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नेपाल के दर्पण में अपना चेहरा

Tue, 05 Aug 2014 06:42 PM IST
पुष्पेश पंत
पुष्पेश पंत Updated Tue, 05 Aug 2014 06:42 PM IST
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modi visit to nepal

नरेंद्र मोदी ने अपनी नेपाल यात्रा के दौरान इस पड़ोसी देश में सत्तारूढ़ और प्रतिपक्षी दलों का दिल तो जीता ही, स्वदेश में भी अनेक लोगों को भाव विह्वल कर दिया। व्यक्तिगत तौर पर इन पंक्तियों के लेखक को उनके भाषण की वह बात मर्मस्पर्शी लगी, जिसमें उन्होंने यह कहावत उद्धृत की, पानी और जवानी कभी पहाड़ के काम नहीं आती। दूसरे ही इसका फायदा उठाते हैं। वह यह जोड़ना भी नहीं भूले कि भारत नेपाल के प्राकृतिक संसाधनों या श्रम शक्ति का मुफ्त उपभोग करने की इच्छा कतई नहीं रखता। इस टिप्पणी से उन्होंने अनायास ही अपने श्रोताओं का ध्यान नेपाल के विकास में क्षेत्रीय असंतुलन की समस्या और दुर्गम पहाड़ी भूभाग की विशेष समस्याओं की ओर आकर्षित किया। यह रेखांकित करने की जरूरत नहीं होनी चाहिए कि स्वयं भारत इस विडंबना का शिकार है।

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नेपाल के दर्पण में अपना चेहरा देखने से हमारे नेता और राजनयिक अब तक कतराते रहे हैं। मोदी ने अनायास बिना बड़बोलेपन के नेपालियों को इस बात का एहसास कराया कि हमारी अपनी मुसीबतें बिल्कुल उन जैसी हैं। नेपाल के समाज की बहुलता की आसानी से हम अनदेखी कर जाते हैं। सबको साथ लेकर ही वह विकास हो सकता है, जिससे सामाजिक विषमता मिटाई जा सकती है। इसके अभाव में असंतोष और आक्रोश हिंसक विस्फोट के लिए चिनगारी का काम ही करते हैं।
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जहां मोदी ने यह बात दोटूक साफ कर दी कि भारत की कोई मंशा नेपाल की आंतरिक राजनीति या उसके वैदेशिक संबंधों में दखलंदाजी की नहीं है, वहीं उन्होंने नेपाल के लगभग निरंकुश राजशाही से छुटकारा पाकर संघीय व्यवस्था वाले जनतांत्रिक गणराज्य में रूपांतर पर संतोष व्यक्त किया। इस तरह उन्होंने उन शंकाओं का निवारण किया, जो यह भ्रम पैदा कर रही थीं कि मोदी ‘भाजपाई मानसिकता’ के अनुरूप नेपाल में हिंदू राजशाही की पुनर्स्थापना के पक्ष में कुछ संकेत देकर अपने मेजबानों को अप्रसन्न कर सकते हैं।
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भारतीय प्रधानमंत्री ने बहुत कौशल से एकाधिक बार संविधान की महत्ता को समझाते हुए नेपाली सांसदों का महिमामंडन इसलिए तर्कसंगत ढंग से किया कि संविधान ही जनतंत्र में कानून के राज को सुरक्षित रख सकता है। उन्होंने जहां नेपाल के माओवादियों को इस बात का पूरा श्रेय दिया कि हथियार डालकर अपने लक्ष्य की प्राप्ति के लिए शास्त्र का सांविधानिक मार्ग चुन उन्होंने दूरदर्शिता का परिचय दिया है, वहीं उन्होंने नेपाली कांग्रेस तथा अन्य राजनीतिक दलों की प्रशंसा इस बात के लिए की कि उन्होंने बागियों को चुनावी राजनीति की मुख्यधारा में आने का मौका सहर्ष दिया।

इसी सिलसिले में यह बात कही गई कि संविधान के दायरे में बहुत कुछ करने की, यथास्थिति को शांतिपूर्ण तरीके से बदलने की गुंजाइश होती है। यह बात सुनकर जिसने भी प्रचंड और बाबूराम भट्टराई को मेज थपथपाते हुए देखा, वह यह सोचने को मजबूर होगा कि क्या ये बातें भारत के सैकड़ों जिलों में सक्रिय माओवादियों को संबोधित कर नहीं कही जा रही थीं?

यहां मोदी के जो आलोचक यह कहते नहीं थकते कि मोदी और भाजपा का छिपा एजेंडा भारतीय जनतंत्र में सेंधमारी और फासीवादी तानाशाही की स्थापना की साजिश का है, उनके लिए यह संदेश काफी होना चाहिए। बुद्ध की जन्भूमि के रूप में नेपाल को अंतरराष्ट्रीय तीर्थस्थल बना सारनाथ और बोधगया से जोड़ने का सुझाव कट्टरपंथी नहीं है। धार्मिक पर्यटन का विकास बिना आधारभूत ढांचे में सुधार के संभव नहीं। बिजली-सड़क-पानी, खून-पसीना या जवानी इनमें कुछ भी अमूर्त नहीं। ये सब आम आदमी की जिंदगी के बुनियादी सरोकार हैं।

अधिकतर भारत-नेपाल संबंधों का विश्लेषण सामरिक संवेदनशीलता (चीन तथा पाकिस्तान के संदर्भ में) तथा नदी जल विवाद तक सीमित रह जाता है। बहुत हुआ, तो सरहद पर तस्करी या खुदगर्ज भारतवंशी व्यापारियों की हरकतों या राजनयिकों के अहंकार जनित मनमुटाव से भारत की छवि धूमिल होने वाले मुद्दों को क्षणभंगुर प्राथमिकता मिल जाती है। पहली बार किसी बड़े नाटकीय समझौते पर हस्ताक्षर की ‘उपलब्धि’ का लालच छोड़ संभावनाओं और महत्वाकांक्षी सपनों की साझेदारी की गई। यह सब तुष्टीकरण या समर्पण की मुद्रा में नहीं किया गया।

अतीत की भूलों के लिए क्षमा याचना का स्वर मोदी का नहीं था-बल्कि नई पहल का निमंत्रण था इस आश्वासन के साथ कि नया नेपाल नए भारत के साथ अपनी जरूरत और इच्छा के अनुकूल सहयोग की रूपरेखा बनाने को स्वाधीन-संप्रभु है। उसके जो भी गिले-शिकवे भारत से हैं, उन्हें दूर करने को भारत तैयार है। जाहिर है कि किसी भी जनतंत्र में किसी भी महत्वपूर्ण मुद्दे पर सरकार और प्रतिपक्ष में हमेशा सहमति नहीं होती। इस बात को लेकर सिरदर्द पालने की जरूरत नहीं कि क्यों ऊर्जा से जुड़े उस बड़े समझौते पर दस्तखत नहीं हुए, जिसका हल्ला था? शनैः कंथा, शनैः पंथाः, शनै पर्वत लंघनम वाली सीख काम की है। यह बात नेपाली मित्रों को भी याद रहे कि बरसों से उलझी गुत्थी पल भर में नहीं सुलझ सकती। असली चुनौती दोनों पक्षों द्वारा अपनी विश्वसनीयता प्रमाणित करने की है।


नेपाल के साथ एक-दो नहीं, पांच भारतीय राज्यों की सरहद जुड़ी है। यह अंतरराष्ट्रीय सीमा अबाध है। भौगोलिक रूप से संलग्न इलाके में नेपाल और भारत ‘विदेश’ नहीं ‘उस पार’ या ‘इस पार’ ही हैं। भारत के इन राज्यों की एवं इनसे जुड़े नेपाली जिलों-अंचलों की खुशहाली एक दूसरे को प्रभावित किए बिना नहीं रह सकती। विकास के लाभ की साझेदारी का कोई विकल्प नहीं।

(जेएनयू के पूर्व प्रोफेसर और अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकार)

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