फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Columns ›   Opinion ›   Modi government has got success on internal security front

आंतरिक सुरक्षा के मोर्चे पर मोदी सरकार को मिली है बड़ी कामयाबी

Tue, 17 Nov 2020 06:55 AM IST
वरुण गांधी वरुण गांधी
वरुण गांधी Published by: वरुण गांधी Updated Tue, 17 Nov 2020 06:55 AM IST
विज्ञापन

एक हफ्ते पहले मोस्ट वांटेड आतंकवादियों में से एक हिज्बुल मुजाहिदीन के सरगना डॉ. सैफुल्लाह को श्रीनगर के पास मार गिराया गया। वर्ष 2014 से सक्रिय यह आतंकी बुरहान वानी का नजदीकी था। इस साल जम्मू-कश्मीर में सरकार द्वारा निर्देशित और सेना की मदद से हुई मुठभेड़ स्थानीय पुलिस की कामयाबी को दर्शाती है, जिसमें 200 से अधिक आतंकवादियों का खात्मा किया जा चुका है। ऐसी खबरें अनुच्छेद 370 को निरस्त करने के बाद राज्य की नई हकीकत और मजबूत आंतरिक सुरक्षा को दर्शाती हैं।


loader

वर्ष 2016 के बाद देश के नागरिक क्षेत्रों में (कश्मीर को छोड़कर) कोई बड़ा आतंकी हमला नहीं हुआ है। पाकिस्तानी हैंडलर्स ने इसके बजाय सैन्य प्रतिष्ठानों (जैसे उरी और पठानकोट में हमले) पर ध्यान केंद्रित किया। इस बीच, एनआईए ने दिसंबर, 2019 में इस्लामिक स्टेट की भारतीय इकाई (अल-हिंद) के 17 से अधिक सदस्यों को गिरफ्तार किया-वे कर्नाटक, तमिलनाडु और केरल के जंगलों में एक प्रांत स्थापित करने की साजिश रच रहे थे; उन्होंने कर्नाटक के कोलार और कोडगु के साथ महाराष्ट्र के रत्नागिरी और पश्चिम बंगाल के सिलीगुड़ी में छिपने के ठिकाने बनाए थे। आंतरिक सुरक्षा के मोर्चे पर ऐसी सफलताओं पर अक्सर ध्यान नहीं दिया जाता, पर ये हमारे राष्ट्र निर्माण के कार्य में महत्वपूर्ण बनी रहती हैं।

पिछले एक दशक में नक्सली हमलों में भी लगातार गिरावट आई है। 1946 में तेलंगाना में शुरू हुए किसान आंदोलन को 1967 में तब गति मिली, जब पश्चिम बंगाल के नक्सलबाड़ी गांव में किसानों और भूमिहीन मजदूरों ने आदिवासियों के साथ मिलकर जमींदारों के अनाज के गोदामों पर छापे का आह्वान किया। 1980 के दशक में मध्य प्रदेश में तत्कालीन छत्तीसगढ़ क्षेत्र के करीब 18 जिलों में नक्सलियों की गतिविधियां चल रही थीं और बस्तर क्षेत्र (जिसमें अन्य जिलों के अलावा दंतेवाड़ा, बीजापुर, बस्तर, कांकेर शामिल हैं) आंदोलन का केंद्र बन गया था। वर्ष 2003 तक वे आंध्र प्रदेश में तत्कालीन मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू पर हमले के साथ ज्यादा दुस्साहसी भी हो रहे थे। वर्ष 2004 में तमाम अतिवादी वाम गुटों के विलय से बनी भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) के माध्यम से देश के 200 से अधिक जिलों में आंदोलन का विस्तार हुआ। एक रिपोर्ट के अनुसार, 2011 में इसके पास अनुमानित 2,500 करोड़ रुपये का फंड था। जैसा कि 2006 में तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने कहा था कि माओवादी आंदोलन 'सबसे बड़ी आंतरिक सुरक्षा चुनौती' है। हालांकि अब प्रमुख राज्यों में इसकी उपस्थिति तेजी से घटी है।

आंध्र प्रदेश में केंद्रीय गृह मंत्रालय की दृष्टि और अतिरिक्त संसाधनों के संयोजन के साथ स्थानीय पुलिस कार्रवाई और लक्षित सामाजिक-आर्थिक अभियानों ने आंदोलन का खात्मा करने में मदद की है। छत्तीसगढ़ में सड़क संपर्क के लिए खासतौर से सुकमा, बीजापुर और जगदलपुर जिलों में केंद्र की पुरजोर कोशिशों ने राज्य के दक्षिणी जिलों में नक्सली गतिविधियों को रोकने (हालांकि खासकर दंतेवाड़ा में हमले जारी हैं) में मदद की है। झारखंड ने 2005 और 2010 के बीच हिंसा का दौर देखा, जिसमें 20 से अधिक जिले प्रभावित हुए थे। राज्य सरकार ने शांति वार्ता शुरू करने की कोशिश की थी, जो अंततः विफल रही। वर्ष 2011 में सरकार द्वारा चलाया ऑपरेशन एनाकोंडा सारंडा में नक्सली मौजूदगी को खत्म करने में सफल रहा; फिर 2014 से विद्रोह-विरोधी अभियान की शृंखला की शुरुआत की गई, जिससे 2018 तक माओवादी हिंसा में भारी गिरावट आई। 

पश्चिम बंगाल सरकार ने भी केंद्र के मार्गदर्शन में विद्रोही नेताओं को निशाना बनाने के लिए एक विशिष्ट पुलिस दल पर ध्यान केंद्रित करने के अलावा आत्मसमर्पण और पुनर्वास पैकेज के साथ विद्रोह के खात्मे के लिए नई रणनीति बनाई है। जबकि पुरुलिया, पश्चिम मिदनापुर और बांकुड़ा जैसे जिलों में भरोसा कायम करने के उपाय किए गए। इस सबसे पिछले पांच साल में नक्सली घटनाओं में काफी कमी आई है और सिर्फ एक जिला झारग्राम ही प्रभावित है। ओडिशा और बिहार में भी नक्सली घटनाओं में कमी आई है। अब प्रभावित राज्यों के बीच एक त्रिकोणीय सीमावर्ती क्षेत्र में (पहले वर्गीकृत किए 106 जिलों में से) फैले केवल 30 जिलों तक हिंसा सीमित है और 44 जिलों में वामपंथी उग्रवादियों की मामूली मौजूदगी है या कोई मौजूदगी नहीं है।

देश भर में वामपंथी हिंसा में लगातार गिरावट आ रही है और केंद्र सरकार ऐसे क्षेत्रों में विकास योजनाओं को तेजी से आगे बढ़ा रही है। इस बदलाव का श्रेय काफी हद तक केंद्र की संजीदगी को जाता है, जिसके तहत ज्यादा संसाधनों की ज्यादा उपलब्धता महत्वपूर्ण है। गृह मंत्रालय की वार्षिक रिपोर्ट, 2018 बताती है कि सुरक्षा और वित्तीय सहायता के लिए अर्धसैनिक बलों की करीब 532 कंपनियों को ऐसे राज्यों में तैनात किया गया है; गृह मंत्री की निगरानी में एक व्यापक सामरिक रणनीतिक दिशा के साथ, और विशेष विकास योजनाओं की शुरुआत (जैसे कि विशेष केंद्रीय सहायता करीब 35 जिलों को प्रदान की गई)। हमलों की आशंका हालांकि बनी हुई है, पर यह आंदोलन अब बड़ा खतरा नहीं है। पूर्वोत्तर में भी पिछले एक साल में उग्रवादी घटनाओं में 12 फीसदी की गिरावट आई है। 

असम, अरुणाचल प्रदेश व नगालैंड के बीच एक त्रिकोणीय क्षेत्र तक हिंसा सीमित रहने के साथ उग्रवाद घटा है। एनडीएफबी (नेशनल डेमोक्रेटिक फ्रंट ऑफ बोडोलैंड), एबीएसयू (ऑल बोडो स्टुडेंट्स यूनियन), असम की राज्य सरकार और केंद्र के बीच समझौता एक स्वागतयोग्य कदम है। एनएससीएन (आईएम) के साथ ही नगाओं के राजनीतिक गुटों से सरकार के निरंतर संपर्क से भी सकारात्मक नतीजे आने की उम्मीद है। अब पूर्वोत्तर में बड़ी संख्या में विकास परियोजनाएं चल रही हैं, जबकि सेना की टुकड़ियों को तेजी से बैरकों (जैसे, कार्बी आंगलोंग में) में वापस भेजा जा रहा है। ऐसी पहल से पूर्वोत्तर का शेष भारत के साथ एकीकरण बेहतर हुआ है। मोदी सरकार के नेतृत्व में पिछले कुछ साल देश की आंतरिक सुरक्षा को बेहतर बनाने के लिए बहुत अच्छे रहे हैं।

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

Next Article

Followed