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कानून का डर पैदा करना जरूरी है

Sat, 09 Feb 2013 12:55 AM IST
प्रियंवदा सहाय
प्रियंवदा सहाय Updated Sat, 09 Feb 2013 12:55 AM IST
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must fear of law

दिल्ली में महिलाएं सुरक्षित नहीं है। यह बयान देकर दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित ने गृह मंत्रालय की भूमिका पर एक बार फिर सवाल खड़े कर दिए हैं। सुरक्षा के सवाल और जस्टिस वर्मा की रिपोर्ट पर चल रही बहस के कई पहलुओं को लेकर महिलाओं की सुरक्षा और उनकी जिम्मेदारी पर सामाजिक कार्यकर्ता रंजना कुमारी से प्रियंवदा सहाय की बातचीत-

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देश की राजधानी महिलाओं के लिए सुरक्षित नहीं है। यह बयान समाज में किस तरह से लिया जा रहा है?
दिल्ली की सत्ता पर डेढ़ दशक से काबिज शीला दीक्षित का यह बयान अफसोसनाक है। सिर्फ इस आधार पर, कि पुलिस महकमा उनकी सरकार के अधिकार क्षेत्र में नहीं आता, इस तरह का बयान महिलाओं का विश्वास हिलाने वाला है। देश की हर मां के मन में इस बयान से शंका और बढ़ गई है।
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दुष्कर्म पीड़िताओं को क्षतिपूर्ति देने के बारे में आपकी क्या राय है? क्या हर राज्य में क्षतिपूर्ति की राशि एक समान होनी चाहिए?
यह सरकारों की जिम्मेदारी है कि वे ऐसी घटनाओं पर अंकुश लगाएं। दुष्कर्म पीड़िता की थोड़ी-बहुत क्षतिपूर्ति तो यह होगी ही कि सामाजिक दबाव से निपटने के लिए उसे आर्थिक सहायता प्रदान की जाए। यह जरूरी भी है कि पीड़िता के पुनर्वास के लिए सरकार अलग से व्यवस्था करे। लेकिन अक्सर राज्य के मामले का हवाला देकर केंद्र इससे पल्ला झाड़ लेता है। जबकि होना यह चाहिए कि खर्च में केंद्र और राज्य सरकारें बराबर की भागीदारी निभाएं। इस बाबत निर्भय सहायता स्कीम तैयार करने का प्रस्ताव योजना आयोग और महिला एवं बाल विकास मंत्रालय के समक्ष रखा गया है।
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दंपति के बीच पत्नी की मर्जी के खिलाफ शारीरिक संबंध बनाने को दुष्कर्म का दर्जा देना कहां तक उचित है? क्या भविष्य में इस अधिकार का दुरुपयोग नहीं हो सकता?

इस पर गंभीरता से विचार-विमर्श करने की जरूरत है। लेकिन अगर आपसी सहमति से दंपति में शारीरिक संबंध नहीं बनता, तो इसे दुष्कर्म की ही संज्ञा दी जाएगी। 104 देशों की महिलाओं को यह अधिकार दिया जा चुका है, तो फिर अपने यहां ऐसा क्यों नहीं हो सकता? इस अधिकार के दुरुपयोग होने की आशंका इसलिए कम है, क्योंकि भारतीय समाज में कोई महिला झूठा इल्जाम लगाकर अपनी शादीशुदा जिंदगी को बर्बाद नहीं करना चाहेगी। दरअसल ऐसी शिकायत दर्ज कराने वाली महिला को साबित करना होगा कि उसके पति ने ऐसी हरकत की है।

तेजाब हमले की शिकार महिलाओं के लिए क्षतिपूर्ति और दंड के प्रावधानों पर आपकी क्या राय है?
इस मामले में भी पूरी जिम्मेदारी राज्यों की है, जबकि वे अभी तक इन मुद्दों को महत्व नहीं दे रही हैं। लेकिन केंद्र की ओर से तेजाब की उपलब्धता और सजा को लेकर राज्यों पर दबाव डालना चाहिए। तेजाब की उपलब्धता दुनिया के तमाम देशों में सार्वजनिक तौर पर नहीं के बराबर है। लेकिन भारत में यह धड़ल्ले से बिक रहा है। ऐसे मामलों पर लगाम लगाने के लिए कानून का डर बनाना जरूरी है।


जूवेनाइल ऐक्ट में किशोर के उम्र में बदलाव को लेकर बड़ी बहस जारी है। कम उम्र में जघन्य अपराध करने वालों के लिए सजा के क्या मानक होने चाहिए?
दुष्कर्म करने वाला नाबालिग कभी बच्चा नहीं हो सकता। इसलिए 16 से 18 साल का बच्चा अगर जघन्य अपराध करता है, तो कानून में संशोधन कर उसकी सजा के लिए अलग प्रावधान करना चाहिए। हालांकि मामले का दूसरा पहलू यह है कि इसी देश में अनेक बाल अपराधी बनाए जाते हैं। प्रत्येक वर्ष लगभग एक लाख बच्चे खो जाते हैं। माना जाता है कि वे कहीं न कहीं किसी अपराध में लिप्त हैं। इसलिए बच्चों के बचाव के लिए 18 वर्ष की उम्र उचित है।

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