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राष्ट्रीय राजनीति के राजमार्ग पर

Mon, 10 Jun 2013 10:53 AM IST
जगदीश उपासने
जगदीश उपासने Updated Mon, 10 Jun 2013 10:53 AM IST
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modi now begins his 7 race course road yatra

फरवरी में प्रयाग के महाकुंभ में एक व्यापक सर्वेक्षण कर लौटे देश के एक प्रमुख विश्वविद्यालय के सर्वेक्षणकर्ता इस तथ्य से आश्चर्यचकित थे कि 20,000 उत्तरदाताओं में से अधिकांश ने देश की समस्याओं के हल के लिए सर्वाधिक उपयुक्त नेता के बतौर नरेंद्र मोदी का नाम लिया, जबकि प्रश्नावली में ऐसा कोई सवाल नहीं था।

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लेकिन यूपीए के पिछले नौ साल के राज से हलकान लोग समस्याएं तो गिना ही रहे थे, साथ में उनके निवारण के लिए अपनी पसंद के नेता का नाम भी सुझा रहे थे।

यहां तक कि सर्वेक्षक को दूर ले जाकर अपने पति की शराब पीने की लत के बारे में फुसफुसाहट में बताने वाली उत्तर प्रदेश के धुर ग्रामीण अंचल की एक अनपढ़ महिला भी देश की समस्याओं के हल के लिए ‘मोदी’ का नाम ले रही थी, जिनके बारे में उसने सूरत में काम करने वाले अपने एक रिश्तेदार से सुना था।
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देश भर से उठे इन स्वरों को भाजपा अब तक अनसुना कर रही थी, पर गोवा में कार्यसमिति की बैठक के आखिरी दिन पार्टी अध्यक्ष राजनाथ सिंह को 2014 के लोकसभा चुनाव के लिए मोदी को केंद्रीय चुनाव समिति का अध्यक्ष नियुक्त करने का ऐलान करना पड़ा।
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यह महज भाजपा के एक और फोरम के मुखिया के नाम की घोषणा भर नहीं है। यह पार्टी के अनिर्णय और गड़बड़झाले के दौर से बाहर निकलने, हर फैसले के लिए दिग्गजों का मुंह ताकने, अंदरूनी नाराजगियों-असहमतियों के बेसुरे राग से फैसले बदलने या टालने के लंबे दौर से उबरने की शुरुआत है।

मजा देखिए कि यह शुरुआत उन्हीं राजनाथ सिंह के कार्यकाल में हुई, जिनका पिछला कार्यकाल आलाकमान के इशारे समझने में खर्च हो गया था। यह राष्ट्रीय राजनीति के राजमार्ग पर ‘छह करोड़ गुजरातियों’ के एकछत्र नेता के सफर की धमाकेदार शुरुआत है।

पार्टी अध्यक्ष ने अपनी घोषणा के साथ एक और बात जोड़ी। उन्होंने कहा कि ‘यह सर्वसम्मत निर्णय है।’ गोवा से लेकर दिल्ली में कार्यसमिति की बैठक की तैयारी के शुरुआती दिन से जो कुछ चलता रहा, उसके मद्देनजर सर्वसम्मति का यह पुछल्ला ज्यादा अहमियत रखता है।

इसका मतलब है कि बीमारी के कारण पहली बार कार्यसमिति बैठक से गैरहाजिर रहकर असहमति का एहसास कराने वाले पार्टी के पितृपुरुष लालकृष्ण आडवाणी को किसी समझौता फॉर्मूला के बिना इस निर्णय का भागीदार बना लिया गया। या फिर यह पार्टी के बहुसंख्यक तबके और संघ परिवार तथा भाजपा के समर्थक वर्ग के जबर्दस्त दबाव में इस नेता का अग्रिम मोर्चे से ससम्मान पीछे हटना है?

पार्टी ने दूसरी, समांतर चुनाव प्रबंधन समिति बनाने का आडवाणी का वह कथित प्रस्ताव स्वीकार नहीं किया, जिसे मोदी को दी जाने वाली जिम्मेदारी के मामले में सावधानी बरतने की आडवाणी की चेतावनी कहा गया।

उनकी ‘चेतावनी’ को उनकी व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा से जोड़ दिया गया, और उनके समर्थक समझे जाने वाले नेताओं ने मानो योजनाबद्ध ढंग से गैरहाजिर रहकर इसे और मजबूत किया।

यह दिग्गज नेता और उनके पदचिह्नों पर चलने वाले दूसरे नेता असहमति ज्यादा सौजन्यतापूर्वक जताते, तो पार्टी नेताओं-कार्यकर्ताओं और भाजपा के समर्थक मतदाता वर्ग में संभ्रम की स्थिति नहीं पैदा होती।

और हतबल हो चुकी कांग्रेस की तीसरी-चौथी पंक्ति के जड़विहीन नेताओं को उसका मजाक बनाने का मौका नहीं मिलता। असहमति जताने के इस तरीके से मोदी और उनका समर्थक वर्ग, जो अन्यथा इतना उतावला नहीं होता, अधिक आक्रामक और मजबूत हुआ।

मोदी की विकास गाथा पर नजर डालें, तो पाएंगे कि उनका व्यक्तिगत और पार्टीगत विरोध जितना तेज हुआ, मोदी उतने ही मजबूत होते चले गए।

गोधरा कांड के बाद गुजरात दंगों को लेकर देश-दुनिया में मोदी को निशाना बनाकर छेड़े गए घृणा-अभियान के जवाब में ‘छह करोड़ गुजरातियों के अपमान’ का मोदी का मुद्दा उनके लिए चुनावों में लगातार वोट और सीटों में इजाफा करता गया, जिसे उन्होंने सुशासन, अनवरत विकास तथा समस्याओं के कल्पनाशील हल ढूंढने के साथ और पुख्ता बनाया।

मोदी से असहमत, उनके विरोधी समझे जाने वाले नेता-कार्यकर्ता धीरे-धीरे किनारे हो गए और उनके समर्थन में कोई आंसू तक नहीं छलका। यह सिर्फ सियासी तिकड़मों से मुमकिन नहीं है।

लोकप्रियता के साथ जमीनी स्तर पर ठोस प्रदर्शन, तर्क और भावना के शानदार मिश्रण वाली वक्तृता और थोड़ी राजनीतिक दूरंदेशी किसी   नेता को कहां से कहां पहुंचा सकती है, इसकी भारतीय राजनीति में मिसालें कम ही मिलती हैं।

भाजपा के लिए यह संक्रमण महज दूसरी पीढ़ी के नेता को कमान सौंपना भर नहीं है, यह युवा भारत की उम्मीदों-आकांक्षाओं के साथ कदमताल भी है, जिसकी पार्टी को ज्यादा जरूरत है। राज्यों में दूसरी पांत के नेता, उसके कामयाब मुख्यमंत्री अरसे से इस जरूरत की मुनादी कर रहे थे, जिसे सुनने का साहस पार्टी अब जुटा सकी।

कांग्रेस राहुल गांधी को उपाध्यक्ष बनाकर इसकी शुरुआत काफी पहले कर चुकी है। भाजपा में खुद आडवाणी ने लोकसभा तथा राज्यसभा में दूसरी पांत के नेताओं को नेता पद की कमान सौंपकर ऐसा ही किया। ऐसे में मोदी की तैनाती से असहमति टिकने वाली नहीं थी, और टिकी भी नहीं।


भाजपा और मोदी ने एक अहम पड़ाव पार किया है। आडवाणी का आशीर्वाद उन्हें मिल गया है, पर एनडीए का उम्मीदवार होना अभी दूर की कौड़ी है। लेकिन भाजपा यदि साहसी फैसलों का यह सफर गोवा से भी आगे, दिल्ली तक ले जा सकी, तो जैसा राजनाथ सिंह कह रहे हैं, यह ‘पार्टी की विजय-पथ पर यात्रा’ साबित हो सकती है।

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