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2014 से ज्यादा इस चुनाव में अधिक काम कर रहा है मोदी रसायन

Thu, 02 May 2019 05:44 AM IST
sudheesh pachauri सुधीश पचौरी
Updated Thu, 02 May 2019 05:44 AM IST
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More than 2014, this election is more working on Modi chemistry
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी - फोटो : अमर उजाला

मोदी को लेकर दो तरह की राजनीतिक कहानियां कही जा रही हैं। एक मोदी को हराने वाली कहानी दूसरी मोदी के दुर्जेय होने की कहानी! मोदी हार रहे हैं, ऐसा कहने वालों का कहना है कि पांच साल में भाजपा के शासन से नाना कारणों से तंग आए लोग इस बार मोदी को हराने वाले हैं। वे कहते हैं कि 2019 का बरस 2014 वाला नहीं है, तब कांग्रेस का भ्रष्टाचार टारगेट पर था और ‘अच्छे दिन आएंगे’ का वायदा था, लोग झांसे में आ गए, लेकिन अब मोदी की लफ्फाजी की कलई खुल चुकी है, काठ की हांडी एक बार ही चढ़ती है।


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कुछ आंकड़ानवीस बताते हैं कि मोदी भले खूब लोकप्रिय हों, लेकिन उनके सांसदों पर लोगों का भरोसा नहीं है, इसलिए मोदी की लोकप्रियता के बावजूद वोट भाजपा सांसद को मिले यह जरूरी नहीं। इसी आधार पर आंकड़ानवीस कहते हैं कि इस बार भाजपा को न्यूनतम 'छिहत्तर' या ‘छियानबे’ या ‘एक सौ छब्बीस’ और अधिक से अधिक ‘पौने दो सौ सीटें’ ही मिल पा रही हैं, जबकि कांग्रेस सर्वाधिक सवा दो सौ से लेकर डेड़ सौ सीट तो जीत ही रही है।

कुछ ‘गणित विशेषज्ञ’ राज्यों में बने गठबंधनों के ‘वोट-गणित’ के हिसाब से बताते हैं कि इतने वोट सपा के इतने बसपा के बराबर इतने गठबंधन के यानी कि यूपी में भाजपा गई समझो। हर राज्य में स्थानीय क्षत्रप अपनी ताकत बनाए रखने के लिए अस्थायी गठबंधन बनाकर अपने वोट एक दूसरे को ट्रांसफर कर मुख्य स्पर्धी यानी भाजपा को हराना चाहते हैं। और अपनी जीती सीटों के हिसाब से चुनाव के बाद हिसाब-किताब करना चाहते हैं।

मोदी के आलोचक दो तरह के हैं। एक राजनीतिक आलोचक दूसरे जेनेटिकल आलोचक! इनमें ‘वामपंथी’ ‘सेकुलर’ ‘उदार’ बुद्धिजीवी हैं जो चुनाव चर्चाओं से लेकर सोशल मीडिया में मोदी को किसी हाल में जीतते नहीं देख सकते। उनके मुताबिक पिछले पांच साल के शासन में मुस्लिम अल्पसंख्यकों की टारगेटिंग, सरकारी संस्थानों की स्वायत्तता का हनन और घृणावादी राजनीति के कारण समाज में होता तीखा धार्मिक ध्रुवीकरण, समाज में बढ़ती घृणा और बैर भाव ऐसी राजनीतिक हरकतें हैं, जो आजादी के बाद बने ‘आइडिया ऑफ इंडिया’ को बहुमतवादी इंडिया में बदलने की साजिश रचती हैं। राष्ट्रवाद, देशप्रेम, सर्जिकल स्ट्राइकें, घर में घुसकर मारा आदि नारे असली समस्याओं जैसे बेरोजगारी और किसानों की परेशानियों को भुलाने के लिए हैं। नोटबंदी से लेकर जीएसटी ने छोटे किसानों मजदूरों, फैक्टरीवालों और दुकानदारों को तबाह कर दिया है। अल्पसंख्यक, दलित, उदार शहरी और किसान, मजदूर, बेरोजगार नौजवान नाराज हैं, इसलिए भी ये जीतने वाले नहीं है!

अब हम जरा मोदी के जिताने वाली कहानी की बात करेंः मोदी पक्ष मानता है कि विपक्ष के पास न एक निश्चित पीएम चेहरा है, न कोई अखिल भारतीय गठबंधन है, न केंद्रीय कमान सिस्टम है।
रही वोट के गणितीय प्रमेय की बात तो हमारा मानना है कि दो जमा दो बराबर चार की तरह लोग व्यवहार नहीं करते। फिर जातिगत अस्मिताओं के गणित सतत गतिशील यानी अवसरवादी होते हैं। और, अपने चुनावों में सिर्फ गणित ही नहीं, केमेस्ट्री भी काम किया करती है। मोदी का समर्थक हुए बिना भी हम इसे ‘मोदी रसायन’ कह सकते हैं। इस चुनाव में यह रसायन पिछले चुनाव से कुछ अधिक काम कर रहा है। इसे हम एक टीवी विज्ञापन की तीन लाइनों से समझ सकते हैंः एक मामूली आदमी अपने मित्र से पूछता है कि इस बार कौन जीतेगा? जवाब में मित्र कहता है, ‘देशभक्ति जीतेगी’ तो पूछने वाला मुस्कुराकर कहता हैः अच्छा तो मोदी जीतेगा! फिर कैच लाइन आती है, फिर एक बार मोदी सरकार!

पिछले पांच साल में मीडिया में जिस अनुपात में मोदी देशभक्ति, राष्ट्रवाद, ताकत, मजबूती और मजबूत सरकार के प्रतीक बने और बनाए गए हैं, उसी अनुपात में विपक्ष देशविरोधी, राष्ट्रविरोधी और टुकड़े-टुकड़े गैंग का प्रतीक बनाया गया है। यह धार्मिक ध्रुवीकरण से अलग राजनीतिक ध्रुवीकरण है। मोदी माने एकता, अखंडता, मजबूती! मोदी माने छप्पन इंच का सीना, ताकत, सुरक्षा, सर्जिकल स्ट्राइक, घर में घुस के मारा, मोदी की सेना यानी मोदी ने मारा यानी सुरक्षा की गारंटी।

‘मोदी रसायन’ इसी तरह की ‘सांस्कृतिक राजनीति’ से बनने वाले ‘भावनात्मक रसों’ से बना है। इसके साथ जोड़िए पांच साल में मोदी द्वारा टारगेटेड समूहों के लिए चलाई गई हितकारी योजनाएं जैसे जनधन योजना, मुद्रा लोन योजना, उज्वला योजना, घर तथा टॉयलेट योजना तथा हर चार महीने में दो हजार रुपये गरीब किसान तक पहुंचाना और आयुष्मान योजना आदि इत्यादि। ऐसी योजनाओं के लाभ उठाने वाले लोगों का आंकड़ा हमारे हिसाब से करीब बीस करोड़ बैठता है, इसमें आप भाजपा के सदस्यों की संख्या दस करोड़ को मिला दें, तो यह तीस करोड़ हो जाती है। अगर इनमें से बीस फीसदी डिफाल्टर निकाल दें, तो भी पच्चीस करोड़ के करीब लोग भाजपा की योजनाओं के सीधे लाभार्थी कहे जा सकते हैं, भले रोजगार न बढा़ हो या किसान परेशान हों! जिनको लाभ हुआ है, वे मोदी को अपने वोट से ‘थैंक्स गिविंग’ तो कर ही सकते हैं।

इस कड़वे सत्य से आंख मूंद कर कब तक काम चलेगा? राजनीतिक रकीब की ताकत के चिन्हों को पहचाने बिना की जाती आलोचना अंततः रकीब की ताकत को बढ़ाती नजर आती है। इन योजनाओं पर मोदी का देशप्रेमी छाप रसायन उन तमाम नाराजियों को नरम कर देता है, जो बेरोजगार युवाओं या किसानों के बीच मौजूद कहा जाता है। लेकिन मोदी के प्रति हमारा क्रोध और घृणा हमें इस कदर अंध कर चुकी है कि हम उनके किए धरे को भी जीरो मानकर चलते हैं और देशप्रेम या राष्ट्रवाद या धार्मिक विमर्शों की हम सिर्फ अंधष्ट्रवादी, पिछड़ा पुराणवादी और रिग्रेसिव मानकर निंदा कर देते हैं। हम यह नहीं देख पाते कि हमारे बरक्स भी कोई विचार है, जो दिनरात काम कर रहा है और इन दिनों वही लोकप्रिय है, क्योंकि कमजोर जनता हमेशा ताकतवर और मजबूत आदमी पसंद करती है! उक्त सांस्कृतिक राजनीति की काट अभी तक किसी के पास नहीं नजर आती। मोदी रसायन का यह अतिरिक्त एडवांटेज है।

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