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इस तरह आप भी अपने पूर्वजन्म के पुण्य का फल पा रहे हैं इस जन्म में

सुदर्शनसिंह चक्र Updated Mon, 06 Apr 2015 01:24 PM IST
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My father in law is eating stale food

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श्रावस्ती नगरी के नगर सेठ मिगार भोजन करने बैठे थे। उनकी सुशीला पुत्रवधू विशाखा हाथ में पंखा लेकर उन्हें हवा कर रही थी। उसी समय एक बौद्ध भिक्षु आकर उनके द्वार पर खड़ा हुआ और उसने भिक्षा के लिए आवाज लगाई। भिक्षु नगर के बाहर ठहरे बुद्ध के शिविर से आ रहे थे।
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नगर सेठ मिगार ने भिक्षु की पुकार पर ध्यान नहीं दिया। वह चुपचाप भोजन करते रहे। मगर विशाखा का उन पर ध्यान गया, लेकिन वह श्वसुर के पास से उठकर नहीं जा सकती थी। वह उन्हें पंखा झलती रही। भिक्षु ने जब दोबारा पुकारा, तब विशाखा बोली, आर्य! मेरे श्वसुर बासी अन्न खा रहे हैं, अतः आप अन्यत्र पधारें।

विशाखा के मुख से ऐसे शब्द सुनकर नगर सेठ के नेत्र लाल हो गए। उन्होंने तत्काल भोजन छोड़ दिया और हाथ धोकर पुत्रवधू से बोले, तूने मेरा अपमान किया है। मेरे घर से अभी निकल जा।

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विशाखा सिर झुकाए खड़ी रही। जब दोबारा नगर सेठ ने उसे घर से निकलने को कहा, तो उसने नम्रता के साथ कहा, मेरे विवाह के समय आपने मेरे पिता को वचन दिया था कि मेरी कोई भूल होने पर आप आठ सद्गृहस्थों से उसके विषय में निर्णय कराएंगे, और तब मुझे दंड देंगे।

नगर सेठ को तो क्रोध चढ़ा ही था, उन्होंने कहा, ऐसा ही सही! वह पुत्रवधू को निकाल देना चाहते थे। उन्होंने तत्क्षण आठ प्रतिष्ठित व्यक्तियों को बुलवाया। विशाखा ने सब लोगों के आ जाने पर कहा- मनुष्य को अपने पूर्वजन्म के पुण्यों के फल से ही संपत्ति मिलती है। मेरे श्वसुर को जो संपत्ति मिली है, वह भी उनके पहले के पुण्यों का फल है। इन्होंने अब नवीन पुण्य करना बंद कर दिया है, इसी से मैंने कहा कि वह बासी अन्न खा रहे हैं। मिगार यह सुनकर शर्मिंदा हो गए।

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