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जननी जन्मभूमि स्वर्ग से भी महान
Updated Wed, 13 Mar 2013 10:36 PM IST
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रामायण का प्रसंग है। सीता हरण का दुस्साहस करने वाले लंकाधिपति रावण का भगवान श्रीराम ने अंत कर दिया और लक्ष्मण जी को आदेश दिया कि लंका जाकर वह विभीषण का राजतिलक संपन्न कराएं।
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लक्ष्मण लंका पहुंचे, तो स्वर्ण नगरी की अनूठी शोभा तथा चमक-दमक ने उनका मन मोह लिया। लंका की वाटिका के तरह-तरह के सुगंधित पुष्पों को वह काफी समय तक निहारते रहे। वहां की चमक-दमक उन्हें आकर्षित कर रही थी।
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विभीषण का विधिपूर्वक राजतिलक संपन्न कराने के बाद वह श्रीराम के पास लौट आए। उन्होंने श्रीराम के चरण दबाते हुए कहा, महाराज, लंका तो अत्यंत दिव्य सुंदर नगरी है। मन चाहता है कि मैं कुछ समय के लिए लंका में निवास करूं। आपकी आज्ञा की प्रतीक्षा है।
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लक्ष्मण का लंका नगरी के प्रति आकर्षण देखकर श्रीराम बोले, लक्ष्मण, यह ठीक है कि लंका सचमुच स्वर्ग के समान आकर्षक है, प्राकृतिक सुषमा से भरपूर है, किंतु यह ध्यान रखना कि अपनी मातृभूमि अयोध्या तो तीनों लोकों से कहीं अधिक सुंदर है।
जहां मानव जन्म लेता है, वहां की मिट्टी की सुगंध की किसी से तुलना नहीं की जा सकती। अपि स्वर्णमयी लंका न में लक्ष्मण रोचते। जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी। लक्ष्मण अपनी जन्मभूमि अयोध्या के महत्व को समझ गए। उन्होंने कहा, प्रभु वास्तव में हमारी अयोध्या तीनों लोकों से न्यारी है।