{"_id":"5a141e984f1c1bd9798bdf4a","slug":"modi-will-decide-gujarat-s-direction","type":"story","status":"publish","title_hn":"मोदी तय करेंगे गुजरात की दिशा","category":{"title":"Opinion","title_hn":"नज़रिया ","slug":"opinion"}}
मोदी तय करेंगे गुजरात की दिशा
नीरजा चौधरी
Updated Wed, 22 Nov 2017 09:06 AM IST
विज्ञापन
निरंतर एक्सेस के लिए सब्सक्राइब करें
नीरजा चौधरी
दिसंबर की शुरुआत में राहुल गांधी की पार्टी अध्यक्ष के रूप में ताजपोशी लगभग निश्चित है, जिससे गुजरात चुनाव में पार्टी को नई बढ़त मिलेगी, इसलिए नहीं कि यह चुनावी नतीजे पर असर डालेगा, बल्कि इसलिए कि यह इस बात का संकेत है कि कांग्रेस अपनी सांगठनिक तैयारी के लिए अगला कदम उठा रही है। पार्टी कार्यकर्ताओं के बीच इससे दुविधा खत्म होगी, हालांकि सभी व्यावहारिक उद्देश्यों के लिए राहुल ही फैसला लेते रहे हैं और वह पार्टी के वास्तविक प्रमुख रहे हैं। इसलिए इसका लाभ केवल मनोवैज्ञानिक ही हो सकता है।
आगे पढ़ने के लिए लॉगिन या रजिस्टर करें
अमर उजाला प्रीमियम लेख सिर्फ रजिस्टर्ड पाठकों के लिए ही उपलब्ध हैं
अमर उजाला प्रीमियम लेख सिर्फ सब्सक्राइब्ड पाठकों के लिए ही उपलब्ध हैं
फ्री ई-पेपर
सभी विशेष आलेख
सीमित विज्ञापन
सब्सक्राइब करें
गुजरात का महायुद्ध केवल नरेंद्र मोदी बनाम राहुल गांधी नहीं है, हालांकि दोनों अपनी-अपनी पार्टी की तरफ से चुनाव प्रचार का नेतृत्व कर रहे हैं। उम्मीद की जा रही है कि अपने राज्य को जीतने के लिए मोदी सभी पैतरें आजमाएंगे और हर किसी को उम्मीद है कि आखिरी चरण में वह भावनात्मक कार्ड खेलेंगे और चुनाव प्रचार को एक नई ऊंचाई पर ले जाएंगे। पिछले तीन वर्षों के दौरान हुए सभी राज्य विधानसभा चुनावों के मुकाबले राहुल ने भी हाल में गुजरात चुनाव में ज्यादा समय खर्च किया है, क्योंकि उन्होंने पूरे राज्य को छान मारा है। यह संभवतः भाजपा के प्रति बढ़ते असंतोष की वजह से भी है कि लोग इस बार राहुल को सुनने के लिए तैयार हैं। सोशल मीडिया पर कांग्रेस बेहतर प्रदर्शन कर रही है, क्योंकि राहुल ने स्मार्ट लोगों की टीम को लगाया है और चुनाव प्रचार की शुरुआत में वायरल हुआ जुमला 'विकास गांडो थायो'(गुजरात में विकास पगला गया है) अन्य जुमलों की शुरुआत थी। इस तरह के जुमले जब सामने आए, तो उसने राज्य की सत्तारूढ़ पार्टी को शर्मिंदा किया।
राहुल गांधी ने गुजरात के तीन उभरते हुए युवा नेताओं-हार्दिक पटेल, अल्पेश ठाकोर और जिग्नेश मेवाणी तक पहुंचने में समझदारी दिखाई, जिन्होंने अपने समुदायों-पाटीदार, ओबीसी और दलितों की अशांत भावनाओं को पकड़ा है और वे गुजरात में उभरते हुए सितारे के रूप में देखे जाते हैं। ये तीनों युवा नेता भाजपा के गुजरात मॉडल पर सवाल उठा रहे हैं, जिस पर मौजूदा चुनाव में बात नहीं हो रही है। चूंकि अल्पेश को छोड़कर (जिन्होंने हाल में कांग्रेस जॉइन की है) ये नेता किसी राजनीतिक दल का प्रतिनिधित्व नहीं करते, इसलिए उनके प्रभाव से कांग्रेस को वोट मिलने की उम्मीद थी। इस नजरिये से अच्छा होता कि अल्पेश ठाकुर कांग्रेस में शामिल होने के बजाय बाकी दोनों युवा नेताओं के साथ चुनाव प्रचार करते। ये तीनों गुजरात में नई राजनीतिक ऊर्जा के उदय का प्रतिनिधित्व करते हैं। भले ही अट्ठारह दिसंबर को जो भी नतीजा आए, पर इन तीनों की प्रासंगिकता 2019 के चुनाव में भी बची रहेगी।
मतदाताओं के असंतोष को वोटों में तब्दील करना कांग्रेस के लिए सबसे बड़ी चुनौती है और राज्य में पार्टी के कमजोर संगठनात्मक ढांचे को देखते हुए यह कोई छोटी चुनौती नहीं है, जहां वह दो दशक से भी ज्यादा समय से सत्ता से बाहर है। जब कोई पार्टी लंबे समय तक सत्ता से बाहर रहती है, तो उसके कार्यकर्ता पार्टी का साथ छोड़ देते हैं।
जहां तक भाजपा की बात है, तो गुजरात में उसके प्रति बढ़ते असंतोष के स्पष्ट संकेत हैं। कुछ हद तक लोगों में 'आक्रोश' दिखता है और जब लोग नाराज होते हैं, तो किसी पार्टी या व्यक्ति के खिलाफ वोट डालते हैं, बिना यह सोचे हुए कि वह किसको वोट दे रहे हैं। मैंने उत्तरी गुजरात के मेहसाणा जिले के गांवों में पाटीदारों में यह गुस्सा देखा, जो दो वर्ष पहले पाटीदार आंदोलन का प्रमुख केंद्र था। राज्य में इन पाटीदारों (पटेलों) की आबादी पंद्रह से अट्ठारह फीसदी है, वे नौकरियों और शिक्षा में आरक्षण की उनकी अपूर्ण मांगों के बारे में ज्यादा बातें नहीं करते, जिन्हें पाटीदारों के कमजोर पड़ते राजनीतिक और आर्थिक रसूख के मद्देनजर हार्दिक पटेल ने उठाया था। वे भाजपा के 'घमंड' और 'मनमानी' के खिलाफ ज्यादा बोलते हैं और कहते हैं कि वे इस बार उसे 'फटका' देंगे, 'ताकि वे लाइन पर आ जाएं।'
वे कांग्रेस के प्रति अपने प्रेम का इजहार नहीं करते, लेकिन इसके लिए तैयार हैं कि अगर हार्दिक पटेल ने कहा, तो वे कांग्रेस के पक्ष में मतदान करेंगे। और यह बात कड़वा पटेल के लोगों के बीच काफी स्पष्ट है, इसी उप-जाति से हार्दिक ताल्लुक रखते हैं। दिलचस्प बात यह है कि उनकी नाराजगी मोदी से कम, भाजपा से ज्यादा है। इसका कारण यह है कि कई लोग मोदी के इरादों पर शक नहीं करते, बल्कि उनकी नीतियों (मसलन जीएसटी) के खराब क्रियान्वयन को दोष देते हैं, जिसने भाजपा के महत्वपूर्ण समर्थक व्यावसायियों को नाराज कर दिया। इसके अलावा युवाओं में रोजगार को लेकर, किसानों में बढ़ती मुश्किलों को लेकर बेचैनी है और कई दलित, जिन्होंने पिछले दो चुनावों में भाजपा के पक्ष में मतदान किया था, वे भी दूसरा विकल्प तलाश रहे हैं।
लेकिन व्यावहारिक तौर पर गुजरात में आज हर कोई इस बात को लेकर उत्सुक है कि नरेंद्र मोदी चुनाव के अंतिम चरण में अपने गृह राज्य में पार्टी की जीत सुनिश्चित करने के लिए क्या करने जा रहे हैं, जिसे कहीं और की तुलना में उनकी लोकप्रियता के बैरोमीटर के तौर पर देखा जाएगा। वह भाजपा के मुख्य उद्घाटनकर्ता रहे हैं, यहां तक चुनाव की अधिसूचना जारी होने से ठीक पहले उन्होंने पुल और फेरी सेवा जैसी छोटी परियोजनाओं का उद्घाटन किया। इसलिए सबकी नजरें इसी बात पर लगी हैं कि वह गुजरात के लोगों से क्या कहते हैं। उम्मीद है कि वह गुजरात की धरती का बेटा होने की तर्ज पर कुछ कहें, जिसकी हार या जीत पर दुनिया भर में गुजराती सम्मान निर्भर कर सकता है और जो उन्हें अपनी भावी योजनाओं को मूर्त रूप देने मे सक्षम बना सकता है या रोक सकता है।
इस बार गुजरात का चुनाव मुख्यतः भाजपा के प्रति बढ़ती नाराजगी को लेकर है, लेकिन मोदी अपनी क्षमता से पार्टी के खिलाफ नकारात्मकता को कम कर सकते हैं, जो आने वाले दिनों में और स्पष्ट दिखेगा। यह चुनाव नरेंद्र मोदी बनाम असंतुष्ट आवाज को लेकर है।