता। हम तो इसे मांग ही नहीं रहे, क्योंकि यह तो पहले से ही है। पृथक ध्वज और संविधान तो नगा प्रभुसत्ता के प्रतीक हैं। आप उन्हें मान्यता दें या न दें। 2015 की सहमति में "सह अस्तित्व और प्रभुसत्ता में भागीदारी" की बात कही गई थी।
समावेशी शांतिपूर्ण सहअस्तित्व का अर्थ यह है कि नगालिम में सभी नगा क्षेत्रों को शामिल किया जाएगा। नगा प्रभुसत्ता में भागीदारी करते हुए भारत के साथ रह सकते हैं, विलय नहीं कर सकते।' मुइवा ने दावा किया, कि 31 अक्तूबर, 2019 को बातचीत के दौरान रवि ने कहा था, 'हम आपके ध्वज और संविधान का आदर करते हैं। हम यह नहीं कह रहे कि भारत सरकार ने उन्हें अस्वीकृत कर दिया है। लेकिन जल्द से जल्द उन्हें अंतिम रूप दिया जाना चाहिए।' भारत सरकार ने मुइवा के दावों का न तो खंडन किया है और न अपनी तरफ से 2015 की सहमति का खुलासा ही। जो भी हो, मुइवा की मांगें खतरनाक हैं।
सिद्धांतः,भारत की संप्रभुता और विराट भौगोलिक अखंडता के दायरे में किसी भी उप-राष्ट्रीयता का समावेश करने की गुंजाइश हमेशा रही है; स्वयं नगालैंड पर लागू संविधान का अनुच्छेद 371 ए इसका उदाहरण है। लेकिन राष्ट्र-राज्य की संप्रभुता में मुइवा जो भागीदारी चाहते हैं, वह मुमकिन नहीं है। केंद्र सरकार से भारत के विखंडन की रूपरेखा तैयार करने में शिरकत की उम्मीद ही कैसे की जा सकती है?
उनके प्रस्तावित 'नगालिम' में असम, अरुणाचल और मणिपुर के नगा क्षेत्रों को शामिल करना होगा। वह म्यांमार के नगा क्षेत्रों को भी 'नगालिम' में लाना चाहते हैं। जरा-जरा सी बात पर जिस पूर्वोत्तर में लंबी नाकेबंदी कर आपूर्ति ठप कर दी जाती हो और विभिन्न कबीले सामान्य हालत में मरने-मारने पर उतारू रहते हों, वहां असम, अरुणाचल और मणिपुर से अपने अंग-भंग की सोचना भी कल्पना से परे होना चाहिए।
इस समय संपूर्ण पूर्वोत्तर बारूद के ढेर पर बैठा हुआ है। अरुणाचल पर चीन की गृद्ध दृष्टि है। पूर्वी लद्दाख से अरुणाचल और उत्तराखंड की सीमा तक चीन की फौजें हमलावर मुद्रा में खड़ी हुई हैं। वैसे भी नगालैंड भारत, म्यांमार और चीन के तिराहे पर स्थित है। लंबे समय तक असम, मणिपुर और नगालैंड के विद्रोही चीन में शरण और प्रशिक्षण लेते रहे।
मुइवा की चीन यात्रा और वहां चाउ एन लाइ से उनकी वार्ता हम भूले नहीं हैं। पूर्वी पाकिस्तान तरह-तरह के भारत विरोधी हथियारबंद विद्रोहियों का पनाहघर बन चुका था। बांग्लादेश की स्थापना के बाद स्थिति बदली। शेख हसीना के अगला चुनाव हार जाने की स्थिति में बांग्लादेश धार्मिक कट्टरपंथियों,आतंकियों और अलगाववादियों का फिर ठिकाना बन सकता है। इन विषम परिस्थितियों में मुइवा की मांगें मानकर पूर्वोत्तर को आग में नहीं झोंका जा सकता।
अगस्त, 2015 और अगस्त, 2020 के बीच अनेक परिवर्तन आ चुके हैं। कश्मीर के दलों की स्वायत्तता की मांग मानना दूर, संविधान के अनुच्छेद 370 का कवच भी अब नहीं है। धीरे-धीरे कश्मीरी नेताओं के सुर भी बदल रहे हैं। रैडक्लिफ लाइन से लेकर मैक मोहन लाइन तक जगह-जगह विस्फोटक स्थिति बनी हुई है।
मुइवा बहुत पढ़े-लिखे और अनुभवी आदमी हैं। वह यह समझते होंगे कि 1947 में प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने जो देने से मना कर दिया था, उसे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी कतई नहीं दे सकते। मुइवा और उनके साथी आखिर चाहते क्या हैं? उनका गेमप्लान क्या है?