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मोदी का जादू बरकरार

Sat, 26 May 2018 05:13 PM IST
manisha priyam मनीषा प्रियम
Updated Sat, 26 May 2018 05:13 PM IST
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modi government four years and achievement after 2014
- फोटो : amar ujala

परिवर्तन की मशाल जलाकर करोड़ों उम्मीदों का बोझ लिए आज से ठीक चार साल पहले 26 मई, 2014 को नरेंद्र मोदी ने राष्ट्रपति भवन के प्रांगण में प्रधानमंत्री पद की शपथ ली थी। 


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परिवर्तन की मशाल जलाकर करोड़ों उम्मीदों का बोझ लिए आज से ठीक चार साल पहले 26 मई, 2014 को नरेंद्र मोदी ने राष्ट्रपति भवन के प्रांगण में प्रधानमंत्री पद की शपथ ली थी। 

भारतीय जनता पार्टी ने लोकसभा चुनाव में ऐतिहासिक जीत दर्ज की थी। यह जीत ऐतिहासिक इस लिहाज से भी थी कि उससे पूर्व जनसंघ और बाद में भाजपा गठबंधन सरकार का हिस्सा जरूर बनी थी, लेकिन अपने दम पर अकेले सरकार में आना किसी भी गैर कांग्रेसी पार्टी के लिए मील का पत्थर था।

नब्बे के दशक में उदारीकरण और वैश्वीकरण के बाद भारतीय राजनीति में विभिन्न राज्यों के मुख्यमंत्रियों की विकासवादी छवि मजबूत हुई। इनमें बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार, ओडिशा के नवीन पटनायक, आंध्र प्रदेश के चंद्रबाबू नायडू और गुजरात के नरेंद्र मोदी सबसे आगे रहे। 

ऐसा लगने लगा कि आगे की राजनीतिक प्रतिस्पर्धा में राज्य स्तरीय नेता जल्द ही केंद्रीय भूमिका में जरूर नजर आएंगे। लेकिन यह भूमिका गठबंधन के भरोसे ही संभव हो सकी। मगर गुजरात के चर्चित व विवादित मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने नाम और काम के बल पर जब तीसरी बार 2012 के विधानसभा चुनाव में जीत हासिल की, तभी से उनकी केंद्रीय राजनीति में प्रवेश की आहट सुनाई देने लगी थी। 

उस वक्त भाजपा की ओर से प्रधानमंत्री पद के प्रबल दावेदार लालकृष्ण आडवाणी को किनारे कर भाजपा ने जिस दिन नरेंद्र मोदी को आगे किया, इतिहास वहीं से बनने लगा था। नरेंद्र मोदी ने देशव्यापी सैकड़ों चुनावी रैलियों को जिस स्थानीयता से संबोधित किया, वह अपने आप में अभूतपूर्व रहा। नरेंद्र मोदी का शायद ही कोई कार्यक्रम उस दौरन रद्द किया गया हो।

प्रधानमंत्री बनने के बाद मोदी ने योजना आयोग को खत्म करके उसके स्थान पर नीति आयोग के गठन का पहला बड़ा फैसला लिया। 

कोलंबिया विश्वविद्यालय के विख्यात अर्थशास्त्री अरविंद पनगढ़िया को इस आयोग का उपाध्यक्ष बनाए जाने पर उम्मीद की गई कि वह नीतिगत फैसलों में तेजी लाएंगे। स्मृति ईरानी और निर्मला सीतारमण जैसे विश्वस्त नेताओं को राज्यसभा के जरिये मंत्रिमंडल में लाया गया।

'न खाऊंगा और न खाने दूंगा'

'न खाऊंगा और न खाने दूंगा', जैसे बयानों से भ्रष्टाचार के विरोध में बिगुल फूंकने जैसी स्थिति बनाई गई। कुल मिलाकर देश की राजनीति में भाजपाई हलचल लगातार बरकरार रही। यह हलचल उस वक्त शिखर पर पहुंच गई, जब आठ नवंबर, 2016 को प्रधानमंत्री मोदी ने विमुद्रीकरण के रूप में अब तक का अपना सबसे बड़ा फैसला लिया। टेलीविजन पर देश को संबोधित करते हुए मोदी ने काले धन के खात्मे के लिए इस आपातकालीन फैसले की जानकारी दी। हालांकि उसके बाद एटीएम और बैंकों में जो तस्वीरें उभरीं उसे कोई याद नहीं करना चाहेगा।

यद्यपि देश के शीर्ष अर्थशास्त्रियों ने इस फैसले का विरोध यह कहकर किया कि भारत जैसे देश में असंगठित क्षेत्र के श्रमिकों पर नोटबंदी का सबसे बुरा असर पड़ेगा। रिजर्व बैंक के पूर्व गवर्नर रघुराम राजन और पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह उस फैसले के सबसे बड़े आलोचकों में से रहे। मगर इन आलोचनाओं से इतर मोदी के फैसले पर मुहर लगी उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव में, जब राजनीतिक रूप से देश के सबसे बड़े और महत्वपूर्ण राज्य की जनता ने भाजपा को ऐतिहासिक जनमत प्रदान किया। मतलब नोटबंदी की समस्याएं एक तरफ, मोदी पर भरोसा एक तरफ और मोदी का पलड़ा भारी।

घरेलू राजनीति के बीच मोदी की विदेश नीति खासी चर्चित रही। अलबत्ता मुख्यमंत्री रहते हुए जिन मोदी को कई देशों में प्रवेश तक की अनुमति नहीं थी, उन्हीं देशों ने बाहें फैलाकर उनका स्वागत किया। अमेरिका-इंग्लैंड समेत कई देशों में रहने वाले भारतीय मूल के प्रवासियों ने मोदी को आश्चर्यजनक तवज्जो दी।

हालांकि चीन जैसे पड़ोसी से भारत के रिश्ते कभी नर्म, तो कभी गर्म रहे। वन बेल्ट-वन रोड व दोकलम जैसे मुद्दों पर भारत-चीन के बीच खासी तल्खी देखने को मिली। लेकिन अमेरिका के साथ बदलते रिश्तों में चीन को फिर से भारत की ओर देखना पड़ा और उसी का परिणाम रही वुहान में मोदी-जिनपिंग की मुलाकात।

ब्रांड मोदी की सफलता

भारतीय राज्यों में भाजपा का निरंतर बढ़ता दबदबा और विदेशी मुल्कों में भारत की अच्छी छवि निर्विवाद रूप से ब्रांड मोदी की सफलता है। हालांकि गुजरात और कर्नाटक चुनावों में भाजपा ने वह प्रदर्शन नहीं किया, जिसकी उम्मीद प्रधानमंत्री को रही होगी। इन राज्यों के चुनाव नतीजों के पीछे मोदी सरकार के दूसरे बड़े फैसले- जीएसटी का बड़ा हाथ है। व्यापारियों में जीएसटी को लेकर स्पष्ट गुस्सा दिखा। खास बात यह कि आज भी जीएसटी को लेकर कई शंकाएं बरकरार हैं।

विभिन्न उपचुनावों में भाजपा की विफलताओं के बावजूद इस बात को नजर अंदाज नहीं किया जा सकता कि मोदी का जादू बरकरार है। भारतीय जनमानस पर ऐसा जादू इंदिरा गांधी का ही था। दुर्भाग्य ही है कि इंदिरा गांधी सरकार ने जिस तरह प्रेस और सांविधानिक संस्थानों के कामकाज को प्रभावित करने की कोशिश की थी, कुछ-कुछ वैसा ही मौजूदा सरकार में भी प्रतीत होता है। लोकतंत्र में मुक्त कंठ की आलोचना और उसे सुनने के धैर्य की जगह हमेशा होनी चाहिए। यही लोकतंत्र की नींव है।

अब तक लगभग सब कुछ अच्छा बीतने के बाद मोदी सरकार के लिए निश्चित रूप से चुनौतियां बढ़ने वाली हैं। डीजल-पेट्रोल की बढ़ती कीमतें मोदी सरकार के लिए कितनी मुश्किलें पैदा कर सकती हैं, यह तो आने वाले दिन में ही पता चलेगा। 2019 के चुनावी साल में उत्तर प्रदेश में आयोजित होने वाले कुंभ की भारतीय राजनीति में कितनी भूमिका होगी, यह भी देखने की बात होगी। वैसे भी ध्रुवीकरण के मुद्दों को भारतीय जनता पार्टी ने हमेशा हाथों-हाथ लिया है।
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