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मोदी लहर अभी सुनामी नहीं बनी है
तवलीन सिंह
Updated Mon, 09 Dec 2013 08:14 PM IST
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ये चुनाव नतीजे राजनेताओं और राजनीतिक दलों के लिए एक अहम सबक लेकर आए हैं, और वह है, पब्लिक बड़ी जालिम है और इन दिनों बड़ा जालिम है जमाना। इतना जालिम हो गया है जमाना कि मेरे जैसे राजनीतिक पंडितों को भी नहीं मालूम था कि महारथियों के रथ अटक कर रह जाएंगे इन चुनावों के दलदल में। हमें मालूम नहीं था कि इन चुनावों से एक नई शक्ति पैदा होगी, जो शायद 2014 के लोकसभा चुनाव के परिणाम भी बदल कर रख डाले।
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अन्य पंडितों की तरह मैं भी मतगणना के दिन एक टीवी स्टुडियो में सुबह सात बजे पहुंच गई थी। परिणाम तो साढ़े आठ बजे के बाद ही आने थे, लेकिन इतनी राजनीतिक गहमागहमी रहती है ऐसे दिनों में कि खूब बहस करने के मौके मिलते है। हम जैसे लोगों को बहस करने का अक्सर बड़ा शौक होता है।
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सो हमने तय कर लिया पहली चाय-कॉफी की चुस्कियां लेते कि चाहे कुछ भी हो जाए, शीला दीक्षित नहीं हार सकती हैं। अरविंद केजरीवाल की हिम्मत को हमने दाद दी कि उन्होंने अपने पहले चुनाव में इतनी बड़ी शख्सियत को चुनौती देने का फैसला लिया। च्च..च्च..च्च.. पॉलिटिक्स में नया है बेचारा- हमने हमदर्दी जताते हुए कहा। हेडलाइन्स टुडे के स्टुडियो में थे हम और और इस चैनल के एक्जिट पोल के मुताबिक आप को छह सीटें मिलने वाली थीं। इस एक्जिट पोल ने कांग्रेस और भाजपा के बीच मुकाबला बताया और भाजपा आगे थी दौड़ में।
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फिर बात छिड़ी मोदी लहर की। मैंने कहा कि मुझे लहर दिखती है उत्तर भारत में, क्योंकि मुझे मोदी की आम सभाओं में वह जोश दिखा, जो 1977 वाले लोकसभा चुनाव में दिखा था। स्टुडियो में इस बात पर आम सहमति नहीं बन पाई, क्योंकि कुछ ऐसे पंडित थे वहां, जिनकी राय थी कि राज्य चुनाव में स्थानीय मुद्दों पर मतदाता फैसला करते हैं। कुछ घंटों बाद जब परिणाम आने शुरू हुए और मध्य प्रदेश और राजस्थान में भाजपा की शानदार जीत के आसार दिखने लगे, तो हमने आपस में तय कर लिया कि इस देश के अगले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अवश्य बनेंगे।
फिर ध्यान गया दिल्ली के नतीजों पर और ‘आप’ के चौंकाने वाले रूझान जब आने शुरू हुए, तो हैरान रह गए हम सब। ईमानदारी जरूरी होती है राजनीतिक बदलाव का विश्लेषण करते समय, सो हमने माना कि हममें से ऐसा कोई न था, जिसको हल्की-सी भनक भी थी कि आप इतनी कामयाब हो सकेगी। जब मालूम पड़ा कि दिल्ली की मुख्यमंत्री को शिकस्त दे दी है केजरीवाल ने, तो हम एक-दूसरे की तरफ हैरान नजरों से देखने लगे।
सुनामी ही थी, जो दिल्ली में आई और उखाड़ के फेंक गिराया मंत्रियों को और महारथियों को। अनुमान है कि आप को मिले मतों में अधिकांश हिस्सा ऐसे मतदाताओं का है, जो कांग्रेस को वोट देते रहे हैं। लेकिन नुकसान भाजपा को भी इतना किया कि सरकार बनाने का दावा करने से घबरा रहा है यह दल। मैंने जब भाजपा के एक वरिष्ठ नेता से पूछा कि वे क्यों नहीं बनाना चाहते हैं दिल्ली में सरकार, तो इन शब्दों में जवाब मिला, 'बिना बहुमत के चलाएंगे कैसे? विपक्ष में होंगे आप के नए विधायक, जो हमारे हर कदम को रोकेंगे झाड़ू लेकर।'
दिल्ली को अभी सरकार मिले, न मिले, पर आप का स्वागत मेरे जैसे पंडित भी कर रहे हैं, जिन्हें न उसकी राजनीतिक सोच पसंद है, न उसकी आर्थिक नीतियां। स्वागत इसलिए कि कांग्रेस और भाजपा को जैसा झटका मिला है, शायद सुधर जाएं ये दोनों दल लोकसभा चुनाव से पहले। दोनों में गंभीर खराबी आ चुकी है।
रही बात मोदी लहर की, तो नतीजों का विश्लेषण करने पर मालूम पड़ता है कि राजस्थान और मध्य प्रदेश में दिखी है यह लहर। आंकड़ों का विश्लेषण जिन विशेषज्ञों ने किया है, उनका कहना है कि इन दोनों राज्यों में भाजपा का वोट 10 और 15 प्रतिशत के बीच बढ़ा है। इसका श्रेय काफी हद तक जाता है वसुंधरा राजे और शिवराज सिंह चौहान को, लेकिन कुछ हद तक मोदी को भी जाता है।
मोदी लहर अभी सुनामी नहीं बन पाई है और उसका सुबूत है, छत्तीसगढ़ और दिल्ली का नतीजा। सो दिल्ली पास भी है मोदी के लिए और दूर भी। रास्ता लंबा है और कठिन भी, प्रधानमंत्री की कुर्सी थोड़ी पास जरूर आ गई है उनके, पर दूर भी है इतनी कि उसको हासिल करना आसान नहीं होगा। हाय-हाय ये जालिम जमाना।