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काफी कुछ है दांव पर बिहार में
नीरजा चौधरी
Updated Mon, 13 Jul 2015 08:29 PM IST
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बिहार विधानपरिषद की 24 में से 12 सीटों पर भाजपा की जीत से आप इसका अंदाजा नहीं लगा सकते कि आने वाले विधानसभा चुनाव में वहां के मतदाता किस तरह से वोट करेंगे, क्योंकि मतदाताओं के लिए विधान परिषद का चुनाव बहुत मायने नहीं रखता। लेकिन यह नतीजा भाजपा के लिए मनोबल बढ़ाने वाला और नीतीश-लालू-कांग्रेस के गठबंधन के लिए एक बड़ा झटका है, जिसे मात्र दस सीटें मिलीं। इन नतीजों से लालू यादव की निराशा साफ झलक रही थी।
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सोनिया गांधी की इफ्तार पार्टी में शामिल न होने का लालू यादव का फैसला कांग्रेस के रवैये के प्रति नाराजगी जताने से अधिक और कुछ नहीं हो सकता। वह कांग्रेस के सबसे विश्वसनीय सहयोगी रहे हैं, और वैसे समय में उन्होंने सोनिया गांधी का बचाव किया था, जब विदेशी मूल के मुद्दे पर कोई दूसरी पार्टी उनके समर्थन में आगे नहीं आई थी।
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कांग्रेस ने, जो अब राहुल गांधी के दिशा-निर्देश पर चल रही है, खुलकर नीतीश कुमार के प्रति अपनी पसंदगी जाहिर की है। इसी बात ने लालू यादव को अचानक जद (यू) के साथ गठबंधन करने के लिए मजबूर किया। राजनीति के उस्ताद रणनीतिकार होने के नाते लालू जानते थे कि अगर वह इस गठजोड़ में शामिल नहीं होते, तो अकेले पड़ जाएंगे, क्योंकि मुस्लिम मतदाताओं के जद (यू) और कांग्रेस गठजोड़ के साथ चले जाने की संभावना थी। ऐसे में यादव मतदाता भी उनके और भाजपा के बीच बंट जाते। अनेक यादवों ने पिछले लोकसभा चुनाव में नरेंद्र मोदी के पक्ष में मतदान किया था। जाहिर है, इफ्तार पार्टी में शामिल न होने का फैसला कर लालू ने कांग्रेस को सिर्फ यही संदेश दिया है कि मैं आपसे खुश नहीं हूं। पर वह इस महागठजोड़ से अलग नहीं होंगे। फिर भी इफ्तार पार्टी में उनकी गैरमौजूदगी लालू-नीतीश-कांग्रेस-राकांपा गठजोड़ की मुश्किलों को रेखांकित करेगी ही।
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भाजपा दरअसल नीतीश कुमार और लालू यादव के बीच तनाव पैदा करने और उसका फायदा उठाने की कोशिश करेगी। उसने इसे पहले से ही उजागर करना शुरू कर दिया है। जैसे, इस महागठजोड़ के प्रचार के लिए बनाई गई होर्डिंग पर केवल नीतीश कुमार की तस्वीर है, जिस पर नारा लिखा है-आगे बढ़ता रहे बिहार, फिर एक बार नीतीश सरकार। इस होर्डिंग पर लालू की तस्वीर नहीं है। ऐसा नीतीश के दस वर्षों के सुशासन को भुनाने के लिए किया गया है। इसमें लालू की तस्वीर उस 'जंगलराज' की याद दिलाती, जिससे नीतीश कुमार ने लड़ाई की और जिसे सत्ता से बेदखल किया।
गठबंधन सहयोगी होने और बुरी से बुरी स्थिति में भी बीस फीसदी वोट होने के बावजूद चुनाव अभियान के दौरान नीतीश कुमार को जिस तरह लालू यादव को कम महत्व देना होगा, ठीक उसी तरह आमने-सामने की लड़ाई होने के बावजूद भाजपा के लिए नीतीश सरकार पर हमला करना मुश्किल होगा। इसका कारण यह है कि भाजपा आठ वर्षों तक इस सरकार का हिस्सा थी। इसलिए उसे यह बताना होगा कि नीतीश का महागठबंधन पुराने दुश्मनों का अवसरवादी गठजोड़ है। यह जानकर कि अल्पसंख्यक मतदाता महागठबंधन के साथ जा रहे हैं, भाजपा धार्मिक आधार पर मतदाताओं को ध्रुवीकृत कर सकती है।
बिहार के इस चुनाव में किसी एक ठोस मुद्दे के साथ सामने आना मुश्किल है। ऐसे में सभी पार्टियां जाति एवं समुदायों का समर्थन हासिल करने की कोशिश करेंगी। भाजपा के लिए बिहार का चुनाव पहले से काफी महत्वपूर्ण हो गया है। खासकर जब से मध्य प्रदेश और राजस्थान के मुख्यमंत्री क्रमशः व्यापम घोटाले और ललित मोदी के कारण मुश्किलों का सामना कर रहे हैं। विपक्षी दलों ने दोनों के इस्तीफे की मांग की है। ऐसे में बिहार चुनाव में जीत भाजपा को वह ताकत प्रदान करेगी, जिसकी उसे तलाश है।
दोनों पक्षों का गठबंधन लगभग बराबर है। भाजपा के नेतृत्व वाले गठबंधन में रामविलास पासवान की पार्टी है, जिसका पासवान समुदाय के बीच जनाधार है, और जिसका तीन से चार फीसदी वोट है। इसमें उपेंद्र कुशवाहा की पार्टी भी है, जिसका कुशवाहा समुदाय में जनाधार है और करीब चार से पांच फीसदी वोट है। इसके अलावा पूर्व मुख्यमंत्री जीतनराम मांझी का समूह है, जिसका जनाधार मुसहर समुदाय के बीच है। कई राजनीतिक पर्यवेक्षकों का मानना है कि चूंकि पासवान और मांझी भाजपा के साथ हैं, इसलिए ज्यादातर दलित वोट भाजपा के पाले में जाएंगे। इसके अलावा भाजपा को अगड़ी जातियों का उदार समर्थन हासिल है। यह लालू-नीतीश गठजोड़ के यादवों, मुस्लिमों और कुर्मियों के समर्थन से अलग होगा। यदि यादवों को लालू की जीत का जरा भी भान होगा, तो वे लालू को ही वोट देंगे, और उनमें से अनेक नीतीश कुमार के प्रति पूर्वाग्रह के बावजूद, सत्ता न मिलने की तुलना में आधी सत्ता को प्राथमिकता देते हैं।
इस चुनाव में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका आर्थिक दृष्टि से पिछड़ी जातियों की होगी, जिनका कुल अनुमानित वोट 24 फीसदी तक है। उनमें से आधे ने लोकसभा चुनाव में भाजपा के पक्ष में और उससे पहले भाजपा-नीतीश गठजोड़ के पक्ष में मतदान किया था। मुख्यमंत्री के रूप में नीतीश कुमार ने उन्हें राजनीतिक और आर्थिक तौर पर सशक्त बनाने के लिए कई कदम उठाए। लेकिन क्या वे या उनका बड़ा धड़ा अब भी भाजपा के साथ जाएगा या उनमें से कई नीतीश कुमार के साथ होंगे? बिहार चुनाव का नतीजा निश्चित रूप से इसी पर निर्भर करेगा कि वे क्या करते हैं, जबकि अन्य बड़े समुदायों ने कमोबेश अपना मन बना लिया है।
लालू-नीतीश गठजोड़ के साथ सकारात्मक पक्ष यह है कि सत्ता में आने के बाद उनका मुख्यमंत्री कौन होगा, यह स्पष्ट है, जबकि भाजपा के साथ ऐसा नहीं है। हालांकि बिहार के चुनाव में काफी कुछ इस बात पर निर्भर करेगा कि पहले एक दूसरे के धुर विरोधी रहे नीतीश और लालू की दोस्ती कितनी सच्ची रहती है।