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मोदी के उत्तराधिकारी? अब इस नेता की दावेदारी है सबसे मजबूत

Sun, 14 Feb 2021 08:33 AM IST
Ramchandra Guha रामचंद्र गुहा
Updated Sun, 14 Feb 2021 08:33 AM IST
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Modi's successor? Now this leader is at the forefront of the race
पीएम मोदी-गृहमंत्री शाह और मुख्यमंंत्री योगी (फाइल फोटो)

वर्ष 2020 में तीन विषय सुर्खियों में बने रहे। ये विषय हैं, महामारी से उपजा खतरा, अर्थव्यवस्था की बदहाल स्थिति और चीन के साथ सीमा संबंधी विवाद। भारतीय मीडिया और सामान्य तौर पर भारतीय लोग राजनीति के प्रति आसक्त रहते हैं, लेकिन 2020 में स्वास्थ्य, अर्थव्यवस्था और रक्षा ने राजनीति को पीछे की ओर धकेल दिया।


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इसके बावजूद भारतीय राजनीति में पिछले साल एक बड़ा बदलाव हुआ, जिसका हमारे गणराज्य के भविष्य पर गहरा और विक्षुब्ध कर देने वाला प्रभाव पड़ सकता है। यह है भारत की सबसे महत्वपूर्ण राजनीतिक पार्टी के भावी नेता के रूप में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री का उभार। 2019 के अंत में ऐसा लगा था कि यदि 2024 में भाजपा लगातार तीसरी बार आम चुनाव जीतती है, तो संभवतः नरेंद्र मोदी की जगह केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह प्रधानमंत्री बन सकते हैं। शाह करीब दो दशकों तक मोदी के सबसे भरोसेमंद सहयोगी रहे; अनुच्छेद 370 को निष्प्रभावी करने और नागरिकता संशोधन विधेयक पारित करवाने में अहम भूमिका निभाने के साथ ही ऐसा लगा कि वह खुद को अपने नेता के उत्तराधिकारी के रूप में प्रस्तुत कर रहे हैं- स्पष्ट तौर पर अपने नेता की मंजूरी से।

2020 की शुरुआत में पारंपरिक ज्ञान से लगा कि अमित शाह नरेंद्र मोदी के उत्तराधिकारी के रूप में सबसे आगे हैं। एक साल बाद अब ऐसा नहीं लगता। उनकी जगह आदित्यनाथ को देखा जा रहा है, जैसा कि भाजपा के वरिष्ठ नेता खुद भी स्वीकार कर रहे हैं। जरा विचार कीजिए कि शिवराज सिंह चौहान और बी एस येदियुरप्पा ने अपने राज्यों में हिंदू-मुस्लिम विवाह के खिलाफ कानून पारित करवाने में कैसी तत्परता के साथ उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री का अनुसरण किया है। एक समय चौहान और येदियुरप्पा वाजपेयी युग के प्रतीक थे, और जिन्हें शाह या मोदी जैसे कट्टरपंथियों की तुलना में नरम और समावेशी के रूप में देखा जाता था। उन्होंने, इस उम्मीद में कि राजनीतिक अस्तित्व अनिश्चित उदारता को त्यागकर कट्टरता को अपनाने में निहित है, अब अपना भविष्य आदित्यनाथ के अधीन कर दिया है।

2012-13 में प्रधानमंत्री बनने की अपनी महत्वाकांक्षा को सार्वजनिक करते हुए नरेंद्र मोदी ने 'गुजरात मॉडल' की बात की थी और जिसे वह पूरे देश में लागू करना चाहते थे। मोदी ने दावा किया था कि इस गुजरात मॉडल ने प्रगतिशील, अग्रगामी आर्थिक और सामाजिक दृष्टिकोण का प्रतिनिधित्व किया है। हालांकि उनके आलोचकों ने मुस्लिमों को हाशिये पर धकेलने और विरोध के प्रति असहिष्णुता का जिक्र करते हुए मुख्यमंत्री के रूप में उनके धुंधले पक्ष को रेखांकित किया। आदित्यनाथ ने अभी तक स्पष्ट रूप में 'यूपी मॉडल' जैसा कोई दावा नहीं किया है, जिसे वह पूरे भारत में ले जाएंगे। उन्होंने अपने राज्य में अब तक जो कुछ भी किया है, उसके आधार पर हम इस बात का सही अंदाजा लगा सकते हैं कि यह किसका प्रतिनिधित्व कर सकता है।

मोदी और आदित्यनाथ में उल्लेखनीय समानताएं हैं। दोनों ही सत्तावादी व्यक्तित्व के पाठ्यपुस्तक जैसे उदाहरण हैं। दोनों ही अपने आसपास के लोगों पर, चाहे वह कैबिनेट के सहयोगी हों, विधायक, नौकरशाह, वैज्ञानिक विशेषज्ञ, प्रेस या व्यापक रूप में आम लोग, उन पर अपने विचार थोपना चाहते हैं। दोनों आत्मप्रशंसा से ग्रस्त हैं- सारी उपलब्धियों का श्रेय, फिर वह वास्तविक हों या काल्पनिक, सिर्फ उन्हें मिलना चाहिए।

इसके बावजूद दोनों में महत्वपूर्ण अंतर भी हैं। मोदी की तुलना में आदित्यनाथ खुले तौर पर बहुसंख्यकवादी हैं। मोदी कई बार कहते हैं कि वह सबके साथ हैं, फिर उनकी धार्मिक आस्था कुछ भी हो। (सबका साथ)। वह कभी मेट्रो में सफर कर रहे मुस्लिमों के साथ फोटो भी खिंचवा लेते हैं। आदित्यनाथ के पास ऐसी गोलमोल बात नहीं होगी। वह अपने शब्दों और अपनी कार्रवाइयों से स्पष्ट करते हैं कि वह मानते हैं कि हिंदू अन्य आस्थाओं खासतौर से मुस्लिमों से श्रेष्ठ हैं।

मुख्यमंत्री के रूप में मोदी ने गुजरात में अपने आलोचकों को दबाने और चुप कराने के लिए पुलिस और कानून के औजारों का इस्तेमाल किया था। आदित्यनाथ भी अपने राज्य में ऐसा करते हैं, जैसा कि उत्तर प्रदेश में नागरिकता संशोधन अधिनियम के विरोध में हुए शांतिपूर्ण प्रदर्शन को दबाने के लिए की गई कार्रवाई में देखा गया। हालांकि, वह भारत में कहीं भी आलोचकों पर हमला करने के लिए अपनी पुलिस का उपयोग कर, मुख्यमंत्री के रूप में मोदी ने जो किया, उसकी तुलना में कहीं आगे बढ़ गए। अन्य राज्यों में काम करने वाले पत्रकारों और कॉमेडियन के खिलाफ उत्तर प्रदेश में एफआईआर दर्ज करवाकर आदित्यनाथ ने दिखाया कि वह मोदी की तुलना में कहीं अधिक कट्टर सत्तावादी हैं।

निश्चित रूप से, ये उनके अपने राज्य के लोग हैं, जिन्होंने दमन और जबर्दस्ती की आदित्यनाथ की नीतियों का खामियाजा उठाया है। शानदार वेबसाइट आर्टिकल 14 के एक आलेख में रेखांकित किया गया कि, 'उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री के रूप में आदित्यनाथ का चयन भारतीय गणराज्य में भाजपा के आगे बढ़ने का निर्णायक क्षण था, क्योंकि यह शासन करने के उस मॉडल का अनुमोदन है, जो खुले तौर पर मुस्लिम नागरिकों और राजनीतिक विरोधियों को लोगों का दुश्मन बताता है।' आलेख में आगे लिखा गया, 'कार्यालय में अपने शुरुआती दिनों से ही मुख्यमंत्री ने एक ऐसा राज्य बनाने और समेकित करने के लिए शासन के उपकरणों का उपयोग करने में संकोच नहीं किया है, जो निगरानी समूहों की चिंताओं और हिंदुओं, विशेष रूप से अधिकार प्राप्त "उच्च" जातियों को महत्व दे, और कानून तथा पुलिस का इस्तेमाल मुस्लिमों और विरोधियों को निशाना बनाने, दंडित करने, कैद करने और कुछ मामलों में मार डालने के लिए करे...।' न्यायेतर मौत और मुस्लिमों तथा कार्यकर्ताओं को निशाना बनाने के कुछ उदाहरणों का हवाला देते हुए इस लेख का समापन इस तरह होता है कि 'आदित्यनाथ सरकार ने शासन का प्रतिशोधी, बहुसंख्यक और दमनकारी मॉडल प्रस्तुत किया, जिसने ऐसी हदें लांघ दीं, जिनका उल्लंघन करने में पहले की भाजपा सरकारें हिचकती थीं।'

उत्तर प्रदेश का मुख्यमंत्री बनने से पहले आदित्यनाथ ने हिंदू युवा वाहिनी नामक संगठन बनाया था, जो कि खुद को हिंदुत्व और राष्ट्रवाद के लिए समर्पित सांस्कृतिक और सामाजिक संगठन बताता था। उग्र और संगठित इस समूह को दंगे, हत्या और आगजनी जैसे आरोपों का सामना करना पड़ा। वाहिनी के सदस्य अपने नेता के प्रति समर्पित हैं और हमेशा उनके निर्देश का पालन करने के लिए तैयार रहते हैं। इस तरह आदित्यनाथ स्वतंत्र भारत के इतिहास में अकेले ऐसे राजनेता हैं, जिन्होंने अपने राज्य का मुख्यमंत्री बनने से कई वर्ष पहले एक निगरानी संगठन की स्थापना की और उसका संचालन किया।

मोदी जब 2001 में गुजरात के मुख्यमंत्री बने थे, तब राज्य का पहले से मजबूत औद्योगिक आधार था और वहां फलती-फूलती उद्यम संस्कृति थी। 2017 में आदित्यनाथ के उत्तर प्रदेश का मुख्यमंत्री बनने से पहले इस राज्य में ऐसा कुछ नहीं था। आबादी के लिहाज से देश का सबसे बड़ा राज्य आर्थिक और सामाजिक रूप से पिछड़ा था और आदित्यनाथ की नीतियों ने इस छवि को बदलने के लिए कुछ नहीं किया।

यह संक्षिप्त में उस शख्स का व्यक्तिगत और राजनीतिक रिकॉर्ड है, जिनके बारे में कहा जा रहा है कि वह भाजपा के शीर्ष नेता के रूप में नरेंद्र मोदी के उत्तराधिकारी हो सकते हैं। यदि आदित्यनाथ सचमुच अगले आम चुनाव में अपनी पार्टी के अभियान का नेतृत्व करते हैं, तो वह मतदाताओं से किस तरह के 'अच्छे दिन' का वादा करेंगे? 2013-14 में मोदी ने दावा किया था कि वह भारतीय युवाओं को रोजगार, समृद्धि और सुरक्षा देंगे। क्या हिंदू यवा वाहिनी के संस्थापक युवा भारतीयों को दूसरे धर्म के लोगों के उत्पीड़न और दमन से मिलने वाली संतुष्टि के अलावा कुछ और दे सकते हैं?

प्रधानमंत्री के रूप में मोदी ने पूरी दुनिया का भ्रमण किया है, दूसरे देशों के नेताओं को लुभाया है (हालांकि मिश्रित सफलता के साथ)। यदि आदित्यनाथ प्रधानमंत्री बन गए तो लगता नहीं कि वह इस बात की परवाह करेंगे कि दुनिया उनके और उनके देश के बारे में क्या सोचती है। उनका मुख्य ध्यान भारत में अपनी सत्ता को मजबूत करने में केंद्रित होगा, विशेष रूप से ऐसे भारतीयों पर जो उनकी राजनीतिक, दार्शनिक या आध्यात्मिक आस्था से अलग हों। कुछ महीने पहले मैंने एक लेख में अतीत के प्रधानमंत्रियों और वर्तमान प्रधानमंत्री की राजनैतिक शैलियों की तुलना की थी। मैंने तर्क किया कि केंद्रीकरण और नियंत्रण की अपनी प्रकृति में नरेंद्र मोदी ऐसे हैं मानो 'इंदिरा गांधी स्टेरायड पर' हों। आदित्यनाथ यदि कभी प्रधानमंत्री बन गए तो संभावना है कि ऐसे होंगे मानो नरेंद्र मोदी स्टेरायड पर हों। गुजरात मॉडल ने सात साल में गणतंत्र के सामाजिक और सांस्कृतिक तानेबाने को गहरे से नुकसान पहुंचाया है। यूपी मॉडल का सिर्फ एक कार्यकाल इसे नष्ट कर सकता है।

 

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