सबसे जरूरी है गंगा को बचाना
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
दो साल बीत जाने के बावजूद अपेक्षित नतीजे न दे पाने के कारण नमामि गंगे परियोजना के पुनरुद्धार का दबाव है। गंगा के कायाकल्प से जुड़े दो मुख्य मुद्दे हैं- गंगा की सफाई, और बांध या बैराज के निर्माण और नदी-जोड़ जैसी परियोजनाओं की वजह से उसके प्रवाह में कोई बाधा न पड़े। गंगा की सफाई की पूर्ववर्ती योजना गंगा ऐक्शन प्लान में आधारभूत संरचनाओं एवं खर्च पर तो ध्यान दिया गया, जबकि इस पर अमल में भ्रष्टाचार और सुस्ती जस की तस रही। तब सैकड़ों सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट बनाए गए, जिनमें से ज्यादातर बंद पड़े हैं या उनका संचालन क्षमता के अनुरूप नहीं हो पा रहा। नमामि गंगे परियोजना की शुरुआत कर एनडीए सरकार ने इन खामियों को दूर करने की कोशिश की है।
जमीनी स्तर पर इस परियोजना का असर हालांकि अभी तक देखने को नहीं मिला है। इस परियोजना में या तो उसी तरह की नौकरशाही की सोच नजर आती है, जिस कारण पहले यह योजना सफल नहीं हो सकी थी या इसमें पहले ही अपनाए जा चुके तौर-तरीकों को नए रूप में शामिल किया गया है। मसलन, शहरी सीवेज पर ज्यादा ध्यान देने के कारण ग्रामीण क्षेत्रों में सीवेज की समस्या को नजरंदाज कर दिया गया। वाराणसी के कुल क्षेत्रफल का सिर्फ एक तिहाई सीवर से जुड़ा है।बाकी क्षेत्रों का अपशिष्ट सीधे गंगा में जाता है।
ऐसे ही सिर्फ नदी घाटों को साफ करने का नजरिया गंगा की अविरल धारा को बनाए रखने के लिए पर्याप्त नहीं है। यूपीए सरकार के समय अविरल धारा की अवधारणा को ध्यान में रखते हुए ही गोमुख से उत्तरकाशी तक 132 किलोमीटर लंबे क्षेत्र को पारिस्थितिकी के लिए संवेदनशील माना गया और इस इलाके में किसी भी तरह की व्यावसायिक गतिविधि पर प्रतिबंध लगा दिया गया। पर यह कदम काफी देर से उठाया गया। पर्यावरणविदों के मुताबिक, किसी नदी में उसकी क्षमता का कम से कम 32 प्रतिशत प्रवाह पर्यावरण के लिहाज से अनुकूल होता है, जबकि नदी का अपेक्षित प्रवाह 50 प्रतिशत से अधिक होना चाहिए। पर गंगा का न्यूनतम प्रवाह करीब पांच प्रतिशत ही है। उत्तराखंड में करीब 450 जल विद्युत परियोजनाएं चल रही हैं, जिस कारण भागीरथी का 53 प्रतिशत प्रवाह प्रभावित हुआ है। हिमालय में सुरंगों का निर्माण, खनन और नदियों को जोड़ने के कारण पानी का संकट बढ़ रहा है।
सरकार जिस तरह 2022 तक 'सबके लिए बिजली' की योजना को पूरा करने की बात कर रही है, उससे गंगा का प्रवाह सुधरने के बजाय बिगड़ सकता है। 2013 में सर्वोच्च न्यायालय ने गंगोत्री के पैरा-ग्लेशियल क्षेत्र में हाइड्रो-इलेक्ट्रिक परियोजनाएं शुरू न करने का आदेश दिया था। पर 2015 में, प्रधानमंत्री कार्यालय की एक बैठक के बाद, जिसमें नई परियोजनाओं को हरी झंडी दी गई थी, इस आदेश को वापस ले लिया गया।
गंगा के प्रवाह को बनाए रखने के लिए सफाई के लिए जरूरी है। गंगा की सफाई नागरिक मुद्दा है, जबकि उसकी अविरल धारा को बनाए रखना देश के अस्तित्व के लिए जरूरी है। गलती यह हुई कि अब तक नदियों की सफाई पर ध्यान केंद्रित किया गया, जबकि उसके घटते प्रवाह, कृत्रिम अवरोध, जलग्रहण क्षेत्र में वनस्पतियों को नुकसान, बाढ़ वाले क्षेत्रों का अतिक्रमण, रेत खनन की अनदेखी की गई। गंगा की सफाई नौकरशाही के शब्दजाल या उनके नुस्खों पर सर्वाधिक निर्भर है। राजनीति और लालच गंगा संरक्षण मिशन के हर एक पहलू में घुस चुका है। यही कारण है कि विभिन्न मंत्रालयों, विभागों, निकायों तथा अदालत और एनजीओ के हस्तक्षेप के बावजूद इसे नवजीवन देने की दिशा में अब तक कुछ सार्थक नहीं हो पाया है।