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मोदी लहर के बावजूद
नीलांजन मुखोपाध्याय
Updated Mon, 31 Mar 2014 01:44 AM IST
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भारत के राजनीतिक इतिहास में अक्सर यह कहा जाता है कि राजीव गांधी ने संसद में मुस्लिम महिला अधिनियम पारित करके पहले मुस्लिम कट्टरपंथियों से समझौता किया। फिर उन्होंने हिंदू कट्टरपंथियों को खुश करने का फैसला किया। उन्हें उम्मीद थी कि ऐसा करने से कांग्रेस को हिंदू और मुस्लिम, दोनों का समर्थन मिलेगा। लेकिन दुर्भाग्य से 1989 के लोकसभा चुनाव में दोनों समुदायों के खासकर उस बड़े हिस्से ने कांग्रेस का साथ छोड़ दिया, जो अपनी धार्मिक पहचान को लेकर बहुत संवेदनशील थे।
शाह बानो मामले में सर्वोच्च न्यायालय के फैसले के खिलाफ जाकर राजीव गांधी ने जो कदम उठाया, उसकी प्रतिक्रिया में विश्व हिंदू परिषद ने अयोध्या आंदोलन को पुनर्जीवित किया। फरवरी, 1986 में अयोध्या में हिंदू श्रद्धालुओं के लिए विवादित पूजा स्थल का ताला खुलवाने वाली राजीव गांधी की सरकार ही थी। मुस्लिम समूह ने इसका विरोध किया। यानी शाह बानो मामले में सरकार के समर्पण पर हिंदू आक्रोश और अयोध्या के विवादित स्थल का ताला खुलवाने को लेकर मुस्लिम आक्रोश के कारण भारत सांप्रदायिक तनाव का मंच बन गया।
1989 के चुनाव में दो नावों की सवारी करने के चक्कर में ही कांग्रेस को सत्ता से बाहर होना पड़ा था। तब रूढ़िवादी मुसलमानों ने कांग्रेसी-विरोधी और गैर-भाजपाई पार्टियों का साथ दिया और कट्टर हिंदुओं ने भाजपा को वोट दिया। सांप्रदायिकता के मुद्दे पर आपके सामने दो ही विकल्प होते हैं-या तो आप किसी के साथ नहीं हैं या किसी समानधर्मा सांप्रदायिक सोच वाले समूह के साथ हैं। भाजपा ने फौरी तौर पर इस राजनीतिक समझ का परित्याग कर दिया है। वर्षों तक कट्टर हिंदुत्व के लाइन पर चलने के बाद उसने चुनाव से पहले इस मामले में अपना रुख नरम कर लिया है। इसके बावजूद पिछले एक सप्ताह में इसने श्रीराम सेना के प्रमुख प्रमोद मुतालिक और फिर साबिर अली को पार्टी में शामिल करने का चौंकाने वाला फैसला लिया, हालांकि इन्हें पार्टी में लाने का फैसला उसे भारी पड़ गया। मुतालिक 2009 की शुरुआत में तब चर्चा में आए थे, जब उन्होंने नैतिकता का ठेकेदार बनकर मंगलौर के एक पब में यह कहते हुए हिंसा की थी कि महिलाओं का सार्वजनिक रूप से शराब पीना हिंदू संस्कृति का अपमान है।
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साबिर अली का मामला बिल्कुल अलग है। एक निम्न मध्यवर्गीय परिवार में जन्मे साबिर 1990 में मुंबई के अंडरवर्ल्ड से जुड़े। एक पार्टी से दूसरी पार्टी में भटकते हुए गुलशन कुमार हत्याकांड के अभियुक्त के तौर पर उन्होंने कुछ साल जेल में भी गुजारे। 2010 में वह लोक जनशक्ति पार्टी के इकलौते राज्यसभा सदस्य थे, और उस दौरान लोकसभा टीवी के एक कार्यक्रम एकला चलो में, जिसकी एंकरिंग मैं करता था, मैंने उनका इंटरव्यू किया था। तब उन्होंने भाजपा या नरेंद्र मोदी के प्रति कोई लगाव नहीं दिखाया था। बल्कि तब उनकी राजनीतिक समझ भी परिपक्व नहीं थी। थोड़े दिनों बाद लोजपा छोड़कर वह जद (यू) से जुड़ गए, लेकिन आश्वासन के बावजूद राज्यसभा में न भेजे जाने के कारण उन्होंने वह पार्टी भी छोड़ दी। उसी के आसपास इस तरह की अफवाहें भी सुनने में आईं कि यासीन भटकल को एक बार साबिर अली के बांद्रा स्थित घर में देखा गया था।
भाजपा में नरेंद्र मोदी की स्वीकृति के बगैर पत्ता तक नहीं हिलता। इसलिए अनुमान यही है कि साबिर अली के मामले में हरी झंडी उन्होंने दिखाई और बाद में इसकी आलोचना होते देख वह पीछे हट गए। दोनों ही स्थितियों में साबिर अली को भाजपा में लाने के शुरुआती निर्णय के लिए पार्टी की राज्य शाखा पर उंगली उठती है। लेकिन भाजपा की राज्य शाखाएं दूसरी राजनीतिक पार्टियों की प्रांतीय शाखाओं की तरह स्वतंत्र नहीं हैं। इसलिए मोदी को इस मामले की जिम्मेदारी से मुक्त नहीं किया जा सकता। कट्टरवादी छवि के लिए कुख्यात प्रमोद मुतालिक को भाजपा में शामिल करने के पीछे हिंदू वोटों के ध्रुवीकरण की मंशा थी। इससे यह आशंका मजबूत हुई थी कि मोदी को विकास पुरुष बताने के बावजूद भाजपा कट्टर हिंदुत्व की लाइन छोड़ने को तैयार नहीं है।
साबिर अली का मामला मोदी की रणनीतिक चूक का भी खुलासा करता है-नए लोगों को पार्टी में शामिल करते हुए वह उनकी पृष्ठभूमियों की जांच नहीं करते। साबिर अली उन पैंसठ सांसदों में से थे, जिन्होंने 2012 में अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा को पत्र लिखकर अनुरोध किया था कि मोदी को अमेरिकी वीजा न दिया जाए। काले धंधे का पैसा और बाहुबल के अलावा भाजपा को देने के लिए उनके पास कुछ था भी नहीं।
प्रत्याशियों के चयन में लगातार गलती और नए लोगों को पार्टी में लाते हुए नीतिगत मुद्दों से समझौता बताता है कि मोदी लहर के बावजूद भाजपा पुराने तौर-तरीकों पर ही चल रही है। यह तब और भी आश्चर्यजनक है, जब आगामी चुनाव में वह सबसे मजबूत स्थिति में बताई जा रही है। उसने जिताऊ की जगह लोकप्रिय उम्मीदवार चुने हैं, जिनकी राजनीतिक पारी पांच साल से ज्यादा शायद ही होगी-इस मामले में दीपिका चिखलिया, धर्मेंद्र और नवजोत सिद्धू को याद किया जा सकता है। अपने पक्ष में हवा होने के बावजूद मोदी का चुनावी रथ अभी मंजिल से बहुत दूर है। ऐसे में अपनी जीत पक्की करने के लिए भाजपा हरसंभव तरीका इस्तेमाल कर रही है; मजहब को राजनीतिक औजार की तरह इस्तेमाल करने वाली सियासी पार्टी इस मोर्चे पर भी समझौता करती दिखाई दे रही है।
वरिष्ठ पत्रकार और ‘नरेंद्र मोदी-द मैन, द टाइम्स’ के लेखक
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शाह बानो मामले में सर्वोच्च न्यायालय के फैसले के खिलाफ जाकर राजीव गांधी ने जो कदम उठाया, उसकी प्रतिक्रिया में विश्व हिंदू परिषद ने अयोध्या आंदोलन को पुनर्जीवित किया। फरवरी, 1986 में अयोध्या में हिंदू श्रद्धालुओं के लिए विवादित पूजा स्थल का ताला खुलवाने वाली राजीव गांधी की सरकार ही थी। मुस्लिम समूह ने इसका विरोध किया। यानी शाह बानो मामले में सरकार के समर्पण पर हिंदू आक्रोश और अयोध्या के विवादित स्थल का ताला खुलवाने को लेकर मुस्लिम आक्रोश के कारण भारत सांप्रदायिक तनाव का मंच बन गया।
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1989 के चुनाव में दो नावों की सवारी करने के चक्कर में ही कांग्रेस को सत्ता से बाहर होना पड़ा था। तब रूढ़िवादी मुसलमानों ने कांग्रेसी-विरोधी और गैर-भाजपाई पार्टियों का साथ दिया और कट्टर हिंदुओं ने भाजपा को वोट दिया। सांप्रदायिकता के मुद्दे पर आपके सामने दो ही विकल्प होते हैं-या तो आप किसी के साथ नहीं हैं या किसी समानधर्मा सांप्रदायिक सोच वाले समूह के साथ हैं। भाजपा ने फौरी तौर पर इस राजनीतिक समझ का परित्याग कर दिया है। वर्षों तक कट्टर हिंदुत्व के लाइन पर चलने के बाद उसने चुनाव से पहले इस मामले में अपना रुख नरम कर लिया है। इसके बावजूद पिछले एक सप्ताह में इसने श्रीराम सेना के प्रमुख प्रमोद मुतालिक और फिर साबिर अली को पार्टी में शामिल करने का चौंकाने वाला फैसला लिया, हालांकि इन्हें पार्टी में लाने का फैसला उसे भारी पड़ गया। मुतालिक 2009 की शुरुआत में तब चर्चा में आए थे, जब उन्होंने नैतिकता का ठेकेदार बनकर मंगलौर के एक पब में यह कहते हुए हिंसा की थी कि महिलाओं का सार्वजनिक रूप से शराब पीना हिंदू संस्कृति का अपमान है।
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साबिर अली का मामला बिल्कुल अलग है। एक निम्न मध्यवर्गीय परिवार में जन्मे साबिर 1990 में मुंबई के अंडरवर्ल्ड से जुड़े। एक पार्टी से दूसरी पार्टी में भटकते हुए गुलशन कुमार हत्याकांड के अभियुक्त के तौर पर उन्होंने कुछ साल जेल में भी गुजारे। 2010 में वह लोक जनशक्ति पार्टी के इकलौते राज्यसभा सदस्य थे, और उस दौरान लोकसभा टीवी के एक कार्यक्रम एकला चलो में, जिसकी एंकरिंग मैं करता था, मैंने उनका इंटरव्यू किया था। तब उन्होंने भाजपा या नरेंद्र मोदी के प्रति कोई लगाव नहीं दिखाया था। बल्कि तब उनकी राजनीतिक समझ भी परिपक्व नहीं थी। थोड़े दिनों बाद लोजपा छोड़कर वह जद (यू) से जुड़ गए, लेकिन आश्वासन के बावजूद राज्यसभा में न भेजे जाने के कारण उन्होंने वह पार्टी भी छोड़ दी। उसी के आसपास इस तरह की अफवाहें भी सुनने में आईं कि यासीन भटकल को एक बार साबिर अली के बांद्रा स्थित घर में देखा गया था।
भाजपा में नरेंद्र मोदी की स्वीकृति के बगैर पत्ता तक नहीं हिलता। इसलिए अनुमान यही है कि साबिर अली के मामले में हरी झंडी उन्होंने दिखाई और बाद में इसकी आलोचना होते देख वह पीछे हट गए। दोनों ही स्थितियों में साबिर अली को भाजपा में लाने के शुरुआती निर्णय के लिए पार्टी की राज्य शाखा पर उंगली उठती है। लेकिन भाजपा की राज्य शाखाएं दूसरी राजनीतिक पार्टियों की प्रांतीय शाखाओं की तरह स्वतंत्र नहीं हैं। इसलिए मोदी को इस मामले की जिम्मेदारी से मुक्त नहीं किया जा सकता। कट्टरवादी छवि के लिए कुख्यात प्रमोद मुतालिक को भाजपा में शामिल करने के पीछे हिंदू वोटों के ध्रुवीकरण की मंशा थी। इससे यह आशंका मजबूत हुई थी कि मोदी को विकास पुरुष बताने के बावजूद भाजपा कट्टर हिंदुत्व की लाइन छोड़ने को तैयार नहीं है।
साबिर अली का मामला मोदी की रणनीतिक चूक का भी खुलासा करता है-नए लोगों को पार्टी में शामिल करते हुए वह उनकी पृष्ठभूमियों की जांच नहीं करते। साबिर अली उन पैंसठ सांसदों में से थे, जिन्होंने 2012 में अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा को पत्र लिखकर अनुरोध किया था कि मोदी को अमेरिकी वीजा न दिया जाए। काले धंधे का पैसा और बाहुबल के अलावा भाजपा को देने के लिए उनके पास कुछ था भी नहीं।
प्रत्याशियों के चयन में लगातार गलती और नए लोगों को पार्टी में लाते हुए नीतिगत मुद्दों से समझौता बताता है कि मोदी लहर के बावजूद भाजपा पुराने तौर-तरीकों पर ही चल रही है। यह तब और भी आश्चर्यजनक है, जब आगामी चुनाव में वह सबसे मजबूत स्थिति में बताई जा रही है। उसने जिताऊ की जगह लोकप्रिय उम्मीदवार चुने हैं, जिनकी राजनीतिक पारी पांच साल से ज्यादा शायद ही होगी-इस मामले में दीपिका चिखलिया, धर्मेंद्र और नवजोत सिद्धू को याद किया जा सकता है। अपने पक्ष में हवा होने के बावजूद मोदी का चुनावी रथ अभी मंजिल से बहुत दूर है। ऐसे में अपनी जीत पक्की करने के लिए भाजपा हरसंभव तरीका इस्तेमाल कर रही है; मजहब को राजनीतिक औजार की तरह इस्तेमाल करने वाली सियासी पार्टी इस मोर्चे पर भी समझौता करती दिखाई दे रही है।
वरिष्ठ पत्रकार और ‘नरेंद्र मोदी-द मैन, द टाइम्स’ के लेखक