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एक कविता के 50 बरस
सुदीप ठाकुर
Updated Wed, 10 Sep 2014 03:38 PM IST
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गजानन माधव मुक्तिबोध यदि जीवित होते, तो इस वर्ष 13 नवंबर को 96 वर्ष के हो गए होते। अगले वर्ष उनकी 50वीं पुण्यतिथि होगी और इसी नवंबर में उनकी कालजयी कविता 'अंधेरे में' ने भी पचास वर्ष पूरे किए हैं!
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आखिर एक कविता के लिए पचास वर्ष क्या मायने रखते हैं? मुक्तिबोध की मौत के तीन महीने बाद नवंबर, 1964 की 'कल्पना' में यह कविता पहली बार प्रकाशित हुई। यह कविता उन्होंने छत्तीसगढ़ के राजनांदगांव में रहते लिखी, जहां उन्हें दिग्विजय कॉलेज में बतौर प्राध्यापक की नौकरी के लिए आमंत्रित किया गया था।
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कॉलेज तो 1957 में शुरू हो गया था, मगर मुक्तिबोध यहां जुलाई 1958 में आए। कॉलेज के प्राचार्य थे पंडित किशोरीलाल शुक्ल जो अविभाजित मध्य प्रदेश के वित्त मंत्री भी रहे। शुक्ल ने साक्षात्कार में मुक्तिबोध के समक्ष शर्त रखी, 'आप अपने मार्क्सवादी सिद्धांत के प्रति आस्था रख सकते हैं, लेकिन विद्यार्थियों पर आप अपनी वामपंथी विचारधारा थोपने का आग्रह नहीं रखेंगे।' शुक्ल के साथ मुक्तिबोध का एक अजीब तनाव वाला रिश्ता रहा। उन्होंने 'विपात्र' नाम से डायरीनुमा उपन्यास लिखा था, जिसकी पृष्ठभूमि यही दिग्विजय कॉलेज है।
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दो विशाल तालाब रानीसागर और बूढ़ासागर के बीच बने इस महल के जिस हिस्से में मुक्तिबोध रहते थे, वहां अब स्मारक बना दिया गया है। मगर इसकी चक्करदार सीढ़ियां और झरोखेनुमा खिड़कियां मुक्तिबोध के रचनाकर्म की साक्षी हैं ...जिंदगी के/ कमरों में अंधेरे/ लगाता है चक्कर कोई/ एक लगातार; आवाज पैरों की देती है सुनाई/ बार-बार/ बार-बार...।
वरिष्ठ कवि अशोक वाजपेयी उन चंद लोगों में से हैं, जिन्हें 'अंधेर में' का पहला पाठ सुनने का अवसर मिला। वह बताते हैं, '1959 की सर्दियों के दिन थे, जब सागर विश्वविद्यालय के एक कार्यक्रम में मुक्तिबोध को आमंत्रित किया गया था। मैं खुद, रमेश दुबे, आग्नेय, प्रबोध कुमार और राजा दुबे जैसे चार-पांच युवाओं के साथ मुक्तिबोध बैठे हुए थे। उन्होंने 'अंधेरे में' सुनाना शुरू किया, हमें तब बहुत कुछ समझ नहीं आया।
आधी कविता सुनाने के बाद मुक्तिबोध ने कहा, 'पार्टनर, जम नहीं रहा हो तो कुछ और बात करते हैं...।' मगर हमने उनसे पूरी कविता सुनी।'
'अंधेरे में' इतनी महत्वपूर्ण कविता क्यों है? वाजपेयी कहते हैं, 'मुझे लगता है कि शायद ही इतिहास में अंधेरे की शक्तियां इतनी प्रबल रही हों, जितनी उजाले की शक्तियां प्रबल थीं...। यह कविता इमरजेंसी लागू होने के दस-बारह वर्ष पहले लिखी गई थी। इसमें इतिहास में जो घटने जा रहा है, उसका पूर्वाभास मिलता है।'
मुक्तिबोध जब दिग्विजय कॉलेज आए थे, तो वहां पहले से हिंदी के एक और मूर्धन्य पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी मौजूद थे। अपने निबंधों के जरिये खास जगह बनाने वाले बख्शी जी का लेखन सीधा-सरल तो मुक्तिबोध का दुरूह। लेकिन दोनों बीड़ी पीते थे! उन्हीं दिनों एक अंग्रेजी का युवा अध्यापक भी कॉलेज में आया, नाम था कनक तिवारी। अब तिहत्तर बरस के हो रहे तिवारी बताते हैं, 'कई बार ऐसा होता था कि स्टाफ रूम में हम तीनों होते थे। वे दोनों दो अलग कोनों में बैठे बीड़ी पी रहे होते और मैं बीच में। मैं 23 वर्ष का था, मुझसे 23 वर्ष बड़े मुक्तिबोध और उनसे 23 बरस बड़े बख्शी जी!
मुक्तिबोध और बख्शी जी एक दूसरे का सम्मान तो करते थे, मगर साहित्य पर उनमें कोई चर्चा नहीं होती थी। उन दोनों को मैं रानीसागर के किनारे से होते हुए एक बुढ़िया की गुमटी ले जाता था, जहां हम चाय पीते थे। अक्सर होता यह कि पैसे मैं ही दे देता था।' कनक तिवारी भी उन लोगों में से रहे, जिन्हें किसी ढलती हुई शाम मुक्तिबोध ने रानीसागर की सीढ़ियों पर बैठकर 'अंधेरे में' का पाठ सुनाया था।
एक कवि के प्रति कृतज्ञता प्रकट करने का अच्छा तरीका क्या हो सकता है, यह राजनांदगांव के मुक्तिबोध स्मारक में देखा जा सकता है। यहां मुक्तिबोध के साथ ही बख्शी जी और एक अन्य साहित्यकार बल्देव प्रसाद मिश्र की स्मृतियों को संजोया गया है। यहां इन तीनों रचनाकारों की मूल प्रतियां, उनके तैल चित्रों और महत्वपूर्ण दस्तावेजों को संभालकर रखा गया है।
इसकी जिम्मेदारी संभाल रहे चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी जीतेंद्र झा बहुत उत्साह से चक्करदार सीढ़ियों से होकर ऊपर ले जाते हैं। फिर वह छत पर ले जाते हैं, जहां से कभी सवा सौ बरस पुरानी बंगाल नागपुर कॉटन मिल्स की चिमनी नजर आती थी, जिससे उठते धुएं को मुक्तिबोध ने अपनी कविता में भी साया किया था। वह मिल 1990 के बाद देश में चली आर्थिक उदारीकरण की बयार में ढह चुकी है, जहां अब एक पोल्ट्री फार्म बन गया है। यह उस युग का प्रस्थान बिंदु है, जहां से 'अंधेरे में' कविता शुरू होती है...।
-विस्तार से-blog.amarujala.com