फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Columns ›   Opinion ›   MSP for your Vote

फसल के दाम वोटों के नाम

Sun, 08 Jul 2018 05:52 PM IST
शंकर अय्यर
शंकर अय्यर Updated Sun, 08 Jul 2018 05:52 PM IST
विज्ञापन
MSP for your Vote
किसान

बिस्मार्क ने कहा था, राजनीति संभावनाओं की कला है। विस्तार और समेकन की अपनी निरंतर खोज में नरेंद्र मोदी की भाजपा ने आयरन चांसलर की राजनीति से संबंधित कहावत को चुनावी लाभ हासिल करने की कला के रूप में बदल दिया है। पिछले हफ्ते मोदी सरकार ने छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश और राजस्थान के लिए भाजपा का अभियान छेड़ दिया और लोकसभा चुनाव 2019 का बिगुल फूंक दिया। इस बात की काफी चर्चा रही है कि गुजरात और कर्नाटक चुनाव के बाद भाजपा ग्रामीण क्षेत्र के संकट पर रक्षात्मक है और उत्तर प्रदेश में बुआ-भतीजा की जुगलबंदी चल रही है। हाल ही में सरकार द्वारा 14 फसलों के न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) में बढ़ोतरी ने पार्टी के वोट प्रबंधकों, पन्ना प्रमुखों आदि के लिए प्रचार का चारा डाल दिया है। यह पार्टी को उन परेशानियों और अलगाव को खत्म करने के लिए एक अवसर देता है।


loader

आप तर्क दे सकते हैं कि यूपीए ने 2008 में एमएसपी में बढ़ोतरी की थी। लेकिन एमएसपी की बढ़ोतरी की पैकेजिंग एवं मार्केटिंग में अंतर है। यह चुनावी लाभांश के लिए राजनीतिक उड़ान मार्ग के साथ हेलीकॉप्टर अर्थशास्त्र है। राजनीतिक भूगोल पर फसल-दर-फसल एमएसपी वृद्धि के खात्मे की सराहना के लिए उन राज्यों पर नजर डालें, जहां भाजपा ने अच्छा प्रदर्शन नहीं किया और जहां उसे चुनौतियों का सामना करना पड़ा।

सबसे पहले धान की राजनीतिक अर्थव्यवस्था को लेते हैं। रकबा और उत्पादन के हिसाब से धान भारत की सबसे प्रमुख फसल है, जिसकी खेती 4.4 करोड़ हेक्टेयर में होती है और 11.1 करोड़ टन उत्पादन होता है। उत्पादन सूची के शीर्ष बारह बड़े राज्यों-पश्चिम बंगाल, उत्तर प्रदेश, पंजाब, तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश, बिहार, छत्तीसगढ़, ओडिशा, असम, हरियाणा, मध्य प्रदेश और तेलंगाना में 86 फीसदी से ज्यादा उत्पादन होता है। इस सूची में दो चुनावी राज्य भी शामिल हैं और 336 या 62 फीसदी लोकसभा सीट हैं। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि इन बारह में से आठ राज्यों में भाजपा ने इकाई अंक में सीटें जीती थीं। उत्तर प्रदेश और बिहार में, जहां भाजपा ने 2014 में अच्छा प्रदर्शन किया था, वहां उसे उग्र चुनौतियों और मध्य प्रदेश व छत्तीसगढ़ में पंद्रह वर्ष की सत्ता-विरोधी रुझान का सामना करना पड़ रहा है। इसके अलावा इन बारह राज्यों के 115 पिछड़े जिलों में 73 अब 'महत्वाकांक्षी जिलों' के रूप में जाने जाते हैं।

ज्वार, बाजरा और रागी का चुनावी अर्थशास्त्र क्या है? मोटे अनाज, जिन्हें अब पोषक अनाज कहा जाता है, सिंचाई की कमी वाले क्षेत्रों में उगाए जाते हैं और मनुष्यों के पोषण के साथ पशुओं के लिए चारा प्रदान करते हैं। महाराष्ट्र, जहां भाजपा संभावित कांग्रेस और राकांपा गठबंधन और मौसमी मित्र शिवसेना के गुस्से का सामना कर रही है, ज्वार का सबसे बड़ा उत्पादक राज्य है। जिन अन्य राज्यों में ऐसी ही स्थिति है, उनमें चुनावी राज्य मध्य प्रदेश, राजस्थान और राजनीतिक रूप से उर्वर तमिलनाडु शामिल हैं।

बाजरा को मोती बाजरा भी कहा जाता है, जो पोषण के लिए महत्वपूर्ण है और ज्यादातर सूखे मौसम वाले इलाकों में, जहां वार्षिक वर्षा 100 सेंटीमीटर से कम होती है, उगाया जाता है।  उत्पादन सूची के पांच शीर्ष राज्य हैं-राजस्थान, उत्तर प्रदेश, गुजरात, हरियाणा और मध्य प्रदेश। ज्वार और बाजरा की तरह रागी कम वर्षा वाले क्षेत्रों की फसल है और इसका सबसे ज्यादा उत्पादन कर्नाटक में होता है, जहां भाजपा सत्ता पाने में विफल रही। मक्का लागत से कई गुना ज्यादा लाभ देने वाली फसल है-किसान धान की तुलना में इसकी खेती में 90 फीसदी पानी और 70 फीसदी ऊर्जा की बचत कर सकते हैं। इसके पांच शीर्ष उत्पादकों में कर्नाटक, चुनावी राज्य मध्य प्रदेश, चुनौतीपूर्ण राज्य बिहार और विपक्ष शासित तमिलनाडु और तेलंगाना शामिल हैं।
 
वर्ष 2014 से भाजपा ने आर्थिक उपायों को अपने राजनीतिक एवं चुनावी एजेंडे से जोड़ा है और छह से 21 राज्यों में अपनी सत्ता का विस्तार किया है। गुजरात चुनाव से पहले जीएसटी दरों का पुनर्निर्धारण और उत्तर प्रदेश व कर्नाटक में कर्जमाफी की घोषणा इसके उदाहरण हैं। नीति के क्रियान्वयन का समय-पहली बार 2014 में एमएसपी को 1.5 गुना करने का वायदा किया था, जिसे 2018 में पूरा किया गया और चीजों को चतुराई पूर्वक ढालना महत्वपूर्ण है। राजकोषीय सुधार पर भाजपा का दोहरा रुख है-राज्यों ने मिलकर जब 1.6 लाख करोड़ का कर्ज माफ कर दिया, तो केंद्र ने उसमें हस्तक्षेप नहीं किया।

चुनावी लोकप्रियता की लागत चिंता की बात है। यह सही है कि उच्च एमएसपी, यदि छोटे किसानों तक पहुंचाया जाता है, तो ग्रामीण उपभोग के साथ खाद्य सुरक्षा और भारत की कहानी को आगे बढ़ाने में मदद मिलेगी। हालांकि इससे राष्ट्रीय खजाने पर अनुमानित 35 हजार करोड़ रुपये का बोझ पड़ेगा। उच्च उधार और बड़े ऋण की कीमत ब्याज दर और मुद्रा के मूल्य पर असर डालेगी।

कृषि संकट को लेकर विवाद नहीं है। इसी तरह सिर्फ उच्च एमएसपी इस संकट को खत्म नहीं करेगी। कृषि का पुनरुद्धार इसकी मुक्ति की मांग करता है, एक सक्षम पारिस्थितिकी तंत्र बनाने के लिए राज्यों द्वारा प्रौद्योगिकी और सुधारों को शामिल करना भी जरूरी है। सिर्फ विचार पैदा करना पर्याप्त नहीं है। कृषि के लिए राष्ट्रीय बाजार और निवेश को बढ़ावा देने के लिए समूह/सामूहिक/अनुबंध खेती के लिए कानूनी प्रारूप तैयार करना, प्रति एकड़ उपज और किसानों की आय का मुद्दा केंद्र और राज्य के बीच, इरादे और अमल के बीच फंसा हुआ है।

एक सनकी दृष्टिकोण के कारण कृषि क्षेत्र ऐतिहासिक रूप से पीड़ित है, क्योंकि यह राजनीतिक दान का मामला है। यदि आधी से ज्यादा आबादी राष्ट्रीय आय के 15 फीसदी से कम पर जी रही है, तो विकास शायद ही मजबूत हो सकता है। इसके लिए राज्यों से निरंतरता, स्थिरता और सहयोगी प्रयास की जरूरत है। निश्चित रूप से राज्यों में चुनावी जीत कर्जमाफी और एमएसपी में वृद्धि से ज्यादा होनी चाहिए-कम से कम खुद को अलग बताने वाली पार्टी ने एक अलग रुख तो अपनाया!

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

Next Article

Followed