मुलायम का हिंदी प्रेम और सत्ता का कुचक्र

उमेश चतुर्वेदी Updated Fri, 22 Nov 2013 04:10 AM IST
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Mulayam's hindi affection and intrigue of power

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डॉक्टर राममनोहर लोहिया से मुलायम सिंह यादव भले ही नहीं मिले, लेकिन लोहिया के हिंदी प्रेम को अब भी वह समाजवादी थाती की तरह संभाले हुए हैं। इटावा में हिंदी को लेकर 17 नवंबर को दिया बयान उनके हिंदी प्रेम को ही दर्शाता है।
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उन्होंने कहा कि संसद में अंग्रेजी पर पाबंदी लगा देनी चाहिए। मुलायम यहीं नहीं रुके, उन्होंने यहां तक कह दिया कि जिन देशों ने अपनी मातृभाषा को सरकारी कामकाज की भाषा बनाया, उन्होंने ज्यादा तरक्की की है।
यह बात और है कि उनके इस बयान ने उनके ही साथियों को नाराज कर दिया है। सबसे बड़ी बात यह है कि उनके बयान का विरोध उस भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी और उसके नेता गुरुदास दासगुप्ता ने किया है, जिसके करीब मुलायम राष्ट्रीय राजनीति में ताकत और प्रासंगिकता हासिल करने जाते रहे हैं।
मुलायम सिंह का हिंदी प्रेम कोई पहली बार जागृत नहीं हुआ है। यह बात और है कि उनका यह प्रेम इस बार काफी देर से मुखर हुआ है। 1990 में जब वह पहली बार उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बने थे, तो उन्होंने राज्यों के बीच हिंदी में खतो-किताबत को बढ़ावा देने की कोशिश की थी।

उनका तर्क था कि राज्यों के बीच हिंदी और भारतीय भाषाओं में पत्राचार होना चाहिए। यों तो मुलायम खुद भी हिंदी प्रेमी रहे हैं, लेकिन इसका सुझाव उन्हें वरिष्ठ पत्रकार अच्युतानंद मिश्र ने दिया था। राज्यों के बीच सरकारी स्तर पर भारतीय भाषाओं को लेकर यह बेहतर प्रयास था।

लेकिन हिंदी के विरोध का आंदोलन छेड़ने वाले तमिलनाडु के तत्कालीन मुख्यमंत्री एम करुणानिधि ने इस कोशिश को पलीता लगा दिया। उन्होंने उत्तर प्रदेश को सिर्फ तमिल में जवाब भेजा। जबकि मुलायम की योजना थी कि जिन राज्यों में पत्र भेजा जाएगा, वह हिंदी के साथ ही उसकी अपनी राजभाषा में भी होगा।

मुलायम की ही देन है कि उत्तर प्रदेश की पीसीएस की परीक्षाओं में अंग्रेजी की अनिवार्यता खत्म की गई। मुलायम सिंह का हिंदी प्रेम रक्षा मंत्री बनने के बाद भी नजर आया, जब उन्होंने मंत्रालय में हिंदी में कामकाज को बढ़ावा दिया।

यों तो अंग्रेजी पहले से ही इस देश में सत्ता और नीतिगत विमर्श की भाषा रही है। उदारीकरण के दौर में अंग्रेजी का महारानी वाला यह रुतबा और बढ़ा ही है। बीस साल पहले तक तो अंग्रेजी को अपने सामाजिक और राजनीतिक विकास में बाधक मानने वाले लोग मिलते भी थे। लेकिन 1991 में आर्थिक उदारीकरण ने ऐसी पीढ़ी का विकास किया है, जिसे विकास, समृद्धि और विमर्श की चाबी सिर्फ और सिर्फ अंग्रेजी में ही नजर आती है। उन्हें हिंदी पिछड़ेपन की भाषा भी नजर आने लगी है।

गांधी और तमाम शिक्षाशास्त्रियों की सिफारिश पर कम से कम सरकारी स्कूलों में मातृभाषा में पढ़ाई को ही मानसिक विकास का जरिया मानते हुए हिंदी और देसी भाषाओं को माध्यम के तौर पर स्वीकार किया गया था। लेकिन इसका विरोध सबसे पहले ओडिशा ने किया और उसने तीसरी कक्षा से अंग्रेजी की पढ़ाई की शुरुआत की।

अपना लाल किला ढहने से पहले सर्वहारा और समाज के निचले पायदान की बात करने वाले वामपंथी दलों के शासन ने भी पश्चिम बंगाल में तीसरी कक्षा से अंग्रेजी पढ़ाई की शुरुआत कर दी थी। कहना न होगा कि आज उत्तर प्रदेश की सत्ता जिस अखिलेश यादव के हाथ में है, वह भी विकास की मौजूदा अवधारणा में ही भरोसा करते हैं। क्या मुलायम सिंह यादव के विचारों से वे सहमत होंगे?

हिंदी के लिए तमिलनाडु छोड़कर दुविधा दूसरी जगह नहीं रही। लोहिया ने इसीलिए साठ के दशक में अंग्रेजी हटाओ आंदोलन शुरू किया। जिसे तब की उत्तर भारतीय नौजवान पीढ़ी ने हाथोंहाथ लिया। आज मुलायम सिंह जिस भाषा को बोल रहे हैं, वह भी उसी का विस्तार है। लेकिन दुर्भाग्यवश सत्ता के कुचक्र में हिंदी को वह स्थान नहीं मिल पाया, जिसकी कल्पना स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान की गई थी।

लोहिया ने गैरकांग्रेसवाद की अवधारणा पेश की और उसे साकार करने के लिए ताजिंदगी संघर्षरत रहे। लेकिन मुलायम ने कांग्रेस का दामन थामने में भी देर नहीं लगाई। शायद यही वजह है कि हिंदी के समर्थन में दिए उनके बयान में संजीदगी की तलाश न के बराबर हो रही है।
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