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मुद्दा: कोहरा गया, खतरा नहीं; भारत में अधिकांश सड़क दुर्घटनाएं साफ मौसम में होती है

Thu, 19 Feb 2026 06:56 AM IST
लव गौर सुभाष नागपाल, सदस्य, नेशनल रोड सेफ्टी काउंसिल
सुभाष नागपाल, सदस्य, नेशनल रोड सेफ्टी काउंसिल Published by: लव गौर Updated Thu, 19 Feb 2026 06:56 AM IST
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सार
सरकारी आंकड़े संकेत देते हैं कि भारत में अधिकांश सड़क दुर्घटनाएं साफ मौसम, बेहतर दृश्यता और दिन के उजाले में होती हैं।
 
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Most road accidents in India occur in clear weather
सड़क हादसे की फाइल फोटो - फोटो : amar ujala

विस्तार

धुंध छंटी, दुर्घटना बढ़ी? कुछ अटपटा-सा लगता है। घना कोहरा तो सड़क पर जानलेवा होता ही है, पर उसके छंटने के बाद कैसे घातक हो सकता है? हर वर्ष सर्दियों में जब घना कोहरा छाता है, तो सड़क सुरक्षा को लेकर चेतावनियां तेज हो जाती हैं। दृश्यता कम, वाहन धीमे, हाईवे पर लंबी कतारें और मीडिया में भयावह दुर्घटनाओं की तस्वीरें। स्वाभाविक रूप से यह धारणा बनती है कि दुर्घटनाएं मुख्यतः कोहरे के कारण होती हैं, पर जैसे ही धुंध छंटती है, मौसम साफ होता है और दिन लंबे होते हैं, क्या दुर्घटनाएं सचमुच बढ़ जाती हैं? जी हां। सरकारी आंकड़े कुछ ऐसा ही संकेत देते हैं कि भारत में अधिकांश सड़क दुर्घटनाएं साफ मौसम, बेहतर दृश्यता और दिन के उजाले में होती हैं।


क्या दुर्घटनाएं बादलों की तरह मंडराती रहती हैं? सड़क पर चलने वालों के पीछे पड़ी रहती हैं! नहीं, ऐसा नहीं है। दुर्घटनाएं इन्सानी व्यवहार, हमारी लापरवाही और दैनिक कमजोरियों के परिणामों से घटती हैं। और हम हैं कि इनसे कुछ सीखते ही नहीं। साफ मौसम में क्या होता है? एक्सप्रेसवे व सड़कें ‘फुटबाल का मैदान’ प्रतीत होती हैं। वाहनों की रफ्तार बढ़ जाती है। मोबाइल का प्रयोग बढ़ता है, ओवरटेकिंग अधिक होती है। सीट बेल्ट व हेलमेट की अनदेखी तो होती ही है, यानी साफ मौसम में हम खुद खतरे को आमंत्रित करते हैं।


लगभग 700 फीसदी से अधिक दुर्घटनाएं साफ मौसम में होती हैं। उच्च गति इनका प्रमुख कारण है। इसका अर्थ स्पष्ट है कि मुख्यतः समस्या दृश्यता नहीं, बल्कि व्यवहार और अनुशासन है। ऐसे में, अब जब कोहरा लगभग समाप्त हो चुका है, तो क्या किया जाए? यह वक्त सख्त कार्यवाही का होना चाहिए। बदलते, साफ मौसम में प्रशासन की सड़क सुरक्षा के प्रति जिम्मेदारी और बढ़ जाती है। चूंकि, साफ मौसम में औसत वाहन गति बढ़ जाती है, इसलिए यह अनिवार्य है कि स्पीड कैमरे, इंटरसेप्टर वाहन, और ई-चालान प्रणाली को सक्रिय रूप से लागू किया जाए। ‘ब्लैक स्पॉट्स’ की पहचान कर वहां चेतावनी स्वरूप साइनेज लाइटिंग, रंबल स्ट्रिप्स और रोड मार्किंग लगाई जाए। अक्सर ट्रैफिक प्रवर्तन रात पर केंद्रित रहता है, जबकि दिन में दुर्घटनाएं अधिक होती हैं। इसलिए, यह प्राथमिकता बदलने का भी समय है।

दरअसल, अधिकतर सड़क दुर्घटनाओं के लिए मानवीय त्रुटियां ही जिम्मेदार होती हैं। ज्यादातर वाहन चालक ट्रैफिक नियमों व साइनेज से अनभिज्ञ होते हैं। एक बार ड्राइविंग लाइसेंस मिलने के बाद उनकी इस दिशा में आधुनिक जानकारी की कोई व्यवस्था नहीं होती है। अतः प्रशासन द्वारा एक कार्यक्रम के तहत चालकों, विशेषकर हाईवे चालकों, के लिए थकान प्रबंधन व रक्षात्मक ड्राइविंग जैसे विषयों पर एक रिफ्रेशर कोर्स की व्यवस्था की जाए। ऐसी ही व्यवस्था स्थानीय स्तर पर सड़क प्रयोगकर्ताओं के लिए भी होनी चाहिए। इंजीनियरिंग सुधार भी हों। सड़कों का बराबर रखरखाव, सुधार और उन्हें त्रुटि रहित बनाए रखना भी बेहद जरूरी है। हाल ही में, नोएडा और उसके पास राजधानी दिल्ली में सड़क और उनके परिवेश में सुधारीकरण के दौरान दो युवकों की मौत इस दिशा में प्रशासन को चौकन्ना रहने की ओर एक बड़ा इशारा करती है।

शायद यह जानकर हमें यकीन न हो कि उत्तर प्रदेश में प्रतिदिन सड़क दुर्घटना में औसतन 62 लोगों की मौत होती है, यानी हर एक घंटे में तीन लोगों की जान जाती है। ये सरकारी आंकड़े हैं, पर जैसे किसी को कोई फर्क नहीं पड़ता। यह संख्या हर साल बढ़ती है। वर्ष 2013 में सड़क पर लगभग 16,000 मौतें हुई थी, जो 2022 में लगभग 22,600 हो गईं। मरने वाले अधिकतर लोग युवावस्था (18-45 वर्ष) के होते हैं।

ऐसा नहीं है कि सड़क दुर्घटनाओं की बढ़ती संख्या पर रोक नहीं लगाई जा सकती। इसके लिए जरूरी है कि सरकार व प्रशासन की सड़क सुरक्षा की जिम्मेदारियों के बीच, सबसे बढ़कर है कि सामाजिक सोच बदले। सड़क सुरक्षा पूरे समाज का उत्तरदायित्व है। ‘कोहरा गया, खतरा नहीं’, इस वर्ष के बाकी माह में सार्वजनिक जागरूकता का नया संदेश बने। आज देश में उत्तर प्रदेश को एक्सप्रेसवे की राजधानी के रूप में देखा जाता है। यहां की अधिकतर मुख्य सड़कें आधुनिक, चिकनी व लंबी हैं, जो स्वाभाविक है तेज रफ्तार को बुलावा ही देती हैं। ऐसे में, जरूरी है कि सड़क पर गति-सीमा का पालन हो। सीट बेल्ट व हेलमेट जरूरी हों, मोबाइल फोन तथा दोपहिया पर तीन सवारी से परहेज करें, शराब पीकर ड्राइविंग से बचें। हमें इन नियमों को एक प्रण की तरह निभाना होगा।

सड़क सुरक्षा चेतना के लिए उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा संचालित वार्षिक अभियान (01-31 जनवरी, 2026) को अब फरवरी 2026 के अंत तक बढ़ा दिया गया है। राज्य सरकार के इन प्रयासों में हम सभी भागीदारी करें एवं स्वयं की सड़क-अनुशासन निभाने की जिम्मेदारी पूर्ण करें। कई देशों में प्रबंधन, कठोर प्रवर्तन और व्यवहार परिवर्तन अभियानों के माध्यम से 30-50 प्रतिशत तक सड़क दुर्घटनाओं में कमी आई है। उत्तर प्रदेश और पूरे भारत में भी यह संभव है, बशर्ते सड़क सुरक्षा को ‘मौसमी चिंता’ नहीं, बल्कि ‘स्थायी राष्ट्रीय मिशन’ माना जाए।
 
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